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वर्तमान ही सत्य,भविष्य तो एक संभावना! धरे रह गये नोटबंदी पर सरकार के लुभावने वादे

Manoj Kumar

08 नवम्बर 2016 को सरकार द्वारा 500 और 1000 के नोट को अमान्य घोषित कर दिया गया. इससे 86 प्रतिशत रुपये चलन से बाहर हो गये. इस विमुद्रीकरण(नोट बन्दी) का उद्वेश्य बतलाता गया कि काला धन खत्म हो जायेगा, फर्जी नोट चलन से बाहर हो जायेंगे, भ्रष्टाचार पर चोट होगी और नक्सलियों तथा आतंकवादियों की कमर टूट जायेगी.

कई कल्याणकारी योजनायें होंगी शुरू

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बाद में  दो- तीन और उद्वेश्य जोड़ दिए गये. वो यह कि रियल सेक्टर पर चोट पहुंचेगा और घर(फ्लैट) सस्ता मिलने लगेगा, अर्थव्यवस्था लेस कैश हो जायेगी व कैशलेस हो जायेगी. यह भी अनुमान था कि बैंकिंग सिस्टम में 3 से 4 लाख करोड़ रूपये वापस नहीं आएंगे,क्योंकि वह ब्लैक मनी है. और जब नहीं आयेगा, तब उतना नोट आरबीआई छाप कर सरकार को दे देगी, जो भारत सरकार के लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी और इस बड़ी राशि से कई कल्याणकारी योजनायें शुरू हो सकेंगी.

बड़े तामझाम के साथ हुआ लागू

स्वाभाविक है कि जिस नोटबन्दी से इतने लाभ होने वाले थे, उसे लागू भी बड़े तामझाम के साथ की गयी थी. स्वयं अद्भुत लोकप्रिय व कठोर परिश्रमी पीएम नरेंद्र मोदी द्वारा टीवी पर संध्या आठ बजे इसकी घोषणा की गयी थी. उन्होंने इसके उद्वेश्य भी बतलाये थे. इसके क्रियान्वयन में काफी कठिनाई हुई. लोग अपने नोट बदलने और बैंक से पैसा निकालने की प्रक्रिया में काफी परेशानियों से गुजरे.

पीड़ित जनता को राष्ट्रहित में कष्ट सहने के लिए किया जा रहा था प्रेरित

30 दिसम्बर तक ही नोट बदलने के लिए समय निर्धारित था. बैंकों के आगे लंबी-लंबी कतारें लगी रहती थी. कई दर्जन लोग काल-कलवित हो गए, कई लोगों को पुलिस की लाठियां खानी पड़ी. जिनके घरों में लोग बीमारी से जूझ रहे थे और जिनके घर में शादी थी, वे सबसे अधिक प्रभावित हुए. सरकार रोज-रोज नियम बना रही थी या नियमों में बदलाव ला रही थी. सरकार के लोग सेना की परेशानियों का हवाला देकर पीड़ित जनता को राष्ट्रहित में कष्ट सहने के लिए प्रेरित कर रहे थे. विपक्ष और जो कोई भी नोटबन्दी या इसके क्रियान्वयन का विरोध करता उसे सरकार के लोग या उनके समर्थक काला धन रखने वाले या काला धन संरक्षक बता कर उनका मजाक उड़ाते.

अर्थशास्त्रियों ने किया था अगाह लेकिन मोदी ने बनाया मजाक

जहां एक तरफ प्रो.अमर्त्य सेन,डॉ.मनमोहन सिंह जैसे आर्थिक जानकार नोटबन्दी से अर्थव्यवस्था को होने वाले नुकसान को बता रहे थे, वहीं अभिनेता अनुपम खेर, क्रिकेटर वीरेंद्र सहवाग जैसे लोग इसे ऐतिहासिक कदम बता रहे थे. स्वयं पीएम गोवा में भावुक अपील कर रहे थे कि सिर्फ 50 दिन मुझे दें. इसके बाद यदि मुझमे कोई कमी रहे तो मुझे जिस भी चौक-चौराहे पर चाहें देशवासी सजा दे सकते हैं. पूर्व प्रधान मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह जब संसद के ऊपरी सदन में यह आशंका व्यक्त कर रहे थे कि नोटबन्दी से जीडीपी में दो प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है, तब मोदी जी ने उनका मखौल उड़ाते हुए कहा था कि डॉ साहेब ऐसे शख्स हैं जो बाथरूम में भी रेन कोर्ट पहन कर स्नान करते हैं.

99 प्रतिशत रूपये वापस हो गए, केवल 16 हजार करोड़ वापस नहीं आये

काफी जद्दोजहद के उपरांत आरबीआई ने वार्षिक रिपोर्ट में बताया कि 15 लाख 44 हजार करोड़ रूपये में से 15 लाख 28 करोड़ रुपये बैंकिंग सिस्टम में वापस आ गये, यानि 99 प्रतिशत वापस हो गए, केवल 16 हजार करोड़ रुपये वापस नहीं आये. आठ हजार करोड़ रुपये नये नोट(2000 और 500) की छपाई में खर्च हुए.

नोटबन्दी के दौर में ही 2000 के फर्जी नोट पकड़े जा रहे थे

अब प्रश्न उठता है कि काला धन कहां गया, जो टीवी में दिखाया जाता था कि फलाने जगह नोट को जलाया जा रहा है. नोट को नदियों व नालों में प्रवाहित किया जा रहा है. उसकी क्या सच्चाई? आतंकवादी हमलों में कहां कमी आई? किस राज्य और उस राज्य के किस महकमे में घूसखोरी बन्द हो गयी? एक सर्वे में तो भारत को एशिया का सबसे भ्रष्ट देश बताया जा रहा है. फर्जी नोट की जहां तक बात है, तो हमारी अर्थव्यवस्था में पहले भी ज्यादा नहीं था और न अब ज्यादा है. हां नोटबन्दी के दौर में ही 2000 के फर्जी नोट पकड़े जा रहे थे.

मनमोहन सिंह की आशंका को सही सिद्ध कर रहे आंकड़े

एक अनुमान है कि देश में 15 लाख लोग बेरोजगार हो गए तथा छोटे और मझोले उद्योग धंधे चौपट हो गए. यह धंधे नकदी पर आधारित था और रोजगार परक था. मन्युफैक्चरिंग सेक्टर बर्बाद होने के कगार पर. फलतः जीडीपी की वृद्धि दर 5.7 प्रतिशत (अप्रैल,मई और जून) हो गयी जो गत तिमाही में 6.1 प्रतिशत थी. यह 5.7 प्रतिशत दर गत वर्ष की तुलना में 2.2 प्रतिशत  कम है. उस वक्त 7.9 प्रतिशत थी. यह वृद्धि दर गत तीन वर्षों की सबसे निम्न दर है. यह आंकड़ा केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जारी की जाती है. हां तो ये आंकड़े पूर्व प्रधानमंत्री और अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह की आशंका को सही सिद्ध कर रहे हैं. ऐसा लग रहा है कि नोटबन्दी भरतीय अर्थव्यवस्था के लिए अभिशाप सिद्ध हो रही है.               

लाख कंपनियां चिन्हित की गयी हैं, जो हवाला कारोबार में लगी है         

 हां जेटली जी का कहना है कि आयकर दाताओं की संख्या में वृद्धि हुयी है. सही है, पर करदाताओं में वृद्धि और टैक्स में प्राप्त धन राशि में वृद्धि दो अलग अलग बातें हैं. अतएव अभी इंतजार करना होगा. सरकार का कहना है कि दो लाख 90 हजार करोड़ रूपये जो बैंक में जमा हुए हैं, उस पर सरकार की पैनी नजर है. सरकार यह भी कह रही है कि तीन लाख कंपनियां चिन्हित की गयी हैं, जो हवाला कारोबार में लगी है. पीएम 15 अगस्त के ओजस्वी संबोधन में यह भी दावा कर रहे थे कि तीन लाख करोड़ अतिरिक्त पैसा बैंकिंग सिस्टम में लौटा है. उपर्युक्त विश्लेषण का निष्कर्ष है कि नोटबंदी का तात्कालिक प्रभाव हमारी अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक पड़ा. हां. यह कहना उचित होगा कि वर्तमान ही सत्य,भविष्य तो एक संभावना है.                        

 

 

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