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भारतीय राजनीति के बर्बर युग की आधिकारिक उदघोषणा करती है गौरी लंकेश की हत्या

Roopak Raag

बेंगलुरु में पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या ने मीडिया और पत्रकारों की आजादी पर खतरनाक बंदिशों की राजकीय घोषणा कर दी है. अभिव्यक्ति और वैचारिक आजादी को धर्म-प्रेरित राजनीतिक उन्माद से खौफजदा ही नहीं बल्कि चुप भी करा दिया जा रहा. यह दौर हमारे देश में संप्रदायवाद और धार्मिक कट्टरता के चरम का है. राजनीतिक शह में यह उन्माद संविधान को भी खारिज कर रहा. दूसरे समुदायों, विचारों को भी नकार रहा और अपनी पंथीय श्रेष्ठता स्थापित करने में हत्यारी हिंसा से भी परहेज नहीं कर रहा. इस उन्माद की शिकार अकेले गैारी लंकेश नहीं हैं. इसका दायरा इतना विस्तृत है कि यह एमएम कुलबर्गी से लेकर रोहित वेमुला और उससे भी आगे मुजफ्फनगर, रांची, जमशेदपुर समेत देश भर में फैला हुआ है. सामाजिक समरसता के ताने-बाने को जिस तरह धर्म-आधारित वर्गीय तनावों से छिन्न-भिन्न किया जा रहा वह भारत के मौलिक संरचना को ध्वस्त कर देगा. अगर यही हाल रहा तो हम मध्ययुगीन बर्बरता और हिंसा के दौर में चले जाएंगे. और मारकाट खूनखराबा भारतीय समाज की आम परिघटना बन जाएगी.

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जब भारत देश के रूप में नहीं था तब यह क्षेत्रीय आधार पर बंटा हुआ था

हमारा देश एक संघीय ढांचा है. इसे कई राष्ट्रीयताओं का एक संघ या समुच्चय भी कहा जाता हैं. जब भारत देश के रूप में नहीं था तब यह क्षेत्रीय आधार पर अलग-अलग संस्कृतियों, जीवनशैलियों और धार्मिक आस्थाओं में बंटा हुआ था. इनके सम्मिलन या एकीकरण से ही भारत का बहुलतावादी रूप उभरा है. इसलिए इस देश का वजूद तब तक ही एक रह सकता है जब तक कि इसमें अलग-अलग संस्कृतियों, विचारों, जीवनशैलियों और धार्मिक आस्थाओं के बीच एक उदारपरक समन्वय हो.

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तेज हुई सामाजिक-राजनीतिक लड़ाइयां

बीते कुछ सालों में संप्रदायों के बीच सामाजिक-राजनीतिक लड़ाइयों तेज हुई हैं. इसका असर देश के मौलिक ढांचे पर पड़ा है और लोकतांत्रिक नींव के लिए गंभीर खतरे सामने आये हैं. भारत जैसे नवोदभिद् लोकतंत्र के लिए तो यह और भी खतरनाक है जो एकसाथ रूढ़ियों-परंपराओं और आधुनिक वैज्ञानिकता को अपनाता है. विज्ञान के आगे बढ़ने पर रूढ़ि-परंपराएं खंडित होती ही जाती है. ऐसे में समय के आगामी और प्रतिगामी दिशाओं के बीच अंतरद्वंद्व तीव्र वेग के साथ सामने आता है. सामाजिक अंतरद्वंद्व का दर्शनिक पहलू भौतिकवादी और ईशवादी खेमों में बंटता है और अपने-अपने तर्कों के साथ खुद को श्रेष्ठ साबित करने के लिए ऐड़ी-चोटी का जोर लगाते हैं.

प्रकृति और ब्राह्मांड की वैज्ञानिक व्याख्याओं से टूटते हैं धार्मिक रूढ़ियां और अंधविश्वास

इसमें ईशवादियों को अगर शासकीय संरक्षण, छूट और बढ़ावा मिल जाये तो दूसरा खेमा अपने आप कुछ छटपटाकर कमजोर पड़ जाता है. कोई भी समाज ईशवाद से वैज्ञानिक भौतिकवाद में जाने की प्रक्रिया में दोनों दर्शनों के कुछ अंशों को अपनाता और उपभोग करता है. प्रकृति और ब्राह्मांड की वैज्ञानिक व्याख्याओं से धार्मिक रूढ़ियां और अंधविश्वास टूटते जाते हैं. यह सिलसिला आगे तब तक चलेगा जब तक प्रकृति की सभी परिघटनाओं की वैज्ञानिक व्याख्या मानव समाज हासिल नहीं लेता.

सामंती वर्गों के लिए चुनौती पेश करने लगता है विज्ञान युग

हमारा देश अभी सामंतवाद से पूंजीवाद में संक्रमण कर रहा है. सामंती समाज धार्मिक रूढ़ियों और कर्मकांडों पर आधारित होता है. इसमें जाति-वर्ग का निर्धारण भी धार्मिक अधिकारों पर आधारित होता है. विज्ञान युग सामंती वर्गों के लिए चुनौती पेश करने लगता है. तब सामंती वर्गों की राजनीतिक चेतना अपने वर्गीय हित के लिए जागरूक और एकजुट हो समाज में रूढ़ि-परंपराओं का एजेंडा मजबूत करने की कोशिश करता है. भारतीय समाज के धर्म से विज्ञान की ओर रूपांतरण से सबसे अधिक खतरा उन वर्गों को होगा जो ऐतिहासिक रूप से देश का शासक वर्ग रहा है. सामाजिक संरचना में अपनी हैसियत और सत्ता को बरकरार रखने का आखिरी दांव धार्मिक-रूढ़ियों और परंपराओं को राजनीतिक जोर देना है.

21वीं सदी के विज्ञान युग में अंधविश्वास और रूढ़ियां और भी अधिक उग्र उभार पा रहा

यह अचरज है कि 21वीं सदी जिसके बारे में कहा जा रहा था कि यह विज्ञान युग होगा, उसमें अंधविश्वास और रूढ़ियां और भी अधिक उग्र उभार पा रहा है. वैज्ञानिक थ्योरियों पर गोबर हावी हो रहा है. यह यूं ही नहीं है. यह राजनीतिक संरक्षण और प्रोत्साहन के बगैर संभव नहीं है. यह बात केवल एक धर्म पर लागू नहीं होती. जहां जो संप्रदाय शक्तिशाली वजूद रखता है वहां वह अपने हिंसाब से विपरीत विचारों की सेंसरशिप करता है. लेकिन सामाजिक सरसता के नाम लोकतंत्र का एकरारनामा विभिन्न वर्गों के बीच आपसी तालमेल से ही बनता है. इसमें जब एक वर्ग भी इसे तोड़ता है तो समाज का ढांचा प्रभावित होता है. भारत जैसे बहु-सांस्कृतिक, बहु-भाषाई और बहु-संप्रदायों के सह-अस्तित्व वाले देश के लिए यह और भी खतरनाक होता है.

वह कौन वर्ग है जो विज्ञान के उपर रूढ़ियों को तवज्जो दे रहा

पत्रकार गौरी शंकर लंकेश की हत्या का संदर्भ भी इस पूरे राजनीतिक संदर्भ से जुदा नहीं है. वह कौन वर्ग है जो विज्ञान के उपर रूढ़ियों को तवज्जो देकर राजनीतिक सत्ता को चिरस्थाई बनाने की फिराक में है. ऐसे संगठनों और वर्गों को अच्छी तरह मालूम है कि वे सांस्कृतिक रूढ़ियों को जितना अधिक समाजिक रूप से कट्टर बनाएंगे उनके शासन की अवधि उतनी लंबी होगी. लेकिन जांगल युग से बर्बर युग और उसके बाद सभ्यता के चरम को हासिल करने की बजाये अगर समाज को पीछे ढकेला जा रहा तो इसे राजनीतिक सत्ता की तानाशाही और अलोकतांत्रिक ही करार दिया जाएगा.

लोगों पर हिंसक रूप से दबाव बनाया जाए जरूरी नहीं

यह भी जरूरी नहीं कि अपने विचारों को श्रेष्ठ और वैधानिक बनाने के लिए लोगों पर हिंसक रूप से दबाव बनाया जाए. अंधविश्वास के खिलाफ लड़ रहे एमएम कुलबर्गी हों या गोविन्द पानसरे हों चाहे नरेन्द्र दाभोलकर जी हों, जब वे अपनी बातों को लोगों पर हिंसक रूप से नहीं थोप रहे थे तो फिर उनके साथ हिंसा क्यों की गई. इन सबकोअंधविश्वासों के खिलाफ लोगों को जागरूक करने के कारण धार्मिक उन्मादियों की हिंसा का शिकार होना पड़ा था और अपनी जान गंवानी पड़ी थी. पत्रकार गौरी लंकेश भी उसी धारा की मुखर पत्रकार थीं जो रूढ़ियों पर विज्ञान को तवज्जो देती थीं. और धर्म आधारित राजनीतिक एजेंडों का खुलकर विरोध करती थीं. जिन लोगों को रूढ़ियों के खिलाफ बोलने पर जान से मार डाला गया जिनका जिक्र मैंने उपर किया, उनमें से कोई भी मुसलिम या इसाई नहीं था. सभी हिन्दू थे. रोहित वेमुला भी हिन्दू था. फिर भी इन सबको धार्मिक उन्मादियों द्वारा निशाना बनाया गया. इससे साफ पता चलता है कि यह धार्मिक एजेंडे से कहीं आगे केवल वर्गीय सत्ता की राजनीति है जिसमें पूरे देश को फंसा-उलझाकर धर्म के नाम पर उन्मादी बना दिया गया है.

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