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बैंकों के डूबने पर अब उसमें जमा पैसे नहीं रहेंगे सुरक्षित, केंद्र सरकार संसद के शीतकालीन सत्र में ला सकती है बिल

NEWS WING

Ranchi, 06 December : केंद्र सरकार संसद के शीतकालीन सत्र में फाइनेंसियल रेजूल्युसन एंड डीपोजिट इंश्योरेंस बिल-2017 ला सकती है. इस बिल में प्रावधान है कि अगर कोई बैंक खराब वित्तीय हालत में फेल कर जाता है, तो बैंकों में जमा करने वालों के रुपयों को उस बैंक को इससे उबारने में लगाया जाएगा. अभी जो प्रावधान है, उसके मुताबिक अगर कोई बैंक डूबता है, तो आपको उसमें जमा रुपये में से एक लाख रुपये मिलेंगे. अगर शीतकालीन सत्र में बिल पास हो जाता है, तब नये कानून के मुताबिक आपको एक लाख रुपये भी लंबे समय तक नहीं मिल सकते हैं. बैंक इस राशि को भी वित्तीय स्थिति सुधारने में इस्तेमाल कर सकती है.

वर्ष 2016-17 के बजट भाषण में केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बताया था कि बैंकों द्वारा बड़े औद्योगिक घरानों को दिए गए कर्ज के डूबने से उनकी वित्तीय स्थिति खराब हो गयी है. इससे उबारने के लिए केंद्र सरकार “कड़े वित्तीय अनुशासन के लिए कदम उठाने पर विचार कर रही है. उन्होंने यह भी कहा था कि लोगों के पैसों की रक्षा के लिए कड़े प्रावधान लाये जाएं, इस पर भी विचार किया जाएगा.

कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के सांसदों ने आपत्ति जतायी थी

इस सम्बन्ध में वित्त मंत्रालय के अपर सचिव अजय त्यागी के नेतृत्व में मार्च 2016 में ही एक कमिटी बनाई गयी थी. उस कमिटी ने सितम्बर 2016 में अपपी रिपोर्ट सौंप दी और प्रस्तावित कानून का ड्राफ्ट दिया था. अक्टूबर 2016 में इस पर विचार-विमर्श बंद कर दिया गया. 17 जून 2017 को केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने इसे पारित कर दिया. संसद के मॉनसून सत्र के अन्तिम दिन से ठीक एक दिन पहले इस ड्राफ्ट को लोकसभा में पेश किया गया था. इसे लेकर कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के सांसदों ने आपत्ति जतायी थी. जिसके बाद इस मामले को संयुक्त संसदीय समिति को सौंप दिया गया था. सूत्रों के अनुसार सरकार इस बिल को संसद की आगामी शीतकालीन सत्र में ला सकती है. 

इससे रिजर्ब बैंक का नियंत्रण समाप्त हो जाएगा : यूनियन 

बताया जाता है कि इस  कानून के ड्राफ्ट में अन्य बातों के अलावा यह साफ़ किया गया है कि आर्थिक रूप से कमजोर होने पर अगर कोई बैंक डूबता है, तो उस बैंक में लोगों के जमा रूपये बैंक के शेयर या अन्य किसी प्रकार की प्रतिभूति में बदलने के लिए बैंक स्वतंत्र होगा. कहा जा रहा है कि वैसे तो बैंक्र्प्सी कोड 2016 में बैंकों के डूबे हुए कर्ज़ की वापसी के लिए तरीकों की चर्चा की गयी है. लेकिन आनेवाला कानून इसको मजबूत करेगा.

प्रस्तावित कानून में बैंकों के वित्तीय स्वास्थ्य के बारे में और इससे सम्बन्धित मामले के निबटारे में रेजोल्यूशन कॉर्पोरेशन सर्वोच्च होगा. इसमें एक चेयरमैन के अलावा केन्द्रीय वित्त मंत्रालय, भारतीय रिजर्व बैंक, सेबी(SEBI) और इंश्योरेंस डेवलपमेंट एंड रेगुलेटरी अथॉरिटी के एक-एक प्रतिनिधि रहेंगे. इसमें कम से कम तीन पूर्णकालीन सदस्य होंगे और विवादों का फैसला कम्पनी लॉ ट्रिब्यूनल करेगा.

बैंकों के यूनियन के पदाधिकारियों ने इसका कड़ा विरोध भी किया है. उनका कहना है कि बैंक अभी तक कम्पनी लॉ के अधीन नहीं है. प्रावधान से रिजर्ब बैंक का नियंत्रण समाप्त हो जाएगा. कई मौजदा कानूनों में संशोधन करना पड़ेगा.

यह भी पढ़ें : रिजर्व बैंक की मुख्य ब्याज दर में बदलाव नहीं, महंगाई दर बढ़ने का अनुमान

यूनियन के पदाधिकारियों का कहना है कि ऐसी हालत में अगर किसी जमा करने वाले ग्राहक को तुरंत पैसे की जरुरत हुई तो उसे पैसे तुरंत नहीं मिल पायेंगे. यह भी संभव होगा कि बैंक के डूबने के हल्ले से ही जब सभी जमा करने वाले एक साथ पैसे निकालने पंहुच जाएं तो बैंक वैसे भी डूब जाएगा.

भारतीय स्टेट बैंक के रिटायर्ड जनरल मैनेजर यशोवर्धन सिन्हा का कहना है कि बैंक अपने कमाए लाभ से ही खराब हुए कर्ज़ की भरपाई कर देता है. अगर बैंक घाटे में चल रहा है तो बैंक रूपये जमा कराने वालों के पैसे कैसे लौटा पायेगा? जब तक रिजर्व बैंक छोटे बैंकों के बड़े बैंक में विलय को न रोके. नये कानून में एक लाख रूपये की गारंटी में परिवर्तन करना मुश्किल नहीं है.

ऋण वसूली में नाकामी की गाज जनता पर

स्टेट बैंक के रिटायर्ड असिस्टेंट जनरल मैनेजर रवि श्रीवास्तव का कहना है कि बैंकों के खराब ऋण की वसूली के लिए बने कानून में पालन में इतनी देरी होती है कि बैंक उसके कारण मुश्किल में रहता है. कई देशों में यह कानून है कि कोई भी ऋण, उस ऋण से अधिक मूल्य की जमीन या कोई अन्य सम्पत्ति के गिरवी रखने पर ही मिलता है. यदि चंद महीनों तक अदायगी बंद हो जाए तो बैंक उस संपत्ति को तुरंत ही बेचकर वसूली कर लेता है. ऋण लेने वालों को यह पता होता है कि अगर ऋण समय पर नहीं लौटाया तो बैंक जल्दी ही संपत्ति को बेचकर उससे वसूल लेगा. इसलिए वहां बैंक के ऋण सुरक्षित होते हैं और बैंकों की वित्तीय स्थिति खराब नहीं होती है. लेकिन हमारे देश में इसमें बहुत दिक्कतें आतीं हैं.

अभी नियम यह है कि बैंकों को जमा अधिकतम एक लाख रूपये बैंकों के फेल होने की परिस्थिति में सूद समेत सुरक्षित रहेंगे. यह डिपोजिट इंश्योरेंस एंड क्रेडिट गारंटी कारपोरेशन एक्ट 1961 के तहत है. 21 पब्लिक सेक्टर बैंक इसके लिए 3,000 करोड़ रूपये का इंश्योरेंस प्रीमियम देते हैं. यह सच है कि इस लंबी अवधि में कोई बैंक फेल नहीं किया है. लेकिन हाल में कई बैंकों द्वारा बड़े-बड़े औद्योगिक घरानों को करोड़ों में दिए गए कर्ज़ नहीं लौटाए गए. विजय माल्या का उदाहरण सबको याद है. बैंकों से इस तरह लिए गए बड़े-बड़े कर्ज़ नहीं लौटाए जाने से उन बैंकों की बड़ी धन राशि एनपीए होने लगी. बैंकों की हालात खराब होने लगी है. बैंकों के डूबे पैसे वापस पाने के मौजूदा कानून कितना सक्षम है, इस पर चर्चा हो रही है.

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