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मैरिटल रेप अपराध नहीं, तो क्या शादी बाद महिला का शरीर उसका नहीं !

नीतू कुमारी, पत्रकार

भारत जहां पर महिलाओं को देवी कहकर पूजा जाता है. मां, बहन और बेटी के रूप में उनका आदर किया जाता है. लेकिन इस तस्वीर का दूसरा पहलू बेहद भयावह है. रिश्तों  की आड़ में महिलाओं को तरह-तरह की यातनाओं से गुजरना पड़ता है. बाहर की दुनिया में तो हवस के अंधे कदम कदम पर हैं पर घर की चारदीवारी भी महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं. रिश्तों की मर्यादा बचाने के लिए ज्यादातर पीड़ित मुंह नहीं खोल पाती हैं. कभी ऑनर के नाम पर बहन और बेटी की हत्या, कभी दहेज के लिए बीवी और बहू का उत्पीड़न या फिर झूठी मर्दानगी के अहम और शराब के नशे में चूर पति से मिलने वाली शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना.

हालांकि घरेलू हिंसा के खिलाफ अब कई पीड़ित महिलाएं खुलकर सामने आने लगी हैं. लेकिन एक अपराध जिसे कानून में भी अपराध का दर्जा नहीं है, उसके खिलाफ चाहकर भी पीड़ित महिला बोल नहीं पाती. ये मसला है मैरिटल रेप यानी वैवाहिक बलात्कार का. पत्नी के इनकार के बावजूद उससे जबरन संबंध बनाने को हमारा समाज गलत नहीं मानता, क्योंकि समाज के मुताबिक, एक स्त्री का शरीर शादी के बाद उसके पति का हो जाता है. समाज की यही पारंपरिक और इकतरफा सोच सरकार पर भी हावी है जिसे कानून की कसौटी पर भी सही ठहराने की कोशिश हो रही है. 

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‘बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ’ का नारा देकर महिलाओं की रहनुमाई का दावा करने वाली केन्द्र की मौजूदा मोदी सरकार का नजरिया भी इस मामले में भी दूसरी पार्टियों से अलग नहीं है. केंद्र सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष हलफनामा देकर कहा कि वैवाहिक बलात्कार को दंडनीय अपराध नहीं बनाया जा सकता क्योंकि ऐसा करना विवाह की संस्था के लिए खतरनाक साबित होगा। केन्द्र सरकार का मानना है कि ये एक ऐसा चलन बन सकता है, जो पतियों को प्रताड़ित करने का आसान ज़रिया बन सकता है. केन्द्र की ओर से इस बाबत दहेज विरोधी कानून और घरेलू हिंसा से जुड़े कानूनों के दुरूपयोग का हवाला दिया गया.

सवाल है कि क्या सिर्फ किसी कानून के दुरुपयोग की आशंका के चलते किसी अपराध को अपराध न मानना कितना उचित है ? ये सच है कि घरेलू हिंसा और दहेज उत्पीड़न के नाम पर कई पतियों और ससुराल वालों के सताये जाने के कई मामले सामने आए हैं. पर इसकी वजह कानून की विसंगति नहीं बल्कि उसके दुरुपयोग का तरीके हैं जिन्हें दुरुस्त करने की जरूरत है।  पर ऐसी महिलाएं जो अपने ही घर में अपने ही पतियों के हाथों अक्सर यौन हिंसा का शिकार होती आ रही हैं, उनके लिए न्यायसंगत कानून का होना भी जरूरी है.

बलात्कार की परिभाषा में छह ऐसी परिस्थितियों का जिक्र किया गया है, जिसमें संबंध बनाना रेप के दायरे में आएगा. महिला की इच्छा और उसकी मर्जी के बिना संबंध  बनाने को रेप माना गया है. महिला को उसकी हत्या या फिर उसके किसी अपने की हत्या की  धमकी देकर संबंध बनाना भी रेप है. डर की वजह से महिला ने भले ही उसका विरोध ना किया हो पर कानून की नजर में वो बलात्कार है. शादी के नाम पर किसी  महिला को झांसा देकर उससे संबंध बनाना भी रेप के दायरे में आता है. अगर संबंध बनाते वक्त महिला की मानसिक हालत ठीक न हो. तो वो भी बलात्कार की श्रेणी में अाता है.  इसके अलावा अगर महिला से नशे की हालत में संबंध स्थापित करना  भी रेप माना जाता है.

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आईपीसी की धारा- 375 में यह भी कहा गया है कि अगर लड़की की उम्र 16 साल से कम हो और उसकी मर्जी या सहमति के बिना  सेक्स किया गया हो तो वो भी बलात्कार की श्रेणी में ही आएगा. हालांकि एक  परिस्थिति में यह गया है कि अगर पत्नी की उम्र 15 साल से कम है और पति उसके साथ सेक्स करता है तो वो रेप नहीं होगा. वहीं, भारतीय दंड विधान में रेप की परिभाषा के तहत वैवाहिक बलात्कार का जिक्र  नहीं है. लेकिन धारा- 376 में पति के लिए सजा का प्रावधान है. अगर पति 12  साल से कम उम्र की पत्नी के साथ उसकी मर्जी के बिना सेक्स करता है. तब पति को  जुर्माना या फिर दो साल की कैद हो सकती है.

दिल्ली हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील  कोलिन गोंजाल्विस ने दलील दी है कि विवाह को ऐसे नहीं देखा जा सकता कि ये  मर्जी से पतियों को जबरन संबंध बनाने का अधिकार दे देता है. उन्होंने अलग-अलग देशों के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि एक विवाहित महिला को भी अविवाहित महिला की तरह  ही अपने शरीर पर पूर्ण नियंत्रण का समान अधिकार है. इस पर केन्द्र का कहना  था कि बहुत सारे पश्चिमी देशों में मैरिटल रेप अपराध है, पर जरूरी नहीं कि भारत में भी आंख मूदकर इसका पालन किया जाए. इससे पहले महिलाओं की साक्षरता, आर्थिक स्थिति और गरीबी आदि के बारे में  सोचना होगा. हमारे कानून में भी ये स्पष्ट है कि अगर कोई महिला शादी के बाद अपने पति के साथ संबंध बनाने से इंकार करती है तो ये क्रूरता होगी और इस आधार पर पति तलाक भी मांग सकता है.

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जाहिर है कानून की नजर में कोई विसंगति नहीं है. क्योंकि उसके लिए पीड़ित पति या पीड़ित पत्नी दोनों एक समान हैं. कानून का उद्देश्य दोनों को इंसाफ देना है पर इसका यह मतलब नहीं कि शादी के बाद महिला के शरीर का मालिक उसका पति है और जैसे चाहे  उससे पेश आए. पति-पत्नी के बीच कोई भी रिश्ता प्रेम और विश्वास पर आधारित होता है. ऐसे में संबंध बनाने के लिए दोनों की सहमति और खुशी जरूरी है. ऐसे में जिस तरह तीन तलाक के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं के अधिकार की रक्षा की, उसी तरह अब मैरिटल रेप पर भी अदालत से न्यायसंगत फैसले की उम्मीद की जा रही है.

 

नोट :- ये लेखक के निजी विचार हैं.

 

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