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प्रकृति और समाज से संबंधों का उत्सव है करम

Dr. Ajit Munda, जनजातीय भाषा-संस्कृति के शोधार्थी                                                       

भारत वर्ष में जनजातियों की घनी आबादी झारखण्ड राज्य एवं वन प्रांतों में केन्द्रित है. इन जनजातियों में मुण्डा जनजाति प्रोटो-आस्ट्रेलायड प्रजाति की एक खास जाति है एवं आस्ट्रिक भाषा समुदाय से है. मुण्डाओं का प्राकृति के तत्वों से घनिष्ठ संबंध है तथा प्रकृति के विभिन्न रूपों की पूजा-अराधना के साथ वे गीत-संगीत, लय-ताल, रीति-नीति एवं मर्यादित कुशल जीवन जीते है. यही उनकी पहचान है.

मुण्डा जनजाति सम्पूर्ण प्रकृति को रंगस्थली, पूजनीय, पर्व-त्योहार एवं मनोरंजन के साधन के रूप मानते हैं. अधिकतम प्राणवायु ऑक्सीजन प्रदान करने वाले करमा वृक्ष (कुड़ुमबा दारू) की भादो एकादशी के शुक्ल पक्ष में पूजा-अराधना करते हैं.

प्रकृति का आदर आदिवासियों की विरासत

प्रकृति के प्रति श्रद्धा, भक्ति, विश्वास, आस्था, आदर, प्रेम की भावना, प्रकृति के संरक्षण-संवर्धन के गुण मुंडाओं की विरासत है. ये इनके लिए महत्वपूर्ण हैं. यहां की ‘‘हरियाली और फूलों से भरे जंगल, रहस्यमय गुफाओं से भरे हुए पहाड़, कलकल गाते हुए निर्झर, प्राणों की उन्माद भरनेवाली हवाएं और मधुर स्वरों से जंगल गूंजित रखनेवाले पंक्षी, यही मनोहर चित्रकारी मुण्डाओं की दुनिया है. ऋतु में परिवर्तन के संकेत हमें हवा-पानी के रुख, वनस्पति में परिवर्तन, आर्थिक क्रिया-कलापों और जीव-जन्तुओं की गतिविधियों से मिलते हैं.

उसी के अनुरूप हमारी शारीरिक-मानसिक स्थिति में तब्दीली आती है. ऋतु परिवर्तन अनुसार ही पर्व-त्योहार मनाने की परम्परा है. मुण्डा जनजाति का प्रारम्भ से ही प्रकृति के तत्वों एवं उनके श्रृंगार से गहरा संबंध रहा है. इन सबके बिना मानव जीवन की कल्पना असम्भव है, क्योंकि जीव समुदाय को शुद्ध जल, शुद्ध वायु एवं भूमि आदि प्रकृति से ही प्राप्त होते हैं. इसलिए मुण्डा लोग प्रकृति की अराधना के रूप में करमा पूजा करते हैं.

आदिवासी व गैरआदिवासी, दोनों का त्योहार है करम

करमा पर्व जनजातियों के साथ-साथ गैर-जनजातियों का भी महत्वपूर्ण त्योहार है. ‘‘यह झारखण्ड से बहुत दूर बाहर- मिथिला, मगध, बुन्देलखण्ड और छतीसगढ़ तक चला गया है. कृषि कामनाओं के साथ यह भाई-बहनों का भी स्नेह पर्व (आपन करम भाइक धरम) भी हो गया है. नियत तिथि को एक सप्ताह पहले गांव के चिन्हित आंगन/अखड़ा के समीप के घरों की अविवाहित युवतियां बांस की टोकरियों में बालू-मिट्टी भरकर धान, जौ, मकई और गेंहूं के अनाज को उगाने के लिय बो देती हैं. उनके अंकुर फूटते ही उनपर पानी छिड़ककर उन्हें बढ़ाती है.

सामूहिकता का संदेश

संध्या बेला में युवक-युवतियों की टोली गाजे-बाजे के साथ पहले से निमंत्रित, चिन्हित करम वृक्ष के पास जाते हैं और करमा वृक्ष को विनम्र सुमिरन कर उपवास युवक करम डाली को काटकर ससम्मान नृत्य-संगीत के साथ लाते हैं और नियत स्थान में विधिनुसार स्थापित करते हैं. सभी उपवासक पूजन सामग्री के साथ करम के चारों ओर बैठ जाती हैं और करम कथा होती है. करम कथा में दो भाई करमा और धरमा की कथा है. करम पूजा के अवसर पर अंकुरित बीजों (जावा) को लक्षित कर प्रार्थना की जाती है कि ये अंकुर अच्छी तरह बढ़ें. उनमें कीड़े न लगे. नए स्वस्थ बीज भरें. कहीं-कहीं बीजों की सुरक्षा-प्रार्थना का विस्तार बहनों द्वारा भाइयों के प्रति मंगलकामना के रूप में भी हो गया है, जो उपदेशात्मक जीवन दर्शन है. इस समय कृषकों के खेतों में धान लहलहाती है.

प्रकृति के श्रृंगार और राग का महोत्सव

पृथ्वी पर छायी हुई हरियाली, बादलों के गंगा-जल से धुले हुए जंगल, घास और झुरमुटों की चादर ओढ़े पहाड़, खेतों में कुलकुलाता हुआ पानी, रात को निःस्तब्धता, झींगुरों की झनकार, पक्षियों की चहचह, धरती से आकाश तक के सारे दृष्य और क्षण-क्षण परिवर्तित प्रकृति के रूप बड़े प्रभावशाली होते हैं. ये मुण्डाओं के मस्त स्वभाव को छेड़े बिना नहीं रह सकते. यह सच है कि मुण्डाओं के जीवन की चिर-सहचरी प्रकृति जब अपना अभिन्न श्रृंगार करती है और जब जंगलों में छटा छा जाती है, तब ये प्रकृति के स्वर में गा उठते हैं. इनके मस्ती-भरे मन पर छाया हुआ सारा वातावरण ही पर्व बन जाता है. यही मुख्य कारण है कि प्रकृति के प्रति भक्तिभाव एवं प्रकृति संरक्षण के उपदेशात्मक गीतों की भरमार है, जो रसिक लोग करम के दिन सभी एक साथ रात भर नृत्य-संगीत में लीन रहते हैं.

विधि-विधान की अहमियत

दूसरे दिन सुबह सभी नृत्य मण्डली गाजे-बाजे के साथ करम को विशर्जन करते हैं. इसी दिन प्रत्येक किसान अपने-अपने खेतों के बीच में भेलवा (सोसो), परासी आदि की डाली गाड़ते है. इसे ईंदी डांग (पहले से लाया हुआ डाली) कहते हैं. मान्यता है कि इसके पत्ते से धान में कीड़े नहीं लगते, जो कीटनाशक का काम करता है. कृषि वैज्ञानिक भी इस बात से सहमत हैं. उस ईंदी डाली पर चिड़ियां बैठ कर कीड़े-मकड़े इत्यादि को खाकर फसल नष्ट होने से बचाते हैं. वैसे तो इन डालियों से धान में लगने वाले कीड़े मर जाते हैं, लेकिन डालियों का गाड़ना कर्म करने का प्रतीक है तथा पेड़ों की रक्षा एवं पर्यावरण की सुरक्षा का भी प्रतीक है. यह प्रथा परम्परा से चली आ रही है तथा इससे वैज्ञानिक भी सहमत हैं. शाम को अखरा मेटा यानि थकावट को दूर करने के लिए कुछ समय तक नाच के साथ अन्त होता है. इस प्रकार से यह करम पर्व प्रकृति की विरासत को बचाने एवं आपसी प्रेम रखने का त्योहार है.

मानव जीवन में प्रकृति की अहमियत

आज हम इस परिस्थिति में पहुंच गए हैं कि शुद्ध वायु एवं जल की समस्या से ग्रसित हैं. शायद यह प्रकृति से छेड़छाड़ का परिणाम है. आए दिन तरह-तरह के वैज्ञानिक प्रयोग होते रहते हैं. शायद इन सबसे धरती मां रुष्ठ हो रही है, जो अल्पवृष्टि, बाढ़, अकाल, प्राकृतिक आपदा आदि हो रही है. हमें संकल्प लेना होगा कि धरती मां की रक्षा करेंगे. धरती को शोभा देने वाली नदी-नाला, पेड़-पौधे एवं प्राकृतिक सम्पदा का संरक्षण करेंगे. तभी तो आकाश से वृष्टि होगी और धरती में हरियाली होगी.

हमार कृषक समाज

चूंकि हमारा कृषि प्रधान देश है. कृषि कार्य होगी, हम खुश रहेंगे और एक कहावत (मुण्डारी) चरितार्थ होगी- ‘लाइः पेरेः जोम ता’रे रासिका, मायाङ पेरेः पाटे ता’रे चाएला’ अर्थात् पेट भरा हो तो आनन्द, शरीर में वस्त्र हो तो खुशी होगी. आज भी करमा के प्रति लोगों में वही आस्था, विश्वास, श्रद्धा, भक्ति, दिखाई देती है एवं लोग धार्मिक रीत्यानुसार बड़े हर्ष-उल्लास से एकसाथ करम पर्व मनाते हैं. यह हमारी सामाजिक एवं सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है, जो सर्वोपरि और सर्वशक्तिमान है.    

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