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करम पर्व देता है कर्म और धर्म का संदेश

Ashok Baraik

‘भादो कर एकादशी करमा गाड़ाय हो,

सातो बहिन करंलय, लहईर गोय,

फुला लोरहते आवेय

सातों बहिनी र

करमा राजा आंगना में ठाड़’

झारखंड के सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय त्योहारों में करमा एक महापर्व के रूप में मनाया जाता है. इस पर्व को आदिवासी एवं सदान एक साथ मनाते हैं.

झारखण्ड से बाहर से लोकप्रिय

झारखंड ही नहीं झारखंड के बाहर बिहार के कटिहार, पं. बंगाल, असम के चाय बगान, कोकराझार, अण्डमान-निकोबार द्विप समूह व झारखंड से सटे छतीसगढ़ व ओडिशा के कुछ भागों में भी करमा पर्व बड़े धूमधाम से मनाया जाता है. करमा पर्व के दिन पहान, वैगा, भाई-बहन नहा-धोकर करमा वृक्ष के तीन डाली को काट कर लाते हैं. इसके बाद विधिनुसार निश्चित जगह पर गाड़ते हैं. शुक्ल पक्ष एकादशी को गांव की युवतियां दिनभर उपवास करती हैं. नहा-धोकर नए कपड़े पहनकर शाम को पूजन सामग्री जुटाती हैं. इसमें धूप, धुवन, पीठा, खीरा डण्ठल सहित शामिल होता है. खीरा को बेटे  के रूप में इंगित किया गया है. युवतियां साथ पूजा के लिए जाती हैं. गांव के वैगा, पहान या जानकार व्यक्ति द्वारा करम कथा सुनाई जाती है. वे अपने गांव, परिवार, भाई के कुशल जीवन के लिए पूजा करती हैं.

सात दिनों का उत्सव

यह भी जान लेना आवश्यक है कि करमा से सात दिन पहले युवतियां तीज के दिन नदी से स्वच्छ बालू लाती हैं और इसमें सात प्रकार के अनाज गेहूं, उरद, कुरथी, चना, मटर आदि को बालू में बोती हैं. इसे ‘जावा’ कहते हैं. बहनें इस जावा में नहा-धोकर रोज हल्दी पानी छिड़कती हैं. करम के समय ये जावे बड़े हो जाते हैं. करम कथा समाप्ति के बाद उपासीन कतारबद्ध होकर करम राजा के सात फेरे लगाती हैं और गीत गाती हैं;

सिरि वृन्दा बन गेली लानली

करम गछ गाड़ली, र कोहड़ा

खिरवा फर बेरवा गोई पावली

ए भाई पावली, ए भाई पावली.

कर्म ही धर्म का संदेश

यह कर्म ही धर्म है या धर्म ही कर्म है, धर्म-कर्म ही जीवन में सफलता का एक राज है. पूजा समाप्ति  के बाद गांव के सभी रसिक लोग नृत्य-संगीत में रातभर लीन हो जाते हैं. इसमें जनानी झुमर, अंगनाई गीत के पहील सांझा, अंधरिया, भिनसरिया व विहानिया, ढढ़िया, डइरधरा, लुझरी, उधवा, रस किर्रा, लहसुवा आदि गीत गाये जाते हैं. इनमें खासकर वाद्ययंत्रों में नागपुरी के लिए जयपुरिया मांदर कुमनी मांदर, ढोलक, कर्रह, करताल, झुनकी, ढेचका आदि प्रमुख हैं.

‘हायरे हायरे चलु संगी

करम खेले अखरा में

जोड़ा मांदर बाजेला

चलु संगी करम खेले’

रात भर नाच-गान

इस प्रकार रात भर नाच-गान कर नृत्य मंडली द्वारा सुबह करम राजा को उखाड़कर नदी या तलाब में ससम्मान विसर्जित करते हैं. अगले वर्ष फिर आने के निमंत्रण के साथ करम राजा को हर्ष-उल्लास से विदा करते हैं. इस प्रकार यह प्रकृति के संरक्षण और आपसी भाईचारे के प्रतीक करम के प्रति लोगों की आस्था सदियों से बनी हुई है.

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