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शरीअत में हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं

निकहत परवीन

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक एेतिहासिक फैसला सुनाया. यह फैसला था मुस्लिमों में 1400 वर्षों से जारी एक साथ तीन तलाक कहने की प्रथा पर. यह फैसला लेना इतना अासान भी नहीं था. क्योंकि देश की नौ करोड़ मुस्लिम महिलाअों को सम्मान के साथ इंसाफ दिलाना बहुत बड़ी चुनौती थी. यह एक शरिअत मामला था. जिसमें दखल देना अासान भी नहीं था. लेकिन यह काम भारत का सुप्रीम कोर्ट ही कर सकता था, अौर इसको हम इस शताब्दी का सबसे बड़ा सामाजिक सुधार भी कह सकते हैं.

इस्लाम ने महिला अौर पुरुष को समान अधिकार दिए गए हैं. अगर पति को उसकी बीबी किसी भी वजह से पसंद नहीं है तो वह 'तलाक' दे सकता है अौर अगर पत्नी को भी उसका पति पसंद नहीं है तो वह उससे 'खुला' ले सकती है. 

सबसे पहले हमें जानना होगा कि ये तीन तलाक का मसला ही क्यूं अाया. हमारे प्यारे नबी (स.) की जायज चीजों में सबसे ज्यादा नापसंद अौर नाजायज चीत तलाक है. इस्लाम से दूरी ही इन चीजों को बल देती है. अरे भाई, इस्लाम में गहराई से सोंचने भर से ही तलाक हो जाता है, तो तीन तलाक ना कहने से क्या तलाक नहीं होगा ? इस्लाम को जानना इतना अासान नहीं, खुद एक मुसलमान भी इस्लाम को सही तरीके से नहीं जानता अौर इसकी वजह है दीन से दूरी. लोगों को तालीम हासिल ना करना. इस्लाम को समझने के लिए उसकी गहराइयों में जाना होगा. मुसलमानों को अपने मजहब के बारे में जानना होगा अौर यह तभी होगा जब हर मुसलमान इल्म हासिल करे.

अाज के माडर्न लोग अपने बच्चों को तालीम के पीछे लाखों रुपये लगा देते हैं. ताकि उनका बच्चा उच्च शिक्षा हासिल करे. लेकिन वहीं दूसरी तरफ अगर हम एक मौलवी साहब को अपने बच्चे को दीनी तालीम हासिल कराने के लिए रखते हैं अौर वह 200 रुपया प्रति महाने मांगता है, तो वह उस मां-बाक को बहुत ज्यादा लगता है. अौर यहीं से शुरु होती है दीन से दूरी. अाज के मुस्लिम बच्चे बड़े-बड़े इंग्लिश मीडियम में पढ़ते हैं. बहुत ही अच्छी अंग्रेजी लिखते अौर बोलते हैं. लेकिन वहीं उन्हें उर्दू लिखने अौर पढ़ने के लिए कहा जाए तो वह नजरे नीची कर लेते हैं. क्योंकि मुसलमान होते हुए भी उन्हें अरबी तो दूर की बात है, उर्दू तक नहीं अाती. यह कैसा माहौल दे रहे हैं हम अपने अाज की पीढ़ी को जिन्हें अपने मजहब तक की सही जानकारी नहीं वह तीन तलाक को क्या समझेंगे.

ये सब देखते हुए इकबाल का एक मशहूर शेर याद अा रहा है :

तुम्हारी तहजीब अपने खंजर से अाप ही खुदकुशी करेगी

जो शाख-ए-नाजुक पे अाशियाना बनेगा, नापायेदार होगा.

जब बुनियाद ही कमजोर होगी, तो सही गलत का फैसला हम कहां से कर पाएंगे.

अब बात करते हैं तीन तलाक की. अपनी ला इल्मी की वजह से अाज हम इस जगह अा खड़े हुए हैं कि जिनका मजहब-ए-इस्लाम से कोई रिश्ता नहीं वही हमें हमारा मजहब सिखा रहे हैं. यह हमारे लिए शर्म की बात है अौर इसकी वजह हम खुद हैं. हमने मौका दिया दूसरों को कि वह हमें हमारे मजहब के बारे में बताए.

हम मानते हैं कि भारत का कानून सबसे उपर है. लेकिन हमारी शरिअत का कानून हमारी जान है. शरिअत के कानून में किसी भी तरह की दखल मुसलमान तबका बर्दाश्त कभी नहीं करेगा. लिहाजा हम लोगों को सुप्रीम कोर्ट से दरख्वास्त है कि तलाक देने वाले को ही सजा देने का प्रावधान किया जाये. जिससे तलाक देने वाला, तलाक देने से पहले हजार बार सोंचे. उसके बुरे परिणाम को जाने अौर तलाक जैसे नाजायज चीज से तौबा करले. सजा का प्रावधान सिर्फ कागजी ना हो. इसे हकीकत की जमीन पर भी लाया जाये. ताकि दो लोग, दो परिवार बिखरने से बच जाए. तब होगा सही न्याय. 

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