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दुष्कर्मी बाबा, असहाय सिस्टम, कमजोर सीएम अौर अराजक चेले

संतोष चौरसिया

बीते दिनो में घटी घटना जो कथित गुरु, राम रहीम उर्फ दुष्कर्मी बाबा के इर्द गीर्द घूमती रही. कई राज्यों मे हिंसा आगजनी और दर्जनों लोगों की मौतें हुई. सैकड़ों लोग घायल हुए.

इसका निष्कर्ष अगर निकाला जाए तो ये साफ है की हरियाणा सरकार और मुख्य रूप से सीएम मनोहर लाल खट्टर और भारतीय जनता पार्टी ज़िम्मेवार है.

सीबीआई  कोर्ट ने देर ही सही एक महत्वपूर्ण केस मे बड़ा फ़ैसला सुनाया. मुझे यकीन है बाबा की उंची पहुंच ने फ़ैसला बाधित करने मे कोई कसर नही छोड़ी होगी. इसके बावजूद कोर्ट का फ़ैसला निसंदेह सराहनीय है.

लेकिन इस बीच और इसके बाद क्या हुआ ? चारों ओर हिंसा, अराजकता, उपद्रव और लाशों की ढेर. करोड़ों की संपाति खाक मे मिला दी गयी. समुचा नॉर्थ इंडिया ठहर सा गया. करोड़ों का नुकसान और आम लोगों को गृह युद्ध जैसे हालत मे ज़बरदस्ती झोंक दिया गया.

300 से जयादा वाहन फूंक दिए गये. 20 से ज्यादा दफ्तरोंं मे तोड़फोड़-आगज़नी, कई रेलवे स्टेशनों और ट्रेनों को निशाना बनाया गया. चार से अधिक राज्य प्रभावित हुए.

इस पूरे मामले मे हाई कोर्ट का रुख शुरू से ही साफ रहा. दो दिन मे पांच से ज़्यादा बार सुनवाई, पूरे मामले को नजदीक से मॉनिटर करना और वो सारे काम करना, जो सरकार की जिम्मेदारी थी, कोर्ट ने किया. 

मैं समझता हूं कि इस मामले से जुड़े सबका यही मानना है कि अगर कोर्ट ने एहतियात नही बरती होती, समय पर सही दिशा-निर्देश और सरकार को फटकार नही लगाई होती. तो हरियाणा सरकार और प्रशासन के उदासीन और गैर ज़िम्मेदाराना रवैया मामले को और भयावह बना देता. हालांकि इसकी कोई कसर भी नही छोड़ी गई. कोर्ट के फटकार के बाद भी सरकार और प्रशासन ने कोई वाजिब कदम नही उठाए. हर निर्देश को दरकिनार कर हालात को बद से बदतर जान बूझ कर बनाया गया. 

कोर्ट की इतनी अवमानना और अवहेलना की ऐसी बानगी पहले कभी नही देखी गयी.  ऐसा सिर्फ़ बीजेपी के राज मे ही संभव है. राजनीतिक लाभ के लिए प्रशासन को, सिस्टम को कमज़ोर और पंगु बना दिया गया.

वोटों के लिए इतना गिरते देखना सचमुच असहनीय है. विशेषकर तब जब देश के तीन चौथाई राज्यों मे बीजेपी की सरकार है और नरेंद्र मोदी सत्ता के शीर्ष पर काबिज हैं. 

करोड़ों निर्दोष जनता को अराजक उपद्रवियों के हवाले कर दिया गया. वोट का मोह राजनीति को सबसे निचले स्तर पे ले आया है और लाशों के ढेर पर राजनीति खूब फल-फूल रही है.

देश का बच्चा-बच्चा जनता था की फैसला आने पर डेरा समर्थक क्या क्या कर सकते हैं.  पुलिस प्रशासन, मीडिया और जानकारों ने हिंसा की आशंका बहुत पहले ही व्यक्त कर दी थी. खुफिया रिपोर्ट भी थी. कोर्ट ने आदेश भी कर दिया था. धारा 144 लागू होने के बाद भी लाखों लोग आते रहे, हथियार जमा होते रहे और पुलिस उन्हें रोकने की बजाय उनके रहने का प्रबंध करवाती रही. शांति की अपील करती रही.

पुलिस और प्रशासन की इसी बहादुरी का फायेदा उठाकर शांति के समर्थकों ने भारतीय न्यायपालिका प्रणाली की धज्जियां उड़ाई और सरकार हाथ पे हाथ धरे बैठी रही. फ़ैसला आने के चन्द मिनटों बाद ही मौतें शुरू हो गयी और मज़ाल है की उनपर लाठी चार्ज भी किया जाए. हमारे देश की विडंबना है की यहां धर्म देखकर पता लगाया जाता है की कौन खतरनाक है और किसपे क्या कार्यवाही करनी है.

बाबा इतना प्रभावशाली क्यों बन पाया इसका ज़िम्मेदार कौन है ??

हमारे देश मे बेवकूफ़ लोगों के कमी नही है. हम बहुत जल्द ही किसी को भी गुरु मान लेते हैं और भक्त बन जाते हैं और उनके किसी भी कारनामे को सही मान कर साथ चल पड़ते हैं, फिर सवाल उठाना तो छोड़िए सवाल उठाने वालों का मूंह नोच लेते हैं.

राजनीतिक पार्टियां और बड़े नेता भी इनकी चौखट मे शीश झुकाते हैं और इनका कारोबार चल पड़ता है.

गुरमीत राम रहीम को भी कमोबेश सारी पार्टियों का साथ मिला, कांग्रेस और अकाली से इनकी गलबाहियां जगजाहिर थी. लेकिन भाजपा के लिए बाबा बहुत खास और फयदेमंद साबित हुए हैं.

2014 के चुनाव मे पहली बार भाजपा का खुलकर समर्थन दिया और बहुमत वाली सरकार बनाने मे बड़ी भूमिका निभाई. यही वजह है की सरकार ने हर कदम बाबा का साथ दिया, उनके पैर पूजे जाते रहे, चढ़ावा चढ़ता रहा और डेरे मे नाच गान भी अनवरत चलता रहा.

फ़ैसले के वक़्त बाबा और उनके समर्थकों का खास ध्यान रखा गया हाई कोर्ट के निर्देशों को नज़रअंदाज़ किया गया और निर्दोष जनता को बलि का बकरा बनाया गया.

और अब जब कोर्ट ने सज़ा भी सुना दी है सरकार अपनी पीठ खुद ही थपथपा रही है और शाबाशी ले रही है.

इतना बेहायापन  शायद ही कभी देखी गयी हो.

पर इन सबके बीच कोर्ट का साहसिक और ज़िम्मेदाराना रवैया थोड़ी राहत ज़रूर देता है और न्यायपालिका पे भरोसा मजबूत करता है.

जनता को चाहिए की खुली आंखों से देखना शुरू करे और ऐसे ढोंगी बाबा और कमज़ोर सरकार को सही अंज़ाम तक पहुचाए.

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