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हर किसी के बस में नहीं, यूं ‘गुलज़ार’ हो जाना

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Ranchi, 18 August: आज साहित्यिक-सिनेमाई दुनिया की ऐसी शख्सियत का जन्मदिन है, जिसके बिना भारतीय सिनेमा कुछ अधूरा सा लगता है. लेखक, निर्देशक, प्रोड्यूशर, शायर, गजलकार, गीतकार जैसी तमाम पहचान उनके नाम जुड़ी हैं. जी हां, हम बात कर रहे हैं बहुमुखी प्रतिभा के धनी ‘गुलज़ार साहब उर्फ संपूरन सिंह कालरा’ की.

वो सुबह जिसने संपूर्ण सिंह कालरा को ‘गुलज़ार’ बना दिया

नए साल की मुबारकबादों से गूंजती 1 जवनरी 1963 की सुबह एक फिल्म रिलीज़ हुई, नाम था बंदिनी. निर्देशक बिमल रॉय की इस फिल्म में खास किरदार अदा किये थे धर्मेंद्र, अशोक कुमार और नूतन ने फिल्म के बाकी गाने तो शैलेंद्र ने लिखे थे लेकिन एक गाना संपूर्ण सिंह कालरा ने लिखा था. संपूर्ण ने अपना तख़ल्लुस ‘गुलज़ार’ बनाया था. फिल्म का वो गाना ‘मोरा गोरा अंग लेइ ले, मोहे श्याम रंग देइ दे’ ख़ूब पसंद किया गया और यहीं वक्त का वो मोड़ था जिससे 32 साल के संपूर्ण सिंह कालरा को ‘गुलज़ार’ बना दिया था.

2002 में साहित्य अकेदमी, 2004 में पद्म भूषण और 2008 में आई ‘स्लमडॉग मिलेनियर’ के गाने ‘जय हो’ के लिए ऑस्कर अवार्ड जीतने वाले गुलज़ार साहब गानों के अलावा, आशीर्वाद (1968), खामोशी (1969) , सफर (1970) , घरोंदा , खट्टा-मीठा (1977) और मासूम (1982) जैसी फ़िल्मों की पटकथा भी लिख चुके है. इसके अलावा उन्होंने 1971 में ‘आई मेरे’ अपने 1972 में आई ‘कोशिश’, ‘परिचय’ और 1973 में आई ‘अचानक’ का निर्देशन भी किया.
गुलज़ार साहब ने क्या खुब कहा है-
”आइना देख कर तसल्ली हुई
हम को इस घर में जानता है कोई”

गुलज़ार की सालगिरह के मौके पर इस गाने का ज़िक्र न हो तो बात अधूरी रहेगी.‘इजाज़त’ फिल्म के इस गाने की बात ही कुछ ऐसी है कि आज भी ये गाना तमाम लोगों की ज़बान पर रहता है. ‘मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है’.

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