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समर्पित कार्यकर्ताओं का पत्ता साफ कर ठेकेदार और चाटुकार बना दिये गये पार्टियों के पदाधिकारी

Satya Sharan Mishra

Ranchi, 25 August: बदलते दौर के साथ राजनीति का भी स्टाइल बदला है. राजनीति में नैतिक मूल्यों को दरकिनार कर फैसले लिये जा रहे हैं. चाहे देश की बड़ी पार्टी हो या छोटी पार्टी सभी एक ही राह पर चल पड़े हैं. पार्टी के संविधान, आदर्श और परंपरा की बहुत बातें होती है, लेकिन इन्हें मानता कौन है. हर राजनीतिक पार्टी में ठेकेदार और चाटुकार पदाधिकारी बन बैठे हैं. पुराने और कर्मठ कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर पार्टी नेतृत्व ने इन तथाकथित राजनेताओं को पार्टी का पदाधिकारी नियुक्त कर दिया है. कोई चुनाव नहीं, कोई मशिवरा नहीं. जो व्यक्ति सरकार, पार्टी अध्यक्ष और वरिष्ठ नेताओं का करीबी या उनकी जी हुजूरी करता है उसे कुर्सी पर बैठा दिया गया है. भले ही उसे संगठन के इतिहास और संविधान की जानकारी हो या न हो. इसमें सबसे ज्यादा आगे भारतीय जनता पार्टी है. झामुमो, कांग्रेस, झाविमो और राजद जैसी पार्टियां भी इसी राह पर है.

जननेता नहीं मैनेजर बनाये गये हैं पदाधिकारी

प्रदेश भाजपा के सभी बड़े पदों पर चाटुकार और ठेकेदार बैठे हुए हैं. प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मण गिलुआ ने जो कमेटी बनायी है उसमें अपने खास लोगों और मुख्यमंत्री के करीबियों को जगह दी है. इसमें से ज्यादातर वैसे लोग हैं जो मैनेजमेंट में माहिर हैं. इनका अपना कोई जनाधार नहीं है. पार्टी के लिए 50 वोट भी नहीं जुगाड़ कर सकते. जनता के बीच कोई पकड़ नहीं है. सिर्फ अखबारों में हर रोज अपनी विज्ञप्तियां छपवाकर ये लोग खुद को संगठन और सरकार के सामने लाने की कोशिश करते दिखते हैं. कांग्रेस में भी यही हाल है. जितने भी पदाधिकारी बनाये गये हैं उनमें से ज्यादातर जननेता नहीं हैं और न ही लंबे समय से पार्टी के कार्यकर्ता रहे हैं. झामुमो में कई सालों से दो महासचिवों का कब्जा है. यह दोनों भी जननेता नहीं हैं. झाविमो में भी बाबूलाल मरांडी और प्रदीप यादव को छोड़कर कोई बड़ा चेहरा नहीं है.

जिन्हें कोई नहीं जानता उन्हें बना दिया गया प्रवक्ता

प्रवक्ता किसी भी पार्टी का आइना होते हैं. पहले वैसे लोगों को पार्टी में प्रवक्ता बनाया जाता था जो जननेता होते थे. जिनका जनता के साथ-साथ पार्टी के नेताओं से भी अच्छे संबंध होते थे, लेकिन आज जो प्रवक्ता बनाये जा रहे हैं जननेता नहीं हैं. भाजपा जैसी बड़ी पार्टी ने जो पांच प्रदेश प्रवक्ता बनाये हैं उनमें से एक भी जननेता नहीं है. कोई रिटायर्ड नौकरशाह, कोई वकील, कोई व्यवसायी, कोई ठेकेदार तो कोई चापलूस है. अगर ये जनता के बीच जायें तो इन्हें 100 वोट भी बमुश्किल मिले. जनता के बीच पहुंच तो दूर पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच भी इनकी लोकप्रियता नहीं है. प्रवक्ता कक्ष में बैठकर दिनभर हंसी ठिठोली करने के अलावा इनके पास दूसरा कोई काम नहीं है. दिनभर ऑफिस में बैठकर शाम तक एकाध प्रेस रिलीज जारी कर और इलेक्ट्रानिक मीडिया को बाइट देकर ये लोग अपने कपड़े झाड़ घर निकल जाते हैं. झामुमो में तो वही दो महासचिव प्रवक्ता की भूमिका में सालों से चले आ रहे हैं. कांग्रेस में तो प्रवक्ता नाम मात्र के हैं. महासचिव ही मीडिया से रूबरू होते हैं. बाबूलाल मरांडी को अपने पार्टी की स्थित मालूम है इसलिए वे खुद मीडिया के बीच आते हैं. कभी-कभार बंधु तिर्की प्रेस कॉन्फ्रेंस बुला लेते हैं.

ठेका मैनेज कर कमीशन लेते हैं कई पदाधिकारी

पार्टी पदाधिकारियों का दायित्व संगठन को मजबूत करने का होता है. पदाधिकारी पहले संगठन के कार्यकर्ता होते हैं. संगठन की नीतियों और सिद्धांत को मानकर वो पार्टी से जुड़ते हैं. संगठन इन्हें पैसे नहीं देता, लेकिन समाज में प्रतिष्ठा देता है. पार्टी कार्यकर्ताओं से उनका थोड़ा वक्त संगठन के लिए लेती है. जिन्हें पद मिला होता है उनकी जिम्मेवारी थोड़ी ज्यादा होती है. आजकल अधिकतर पार्टी के पदाधिकारी पद की आड़ में ठेका मैनेज करने में लगे हैं. ठेका दिलवाने के एवज में ये लाखों-करोड़ों रुपये कमीशन लेते हैं. सरकार में रहने वाले पार्टी के अधिकतर पदाधिकारियों की पहचान तो ठेकेदार के तौर पर ही है.

इसलिए पुराने और समर्पित कार्यकर्ता

छोड़ रहे पार्टी ऐसा नहीं है कि संगठनों में पुराने, समर्पित और योग्य कार्यकर्ताओं की कमी है, लेकिन इन चाटुकारों और ठेकेदारों के आगे वे बेबस हो जाते हैं. किसी भी पार्टी के कार्यसमिति का लिस्ट उठाकर देख लिजिए, उसमें ज्यादातर दूसरे दलों से आये लोग और बड़े नेताओं के करीबियों को जगह मिलती है. चाटुकारी और जी हुजूरी करने वाले कार्यकर्ताओं को मलाईदार पद दे दिया जाता है और सालों से पार्टी के लिए संघर्ष करने वाले कार्यकर्ताओं को किनारे कर दिया जाता है. जब भी नई कार्यसमिति का गठन हुआ है लगभग सभी पार्टियों से बागवत की खबर आयी है, लेकिन आलाकमान ने कभी उन कार्यकर्ताओं का दर्द समझने की कोशिश नहीं की और इसलिए अपनी उपेक्षा से नाराज सैकड़ों कार्यकर्ता दूसरी पार्टी का दामन थाम लेते हैं.

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