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मौकापरस्तों से कब आजाद होगा भारतीय क्रिकेट?

ADITYA VERMA

70 साल के आजाद भारत में क्रिकेट संघ आज भी मौकापरस्त लोगों के हाथों की कठपुतली है. बिहार क्रिकेट संघ ने देश की आजादी के 12 वर्ष पूर्व ही मान्यता प्राप्त कर ली थी. यानी संघ 1935 में गठित होकर काम करने लगा था. फिर भी गुलाम भारत देश के अंदर क्रिकेट संघ आजाद था. आजादी का अभिप्राय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान और ईमानदारी से कार्यों का निर्वहन है. कालांतर में क्रिकेट संघ को आगे ले जाने की जिम्मेवारी जिन्हें मिली, ऐसा नहीं है कि उन्होंने विकास के लिए प्रयास नही किए. लेकिन निजी स्वार्थ, लोभ या कोई अन्य वजहों से उन्होंने अपनी जिम्मेदारी का ठीक से निर्वहन नही किया. बिहार क्रिकेट संघ के सचिव अादित्य वर्मा ने अाईएनएस से लंबा लेख लिखा है. हम यहां उस लेख का अंश प्रकाशित कर रहे हैं.


1983 के बाद क्रिकेट संघ को अात्मनिर्भर बनाने की हुई कोशिश

1983 के विश्व कप जीतने के बाद देश के अंदर क्रिकेट ने धर्म का रूप ले लिया. संघ को आगे लाने और आत्मनिर्भर बनाने के प्रयास किए जाने लगे. विभिन्न प्रकार के टूर्नामेंटों का आयोजन कर खेल के विकास के साथ धनोपार्जन का प्रयास भी जारी रहा. इसी कड़ी में आईपीएल का आयोजन खिलाड़ियों के आर्थिक विकास के साथ संघ को स्वावलंबन बनाने में मील का पत्थर साबित हुआ.


बीसीसीअाई विश्व का सबसे धनी खेल संघ
 

कहावत है की विकास अपने साथ नैतिक और प्राकृतिक विनाश को लेकर आगे बढ़ता है. देश की आबादी और क्रिकेट का जुनून सर चढ़ कर बोलने लगा. बीसीसीआई विश्व के सबसे धनी खेल संघ के रूप में सामने आया. अब खेल संघ में बने रहने का नशा कुछ अवसरमंद लोगों को परवान चढ़ने लगा. नियमों में बदलाव कर अपने समर्थक को लाभ पहुंचाकर सत्ता में स्थापित रहने की भूख मिटाई जाने लगी.


चौथा स्तंभ भी क्रिकेट का स्वाद पाने में लग गये

स्वतंत्र भारत देश के लाखों युवाओं, बच्चों को खेल से वंचित रखा गया, यानी आजाद भारत देश के कुछ लोग अपने स्वार्थ के लिए लाखों युवाओं को अपनी गुलामी करने के लिए विवश कर दिए. जिस अन्याय, अत्याचार को पदार्फाश करने की जिम्मेवारी समाज के चौथे स्तंभ को थी, वो भी इसके स्वाद को पाने के प्रयास में लिप्त दिखे या यह कहा जाये की कुछ लोगों को छोड़कर बीसीसीआई के पदाधिकारियों ने इन्हे 'एनटी सिपेटरी ऑबेडियेंट' बना दिया.


सिर्फ न्यायालय जाने का रास्ता बचा

ऐसे में पीड़ितों के पास जाने का एक ही रास्ता बचा था वो है 'न्यायालय'. जैसा की हम सबको मालूम है कई वर्षों की जिरह और पैनल गठन करने और उनके सिफारिशों को हूबहू आत्मसात करने के उपरांत माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने 18 जुलाई, 2016 को एक ऐतिहासिक आदेश सुनाया. आज उस आदेश के एक वर्ष से अधिक होने को हैं, नया क्रिकेट सत्र शुरू होने वाला है लेकिन अभी तक आदेश का पालन नही हुआ.


क्रिकेट खेलने की अाजादी मांग रहे हैं युवा

आज देश की आजादी के 70 वर्ष पूरे हो गए, लेकिन देश का सबसे वंचित क्षेत्र नार्थ ईस्ट स्टेट है. भारत का तीसरा अधिक जनसंख्या वाला प्रदेश बिहार, उत्तराखंड, पांडिचेरी के युवा चीख-चीखकर बीसीसीआई से क्रिकेट खेलने की आजादी मांग रहे हैं. जिन युवाओं का क्रिकेट खेल धर्म है और इस खेल के प्रति जो जुनून है, यदि हम उससे इन्हें महरूम रखे तब यह गुलामी से उपर कुछ भी नही है. जब देश के अन्य क्षेत्रों में भागीदारी से हमें वंचित नही रखा गया है, तब इस खेल से अलग क्यूं ? हमारे राज्य के युवा देश की सरहद की रक्षा करते हुए प्राण की बलि दे सकते हैं तब उनके भाई, बहन को खेलने से वंचित क्यों रखा गया है. मणिपुर की मेरी कॉम भारत देश के लिए ओलंपिक में मेडल प्राप्त कर सकती है, तब उनका बेटा, भाई, बहन उस राज्य मे रहने वाले क्रिकेट क्यों नही खेल सकते हैं ?

(लेखक बिहार क्रिकेट संघ के सचिव हैं. ये इनके निजी विचार हैं)

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