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डेंटल इंप्लांट लौटाता है दांतों की मजबूती व खूबसूरती

पवन ठाकुर News Wing Ranchi, 16 August : खूबसूरत मुस्कान और जादुई आंखें किसे अच्छी नहीं लगतीं. मुस्कुराहट हमारे चेहरे की खूबसूरती भी बढ़ाती है. एक अध्ययन में पता चला है कि मुस्कान सुंदरता बढ़ाने के साथ-साथ हमें जवान दिखने में मदद करती है. शायद इसीलिए सभी को खूबसूरत मुस्कुराहट की चाहत होती है. खूबसूरत दांत व्यक्तित्व को तो निखारता ही है, खूबसूरती में भी चार चांद लगा देता है. अगर आपके दांत आपकी खूबसूरती को बढ़ाने की बजाय कम कर रहे हैं तो आप डॉक्टर की सहायता लेकर उसे खूबसूरत बना सकते हैं. राजधानी के मशहूर ओरल और मैक्सिलोफेशियल सर्जन डॉ ओमप्रकाश ने बताया कि कैसे दंत प्रत्यारोपण के जरिये अपनी मुस्कान को आप खूबसूरत बना सकते हैं.

क्या है डेंटल इंप्लांट

डेंटल इंप्लांट एक ऐसी तकनीक है जिसमें आर्टिफीसियल दांत लगाने से पहले आर्टिफीसियल दांत की जड़ें लगायी जाती है. यह दांतों की जड़ें टाइटेनियम धातु का एक बेलन अथवा टांकु के आकार का टुकड़ा होता है जिसमें घाट (थ्रेड) बने होते हैं. इस इंप्लांट के ऊपर हाइड्रॉक्सि अपाटाइट क्रिस्टल, प्लाजमा स्प्रे विधि द्वारा लगायी जाती है जिससे इंप्लांट की अस्थि से जुड़ने की प्रक्रिया में आसानी होती है. इंप्लांट स्थिर रूप से अस्थि के भीतर लगभग 3-6 माह तक छोड़ देने पर यह अस्थि से जुड़ जाती है. इस प्रक्रिया को ऑट्रियोइंटेग्रेशन कहते हैं. अस्थि के इंप्लांट से जुड़ जाने पर मसूड़े के अच्छी आकार के लिए जिन्जिभ फार्मर भी लगाये जाते हैं. फिर इसके ऊपर कृत्रिम दांत लगाये जाते हैं, जिसे सिमेंट अथवा स्क्रू की सहायता से फिक्स किया जाता है. कई बार अच्छी प्रकार की अस्थि होने पर हम इंप्लांट लगाने के साथ ही उस पर दांत लगा सकते हैं. हम कई बार इंप्लांट लगाना चाहते हैं पर वहां जबड़े में अस्थि की मात्रा बहुत कम होती है, तो हमें उसे पहले ग्राफ्ट कर अस्थि की मात्रा बढ़ानी पड़ती है. यह कई विधियों से की जाती है. साधारणत: एलोप्लास्टिक मैटेरियल जैसे हाइड्रॉक्सि अपाटाइट का उपयोग किया जाता है. पर कई बार रोगी के जबड़े या दूसरे भागों से ही अस्थि का कुछ भाग निकाल कर इंप्लांट वाली जगह पर लगाते हैं. इससे अस्थि की मात्रा बढ़ती है और इंप्लांट लगाने के लिए उपयुक्त जगह मिलती है. ग्राफ्टिंग के अलावा बोन स्प्लिटिंग (अस्थिभेदन), साइनस लिफ्टिंग जैसी प्रक्रिया से भी इंप्लांट के लिए जगह तैयार की जाती है. कई बार शंकु के आकार का इंप्लांट उपयोग में नहीं लाकर तश्तरी (डिस्क) के जैसे इंप्लांट का उपयोग किया जाता है. जिससे किसी भी कम अस्थि वाले जबड़ों में इंप्लांट एवं दांत को लगाया जा सकता है.

इंप्लांट वाले दांतों के लाभ

इंप्लांट वाले दांतों के कई लाभ हैं, यह बिल्कुल प्राकृतिक दांतों की तरह लगता है जिससे हम बड़े ही आसानी से खाना चबा कर खा सकते हैं. रोगी का आत्मविश्वास वापस आ जाता है. इसे खोलने और वापस लगाने की जरूरत नहीं पड़ती. इंप्लांट लगाने पर जबड़ों का कमजोर होना (रिजॉर्पसन) रुक जाता है.

सफाई पर देना है ध्यान

इंप्लांट के उपयोग के बाद मुंह की सफाई पर विशेष ध्यान देना चाहिए. दातों की हमेशा सफाई करते रहने चाहिये. साधारण प्राकृतिक दांतों में अल्ट्रासोनिक मशीनों द्वारा सफाई की जाती है, उस तरह की विधि का उपयाग इंप्लांट पर नहीं किया जाता है, बल्कि हाथों द्वारा विशेष उपकरणों से सफाई की जाती है.

मधुमेह रोगियों में उचित नहीं

डॉ ओमप्रकाश कहते हैं कि ऐसे व्यक्ति जिनमें मधुमेह रोग के कारण रक्त में चीनी की अधिकता है, अस्थि में संक्रमण या ऐसा रोग है जिससे अस्थि की बनावट बदल गयी है या अस्थि बहुत ही कमजोर है, ऐसे में इंप्लांट लगाना अत्यधिक कठिन होता है और इसके असफल होने की आशंका भी ज्यादा होती है. ऐसे रोगियों में इंप्लांट लगाना उचित नहीं होता है.

कम इंप्लांट में जुड़ते हैं नकली दांत

इंप्लांट की कम संख्या होने पर इसके साथ नकली दांत (खोलने और पहनने वाला दांत) भी जोड़ा जाता है, जिससे इसे पहन कर उपयोग में लाना आसान हो जाता है. इससे जिन लोगों के नकली दांत पूर्व में ठीक थे पर समय के साथ ढीले पर गये हों उनको फिर से उपयोग के लायक बनाया जा सकता है.

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