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क्या सच में स्मार्ट है, एचईसी में बनने वाली स्मार्ट सिटी ?

Roopak Raag

कल ही देश के उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने रांची स्मार्ट सिटी की आधारशिला रखी. झारखंड सरकार ने बड़े तामझाम से स्मार्ट सिटी शिलान्यास का आयोजन किया. रांची को स्मार्ट सिटी बनाये जाने को लेकर हर कोई खुश और उत्साहित था. तरह-तरह के सपने और कल्पनाएं रांची वासियों के मन में उमड़ रही थीं. मगर जब सरकार ने इसकी आधिकारिक घोषणा की तो राजधानीवासियों की सारी आकांक्षाएं धरी की धरी रह गईं. स्मार्ट रांची का सपना चकनाचूर हो गया. लोगों ने जब आज सुबह का अखबार देखा तो उनका भ्रम टूट गया. स्मार्ट सिटी के रूप में पूरी राजधानी को नहीं बल्कि इसके एक छोटे से हिस्से को विकसित किया जाएगा. स्मार्ट सिटी का दायरा महज साढ़े छह सौ एकड़ है. यह क्षेत्रफल के हिसाब से इतना कम है कि इससे बड़े-बड़े गांव-कस्बे मिल जाएंगे.

क्या सरकार हमें मूर्ख बना रही है?

मात्र 656 एकड़ भूमि पर सरकार स्मार्ट सिटी कैसे डेवलप कर सकती है. आखिर सिटी की परिभाषा क्या है. सामान्यतः जब किसी बसाहट की आबादी 5 लाख से अधिक हो जाती है तब उसे नगर यानी सिटी माना जाता है. 5 लाख से कम आबादी की बसाहट को शहर यानी टाउन की श्रेणी में रखा जाता है. झारखंड सरकार ने जमीन के छोटे से टुकड़े को सिटी ही नहीं स्मार्ट सिटी बनाने की घोषणा की है. अगर उस स्मार्ट रांची सिटी में पांच लाख लोग भी रहते हैं तो प्रति एकड़ 762 लोगों का दबाव होगा. ऐसे में उस स्मार्ट सिटी की स्मार्ट फैसिलीटिज का क्या हश्र होगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है. एक सुविधा-संपन्न बड़े दायरे में फैले सिटी के आम कॉन्सेप्ट के उल्ट रांची स्मार्ट सिटी दरअसल एक वार्ड से भी छोटे इलाके में बनाई जानी है.

कौन रहेंगे, बसेंगे उस स्मार्ट सिटी में

स्मार्ट सिटी करीब 10 हजार करोड़ रुपये की लागत से बनने वाली है. क्षेत्र भी बेहद छोटा है. इससे साफ है कि उस स्मार्ट सिटी में आर्थिक-राजनीतिक रूप से केवल स्मार्ट यानी सक्षम लोग ही रहेंगे. झारखंड में स्मार्ट वर्ग में नेता, अफसर और ठेकेदार शामिल हैं. इतना तो तय है कि हम-आप जैसे मेहनतकश, साधारण लोग उस स्मार्ट सिटी में जगह पाने से रहे. जाहिर है कि स्मार्ट सिटी का शिलान्यास लोगों को मूर्ख बनाने और राजधानीवासियों के सपनों के साथ मजाक करने जैसा है.

रांची स्मार्ट सिटी बनाम हमारी रांची

हर शहर में एकसाथ कई आर्थिक और सामाजिक वर्ग रहते हैं. उनमें आमदनी और पेशों के आधार पर रहन-सहन और सामाजिक अंतर होता है. मगर सरकार द्वारा दी जा रही नागरिक सुविधाओं में यह अंतर अगर झलकने लगे तो यह लोकतंत्र में समानता के अधिकार का भी हनन है. सिंधु सभ्यता के नगरों में भी ऐसा अंतर था. नगर का एक हिस्सा सभी नागरिक सुविधाओं से संपन्न और दूसरा हिस्सा साधारण तरीके से बना हुआ. जाहिर है कि सिंधु सभ्यता के नगरों के सुविधा संपन्न हिस्से में सक्षम वर्ग के लोग ही रहते होंगे. रांची स्मार्ट सिटी बनाम हमारी रांची जो कई वर्गों की आबादी का मिश्रित निवास है, को भी उसी वर्गीय वंचना और अन्याय के दायरे में देखना होगा. स्मार्ट रांची में जीने-खाने और रहने के खास तौर-तरीकों के मानक होंगे जो केवल सक्षम और वर्गीय रूप से स्वघोषित सभ्य जमात ही पूरी करते हैं. रांची नगर की 13 लाख जनता का वह स्मार्ट सिटी नहीं बल्कि उसकी न्यूनतम नागरिक सुविधाओं की वंचना पर मजाक उड़ाता हुआ राजसत्ता का तमाशा है.

हमारे हिस्से में क्या ?

तो साफ है कि उस स्मार्ट रांची से 99 फीसदी जनता बाहर है. हम रांची के लोग जो अपनी मौलिक नागरिक सुविधाओं की त्रासदी झेल रहे हैं, उनके लिए सरकार की क्या योजना है. जेएनएनयूआरएम यानी जवाहरलाल नेहरू शहरी विकास योजना का पैसा 12 सालों में कभी भी सरकार द्वारा ठीक से इस्तेमाल नहीं किया गया. इसी योजना का लाभ उठा कर देश के कई शहरों का कायाकल्प हो गया. सड़क, बिजली, पानी, नाली, पार्क, नगर-परिवहन, साफ-सफाई हर मामले में सूरत, विशाखापत्तनम, इंदौर जैसे शहर आज अपने राज्य की राजधानियों को भी मात देते हैं. मगर यहां ग्रेटर रांची डेवलपमेन्ट ऑथोरिटी, नगर विकास विभाग और नगर निगम के बीच नुराकुश्ती और भ्रष्टाचार के रिकॉर्ड बनते रहे.

हमारे सीएम एक वक्त नगर विकास मंत्री भी थे

अर्जुन मुण्डा के कार्यकाल में हमारे मौजूदा सीएम रघुवर दास नगर विकास मंत्री रहे थे. इन्होंने रांची को विश्वस्तरीय शहर बनाने के नाम पर 2005-06 में कई यूरोपीय और एशियाई शहरों का दौरा एक पूरे कुनबे के साथ किया था. उस वक्त कहा था कि हम ऐसी रांची बनाएंगे कि एक विकलांग भी व्हील चेयर पर बैठकर पूरी राजधानी घूम सकेगा. आज करीब 12 साल बीत चुके हैं. राजधानी रांची का क्या हाल है? इससे बेहतर स्थिति एक सदी पहले बसे टाटानगर की है और आधी सदी पहले बसे बोकारो स्टील सिटी की है. या जहां स्मार्ट सिटी रांची बननी है उस एचईसी के टाउनशिप के अवशेष को ही देख लें. यह भी 50 के दशक में बनी थी जहां अंडरग्राउंड सिवेज-ड्रनेज से लेकर स्ट्रीट लाईट के पोल, पैदल और साइकिल से चलनेवालों के लिए अलग ट्रैक के निशान आज भी देखे जा सकते हैं. गुलजार एचईसी के दौर में इसकी भव्यता का अंदाजा इसके जर्जर टाउनशिप के निशान देते हैं. मगर हमारी आज की रांची कैसी है. एक लापरवाह और जनता के दुखों से परे शासन व्यवस्था का जीता-जागता अव्यवस्थित नागरिक सुविधाविहीन नगर.

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