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असहमति के बावजूद बोलने के अधिकार का समर्थन (सन्दर्भ : सौवेंद्र शेखर की रचना पर विवाद)

श्रीनिवास
वरिष्ठ पत्रकार



किसी की प्रताड़ना का विरोध करना संबद्ध लेखक/कलाकार की कृति या उसके विचार का समर्थन करना नहीं होता किसी लेखक की किसी रचना को अश्लील या आपत्तिजनक मानने, उसका विरोध करने, पाठकों से उसकी ऐसी रचना को न पढ़ने की अपील करने और सरकार से उस पर बैन लगाने की मांग करने का अधिकार किसी को भी है. सरकार को भी अधिकार है कि उचित कारण हो, तो उसे प्रतिबंधित कर दे. (हालांकि इस अधिकार का बहुधा दुरूपयोग ही होता है) लेकिन जब कोई समूह एक समुदाय के किसी लेखक या कलाकार के खिलाफ योजनाबद्ध अभियान चलाये, एक समुदाय की भावनाओं को भड़का कर उसके सामाजिक बहिष्कार; यहां तक कि उसके पूरे परिवार को प्रताड़ित करने (बिठलाहा) की हद तक चला जाये, तो समाज के अन्य लोगों को भी यह अधिकार है कि वे इस अभियान को असहिष्णुता मान कर उसकी आलोचना करें. मगर जरूरी नहीं कि इस आलोचना में शामिल हर व्यक्ति लेखक की संबद्ध रचना का प्रशंसक भी हो.

किसी के अधिकारों का समर्थन, उनके विचारों के समर्थन से अलग होता है

मगर अचानक चर्चित और विवादास्पद हो गये एक संथाली लेखक हंसदा सौवेंद्र शेखर के प्रसंग में यही स्थापित करने का प्रयास हो रहा है. यह न तो सही है, न उचित. याकूब मेनन की फांसी के संदर्भ में भी ऐसा ही प्रचारित किया गया; अब भी कहा जा रहा है कि जिन लोगों ने याकूब के मृत्युदंड को बदल देने की मांग की, वे सभी उसके अपराध का, यानी आतंकवाद का समर्थन करनेवाले हैं. सच यह है कि उनमें अधिकतर ऐसे लोग थे, जो सिद्धांतत: मौत की सजा को गलत मानते हैं.

हम जैसे लोग तो मानते हैं कि किसी भी अभियुक्त, चाहे उस पर कितने भी गंभीर आरोप हों, को एक नागरिक के रूप में उसके कानून सम्मत अधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए. यही हमारा संविधान भी कहता है. इसी आधार पर हम फर्जी मुठभेड़ को भी गलत मान कर उसका विरोध करते हैं. भले ही पुलिस की ऐसी दरिंदगी का शिकार हत्यारा ही हो. इसका मतलब यह नहीं कि हम उसके अपराध का भी समर्थन करते हैं. तसलीमा नसरीन, मकबूल फिदा हुसैन या सलमान रुश्दी को प्रताड़ित करने, उनकी मौत का फतवा जारी करने और उन पर हमला किये जाने की आलोचना का भी अर्थ यह नहीं है कि ऐसे सारे लोग उनकी कृतियों के प्रशंसक भी हैं.

श्लीलता और अश्लीलता दोनों समाज के सापेक्ष

सच तो यह है कि मैंने खुद श्री शेखर की कोई रचना नहीं पढ़ी है. और अखबारों या फेसबुक पर उनके लेखन का जितना हिस्सा पढ़ा है, वह मुझे भी निहायत फूहड़, नर- नारी के अंतरंग दैहिक संबंधों का गैरजरूरी खुला चित्रण ही लगा. उसे बेशक अश्लील कहा जा सकता है. हालांकि श्लील और अश्लील की ठीक परिभाषा मैं जानता नहीं. साथ ही यह भी लगता है कि यह परिभाषा समय और समाज सापेक्ष ही हो सकती है, जिस पर मतांतर की गुंजाइश भी बनी रहेगी. वैसे भी भारत में ही अनेक प्रतिष्ठित रचनाकारों- मंटो और इसमत चुगताई आदि- पर अश्लील लेखन के आरोप लगे हैं, मुकदमें भी हुए और उनकी किताबों पर प्रतिबंध भी लगा. मगर आज भी वे सम्मानित हैं. अश्लीलता का आरोप तो विश्व में समादृत कालिदास पर और जयदेव व विद्यापति पर भी है.

क्या विरोध की वजह समाज विशेष की स्त्री के मिथुन चित्रण है

विश्व भर में जगह जगह, यहां तक कि मंदिरों में भी उत्कीर्ण नग्न व मिथुन मूर्तियों को भी उसी श्रेणी में रखा जा सकता है, जिन्हें आज कला का उत्कृष्ट नमूना और धरोहर माना जाता है. हालांकि संबद्ध लेखक की रचनाएं तो शायद किसी लिहाज से श्रेष्ठ नहीं मानी जायेंगी. मगर मुझे नहीं लगता कि उनके खिलाफ लामबंद हुए लोगों की मूल आपत्ति उनके लेखन में प्रछन्न अश्लीलता से है. आपत्ति या नाराजगी एक समुदाय की महिलाओं के गलत चित्रण से है. यह आपत्ति उचित हो सकती है. लेखक और उनकी रचनाओं के खिलाफ प्रतीकात्मक विरोध-प्रदर्शन में भी कोई हर्ज नहीं है. 

 

साहित्य अकादमी के फैसले पर आपत्ति

ऐसे लेखक और उसकी रचना को पुरष्कृत करनेवाली संस्था साहित्य अकादमी के समक्ष आपत्ति दर्ज करना एक सही कदम है. वैसे भी इस प्रकरण से साहित्य अकादमी की चयन प्रक्रिया और उसके स्तर पर भी सवालिया निशान लगा है, जिसके सदस्य बिना पढ़े या पर्याप्त विचार-विमर्श के ही ऐसे निर्णय कर लेते हैं. 

मगर इस प्रसंग में विरोध का एक विपरीत नतीजा यह हुआ है कि कल तक जिस लेखक को कोई नहीं जानता था, अचानक चर्चित हो गया; और बहुतेरे लोग उन रचनाओं को पढने को उत्सुक हो गये हैं. प्रतिबंधित पुस्तकों के प्रति वैसे भी, वह भी यदि प्रतिबन्ध ‘अश्लीलता’ के कारण लगा हो, एक आकर्षण होता ही है.

असहमति के बावजूद बोलने के अधिकार का समर्थन

अंत में एक सवाल यह कि यदि इसी लेखक ने किसी अन्य समुदाय की महिलाओं का ऐसा ही चित्रण किया होता, क्या तब भी ये उसके खिलाफ ऐसा ही अभियान चलाते? मुझे तो संदेह है. हम तो महान फ्रांसीसी विचारक/लेखक वाल्तेयर के इस चर्चित कथन के कायल हैं कि ‘मैं तुम्हारे विचारों से असहमत हूं, मगर अपने विचार प्रकट करने के तुम्हारे अधिकार की रक्षा के लिए मैं अपनी जान की बजी तक लगा सकता हूं. (‘I disapprove of what you say, but will defend to the death your right to say it.’) और यही तो एक सभ्य समाज और लोकतांत्रिक देश का आदर्श हो सकता है, होना चाहिए.

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