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अपना घर उजड़ गया,लेकिन दूसरों का घर कैसे बसाती हैं झारखंड माता (जानिए उन्हीं की ज़ुबानी)

मो असगर खान

Ranchi, 6 September: रांची में रह कर मैंने झारखंड माता के बारे में काफी कुछ सुना था... सोचा उनसे मिलकर उनके बारे में जानूं. इसी उत्सुक्ता के साथ मैं उनके घर पहुंचा और कहा कि मैं प्रेस से आया हूं... झारखंड माताः पांच मिनट बैठिए नमाज पढ़ लेती हूं. इस बीच छोटे से कमरे में उनके साथ रह रही आफरीन, चांदनी, जीनत और पास में खेल रहे वारिस और साइका भी आ गई थी. सभी ने चारो ओर से मुझे  घेर लिया.

नमाज़ अब खत्म हो चुकी थी, और मैंने पूछा कि आपका नाम झारखंड माता क्यों पड़ा? ये पुछने पर, झारखंड माता कहती कि मेरा नाम तो हुसना बानो है, लेकिन लोग मुझे झारखंड माता पुकारते हैं. चूंकि पिछले 40 वर्षों से मैं अनाथ और असहाय लोगों के बच्चों को पाल-पोस कर उनका घर बसा रही हूं.

ठोंगा और कोयला बेचकर करती है गुजारा

उनके रहन-सहन को देखकर, मैंने फिर से पूछा कि आप इन्हें पालने के लिए पैसा कहां से लाती हैं? तो 63 वर्षीय हुसना बानो बताती हैं कि मेरे पति का 20 साल पहले इंतकाल हो गया था, तब से मैं इन्हें ठोंगा और कोयला बेचकर पालती हूं.

उनकी ये प्रेरणादायक कहानी वहां मौजूद चांदनी परवीन अपनी जुबानी चारितार्थ करती हैं. फिर आगे हुसना बानो पूरी कहानी सुनानें लगती हैं.

22 लड़कियों पाल-पोस कर घर बसा चुकी हैं माता

अपने खुद के बच्चे होने के बावजूद झारखंड माता को अनाथ बच्चों से बहुत गहरा लगाव हैं. चार दशक पहले जब उन्हें कुड़े पर पड़ा हुआ चार माहीने का बच्चा मिला था, तब से उन्होंने इस मानव सेवा को अपना पूरा जीवन समार्पित कर दिया. कोई भी अनाथ बच्चा मिल जाता, या कोई परिवार आर्थिक तंगी से बच्चे की परवरिश में कोताही करता तो झारखंड माता उर्फ हुसना बानो वहां पहुंचकर उसे गोद ले लेती. फिर अपना बच्चा समझकर उसे पढ़ाना और बड़ा कर उसका घर बसाना उनकी पहली जिम्मेदारी होती है.

25 बच्चों को ले चुकी हैं गोद

अब तक बानो ने 25 बच्चों को शिशु अवस्था में गोद ले चुकी हैं. इसमें 22 लड़कियां शामिल हैं, जिनकी शादी भी अपने खर्चे से ही बानो ने कराया हैं.

आशियाना उजड़ा लेकिन हौसला नहीं टूटा

2014 के इस्लाम नगर अतिक्रमण में उनका भी आशियाना उजड़ गया था. लेकिन ये सितम अनाथ बच्चों के प्रति उनके मानव संकल्प को सेंध नहीं लगा सका.

सम्मान के नाम पर सिर्फ सर्टिफिकेट मिला

झारखंड माता के इस नि:स्वार्थ काम के लिए समाजिक संस्थानों की तरफ से सम्मान तो खुब मिले लेकिन आर्थिक सहयोग के नाम पर कुछ नहीं. दूसरे के बच्चों को अपने खुन-पसीने की कमाई से पालने वाली झारखंड माता की तारिफ करते लोग नहीं थकते. चूंकि काम अति सराहनीय है, इसलिए समाजिक संस्थाओं ने हुसना बानो को इसके लिए सम्मानित भी किया. महिला उत्पीड़न विरोधी एवं विकास समिति, लोकसेवा समिति, शी वीमेन इम्पवरमेंट, उत्संग, अग्रवाल सभा रांची, इस्लामिक डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन आदि जैसी संस्थाओं प्रश्तसित प्रमाण पत्र जरुर दिया, लेकिन आर्थिक सहयोग के नाम पर कुछ भी राशि नहीं दी गई.

किराये के मकान में रहती है झारखंड माता

फिलहाल बानो आजाद बस्ती स्थित किराए के मकान में रहकर पांच अनाथों का भविष्य बनाने में लगी हैं, जहां उन्हें बिजली बिल से लेकर हर एक सुविधा के लिए पैसा देना पड़ता है. आमदनी के लिए रात-दीन ठोंगा बनाना और कभी-कभार कोयले की बोरियां बेच कर जो पैसे आते हैं उसी से घर का किराया और बच्चों का पालन-पोषण करती हैं झारखंड माता.

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