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'तीन तलाक’ गलत...

श्रीनिवास, वरिष्ठ पत्रकार

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला. हालांकि फैसला ‘बहुमत’ का है, यानी खंडपीठ के पांच में से तीन जज ने तो गलत माना, पर दो इस निष्कर्ष से असहमत रहे. यानी तीन में से एक जज की राय भिन्न होती, तो फैसला भी भिन्न होता. इसलिए संभव है, यह मामला बड़ी खंडपीठ में जाये.

मुझे ‘तीन तलाक’ में मर्द को मिले एकतरफा अधिकार से आपत्ति है. मगर मानता हूं कि एक बार पति-पत्नी के रिश्ते में न भरने लायक दरार पड़ जाये तो दोनों के हित में है कि वे अलग हो जायें. हां, भारत या एशियाई देशों में महिलाओं की कमजोर स्थिति के मद्देनजर ऐसे विवाह विच्छेद में उनके हितों का ध्यान रखना जरूरी अवश्य है, पर तलाक को निरस्त नहीं किया जा सकता.

दकियानूस व थोथी दलील 

सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी तलाक के नहीं, ‘तीन तलाक’ के खिलाफ है. सिर्फ एक बार में तीन बार तलाक कह देने से विवाह विच्छेद और महिला को घर से तत्काल निकाल बाहर करने को गलत कहा गया है. इस मामले में दकियानूस मौलवी और मुसलिम मर्द थोथी दलील दे रहे हैं. जबकि इस्लाम के अनेक जानकार भी कहते रहे हैं कि एक बार में तीन बार तलाक कह देना इस्लाम के भी खिलाफ है. पर सवाल यह भी है कि किसी धर्म की कोई बात सहज मानवाधिकार के, हमारे संविधान के; और किसी तबके के साथ भेदभाव को उचित ठहराती हो, क्या तब भी उस पर रोक नहीं लगनी चाहिए? 

वैसे सुप्रीम कोर्ट का यह कहना सही है कि इस मामले में कानून बनाना संसद का ही काम और दायित्व है. बल्कि सरकारें अपने दायित्व से पीछे हट जाती हैं, तभी ऐसे मामले कोर्ट में जाते हैं.

परंपरा और नए समाज का द्वंद्व

बहरहाल, अब बहस तो इस बात पर होनी चाहिए कि किसी भी धार्मिक समुदाय या समूह के लिए ‘पर्सनल कानून’ की जरूरत है या नहीं. पर ध्यान रहे कि पारिवारिक मामलों-विवाह, गोद लेना, पारिवारिक/ पैत्रिक संपत्ति का बंटवारा आदि- का फैसला हिंदू सहित हर समुदाय में उसके निजी कानून के आधार पर ही होता है. तमाम जनजातीय समुदायों के रीति-रिवाजों का खयाल रखती हैं. यानी ऐसा कानून बनेगा, तो हिंदू व अन्य समाजों को भी कुछ परंपराओं को छोड़ना पड़ सकता है. 

मुसलिम बहनों का दुख 

अब वक्त आ गया है कि इन मामलों के लिए भी सामान नागरिक कानून बनाने की दिशा में आगे बढ़ा जाये. पर हडबडी में नहीं. यह विषय अत्यंत संवेदनशील है. अतः कदम भी सावधानी से बढ़ाने की जरूरत है. 

वैसे यह देखना भी रोचक है कि इस फैसले से अतिशय उत्फुल्ल और उत्साहित कौन हैं? क्या वे सचमुच ‘तीन तलाक’ की मारी ‘मुसलिम बहनों’ की व्यथा से द्रवित हैं?

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