पाकुड़ मनरेगा घोटालाः घोटाला साबित करने के लिए बना दी बीपीओ की फर्जी चिट्ठी

Submitted by NEWSWING on Mon, 02/12/2018 - 17:43

Ranchi/Pakur: महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना. मनरेगा का पूरा नाम अगर आप भूल गए हों, तो सनद रहे कि इस योजना को सीधा राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नाम से जोड़ा गया है. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का नाम इसलिए जोड़ा गया है,  ताकि उनके आदर्श इसमें झलके. सत्य, अहिंसा और वो तमाम चीजें, लेकिन  मनरेगा के सच की शक्ल कुछ और ही है. पाकुड़ के अमड़ापाड़ा प्रखंड की पचुवाड़ा पंचायत में गरीब देवीलाल मुर्मू की जमीन पर दो बार तालाब बनाया गया. करीब 25 लाख रुपए की बंदरबांट हो गयी, किसने की ये जांच का विषय था. जांच भी हुई और कहने को कार्रवाई भी, लेकिन  पूरी जांच एक और घोटाले से कम नहीं थी. कार्रवाई हुई, लेकिन कार्रवाई के नाम पर सिर्फ कमजोरों पर प्रशासन का डंडा चला.

जमीनी हकीकत जाने बगैर के जरिये बीपीओ पर कार्रवाई    

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कंप्यूटर से टाइप की गयी रिपोर्ट

जिस बीपीओ गोपाल गौतम पर मनरेगा योजना में गड़बड़ी करने की एवज में कार्रवाई हुई है, उसने पाकुड़ के अमड़ापाड़ा प्रखंड में बीपीओ के पद पर 13 मार्च 2013 को योगदान दिया. ज्वाइन करने के करीब एक हफ्ते के बाद यानि 20 मार्च 2013 को बीपीओ को बीडीओ ज्ञानेंद्र कुमार ने उसी योजना की जांच का जिम्मा सौंपा, जिसमें गड़बड़ी की बात सामने आयी थी. बीपीओ ने जमीनी हकीकत जानने के लिए अमड़ापाड़ा प्रखंड की पचुवाड़ा पंचायत का दौरा किया. देवीलाल मुर्मू की जमीन पर बीपीओ ने पहुंचकर जांच की और एक रिपोर्ट तैयार की. उसने वो रिपोर्ट बीडीओ को सौंप दी, लेकिन बीपीओ गोपाल गौतम पर कार्रवाई करने की वजह एक दूसरी रिपोर्ट मानी जा रही है. गोपाल का दावा है कि अगर रिपोर्ट की जांच हो, तो यह साफ हो जाएगा कि जो रिपोर्ट का हवाला देकर मुझपर कार्रवाई की गयी है, वो फर्जी है. 

हैंड रिटेन रिपोर्ट पर भरोसा नहीं, टाइप मैटर वाली रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई

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हाथ से बनायी गयी रिपोर्ट

बीपीओ ने अपनी हैंड रिटेन रिपोर्ट में लिखा है कि उसने देवीलाल मुर्मू की जमीन का निरीक्षण किया. योजना में कोई साइन बोर्ड नहीं लगा हुआ था. योजना तीन साल पुरानी है और योजना में काफी गिरावट आयी है. निरीक्षण के दौरान मुखिया और पंचायत सचिव ने मजदूरी ना मिलने की बात कही और जल्द से जल्द भुगतान करने की मांग की. लिखा कि एमबी बुक में भुगतान के लिए पहले से ही लिखा हुआ है. ऐसे में मनरेगा एक्ट के अनुसार मजदूरी रोकने का प्रावधान नहीं है. वहीं जिस रिपोर्ट के आधार पर बीपीओ गोपाल गौतम कर कार्रवाई हुई है, वो कंप्यूटर में टाइप मैटर है. रिपोर्ट में लिखा है कि निरीक्षण के बाद योजना को सही पाया, मजदूरी भुगतान की जा सकती है. ऐसे में सवाल उठता है कि हाथ से लिखी रिपोर्ट को ना मानकर आखिर कैसे कंप्यूटर में टाइप रिपोर्ट पर भरोसा कर कार्रवाई की गयी. जिस वक्त कंप्यूटर से टाइप की गयी रिपोर्ट सामने आयी उस वक्त जिले के डीडीसी अजित शंकर थे. बीडीओ श्रीमान मरांडी और जिले में मनरेगा का काम देखने वाले डीआरडीए के कर्मचारी संतोष सिन्हा थे.

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