बकोरिया कांडः जेजेएमपी व कोबरा के चंगुल से छूट कर भागे प्रत्यक्षदर्शी सीताराम सिंह को पुलिस ने दो साल तक थाना में छिपा कर रखा

Submitted by NEWSWING on Tue, 01/30/2018 - 13:18

पहली बारः बकोरिया मुठभेड़ से कुछ देर पहले तक की कहानी पहली बार सिर्फ newswing.com पर.

Pravin kumar

Ranchi: आठ जून 2015 की रात पलामू के सतबरवा थाना क्षेत्र के बकोरिया में हुए कथित फर्जी मुठभेड़ से कुछ देर पहले तक नक्सली अनुराग के साथ सीताराम सिंह नाम का बच्चा भी था. मुठभेड़ से कुछ देर पहले ही वह वहां से भागा था. सीताराम लातेहार के हरातू पंचायत के लादी गांव का रहने वाला है. वर्तमान में उसकी उम्र करीब 17 साल है. बकोरिया कांड के समय उसकी उम्र करीब 14 साल थी. नक्सली अनुराग उसे और उसके गांव के दो अन्य बच्चों उमेश सिंह व महेंद्र सिंह को भी रास्ता बताने के लिए साथ ले गया था. कथित फर्जी मुठभेड़ में दोनों मारे गए. दोनों की पहचान 30 माह बाद सीआईडी ने आठ जनवरी 2018 को की. newswing.com की टीम ने लादी गांव पहुंच कर सीताराम सिंह से बात की. बकोरिया कांड की जानकारी ली. उसके मुताबिक बकोरिया से पहले छिलका (नदी के किनारे पर) में अनुराग से चितकबरा ड्रेस पहने कुछ लोग मिले थे. अनुराग ने उनसे हाथ भी मिलाया था. वहां सीताराम को पकड़ने की कोशिश हुई थी. लेकिन वह भाग निकला था.

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सीताराम ने बताया कि भागने के बाद जब वह गांव में आकर रहने लगा, तब उसे नक्सली जंगल में ले गए. जंगल में उसका मन नहीं लग रहा था. इसलिए वह वहां से भाग कर गांव आ गया. गांव में कुछ दिन रहने के बाद उसने नजदीक के पुलिस पिकेट पर जाकर पुलिस के समक्ष सरेंडर (पुलिस विभाग की साईट पर सरेंडर करने वाले नक्सलियों की सूची में सीताराम का नाम नहीं है) कर दिया. उसने पुलिस को पूरी बात बतायी. जिसके बाद उसे दूसरी जगह पुलिस के पास भेज दिया गया. जहां वह करीब दो साल तक पुलिस के संरक्षण में रहा. इस दौरान वह महुडांड़ के गुरुकुल में पढ़ने भी जाता था. पुलिस के लोग उसे लेकर उसके गांव भी आते थे. पुलिस के पास से लौटने के बाद वह छिपादोहर आवासीय विद्यालय में पढ़ रहा है.

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सीताराम के सामने आने के बाद बकोरिया कांड को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं:-

             अगर सीताराम, नक्सली अनुराग के दस्ते का सदस्य था, तो वह पुलिस की नजर में अभियुक्त था. फिर पुलिस ने बकोरिया कांड में उसे रिमांड क्यों नहीं किया.

-              अगर पुलिस की नजर में सीताराम नक्सली अनुराग को रास्ता बताने वाला बच्चा था, तब बकोरिया कांड में पुलिस ने उसका बयान दर्ज क्यों नहीं किया. क्यों उसके गांव के दो अन्य बच्चे (जो मुठभेड़ में मारे गए), उसकी पहचान करने में 30 माह का वक्त लगाया.

-              आखिर पुलिस ने किस अधिकार के तहत एक 14 साल के बच्चे को दो साल तक अपने संरक्षण में रखा. पुलिस संरक्षण में उसे पढ़ने भेजा. उसे पुलिस संरक्षण में गांव भी ले गया. क्या यह कानून का उल्लंघन नहीं है.

-              सवाल यह उठ रहा है कि क्या पुलिस ने जानबूझ कर ऐसा किया, ताकि बकोरिया कांड से जुड़ा सीताराम किसी दूसरे के संपर्क में ना आये. नहीं तो बकोरिया कांड का सच सामने आ जायेगा. मारे गए नाबालिगों की पहचान हो जायेगी.

-              एक सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या पुलिस ने बकोरिया कांड के सच को छिपाने के लिए सीताराम को दो साल तक अपने पास रखकर उसका माइंडवॉश किया. उसे अपने हिसाब से सिखाया-बताया. क्योंकि 14 साल का बच्चा कितना मासूम होता है, सब जानते हैं.

-              सीताराम के मुताबिक अनुराग ने चितकबरा ड्रेस पहने लोगों से हाथ मिलाया था. हाथ मिलाने वाले पुलिस के लोग थे या जेजेएमपी (पुलिस पर आरोप है कि जेजेएमपी के साथ मिलकर नक्सली अनुराग व 11 निर्दोष लोगों को मार दिया) के लोग.

-              अगर अनुराग से हाथ मिलाने वाला चितकबरा ड्रेस पहने हुए लोग उग्रवादी थे, तो फिर मारने वाले पुलिस ने क्यों और कैसे मुठभेड़ करने का श्रेय खुद लिया.

-              अगर हाथ मिलाने वाले चितकबरा ड्रेस पहने लोग पुलिस के लोग थे, तो फिर हाथ क्यों मिलाया. देखते ही अनुराग या पुलिस ने फायरिंग क्यों नहीं कर दी. कहीं ऐसा तो नहीं कि चितकबरा ड्रेस पहने लोग वही लोग थे, जिन्होंने टीपीसी का आदमी बनकर नक्सली अनुराग को बुलाया (जैसा कि जेजेएमपी के उग्रवादी गोपाल ने टीपीसी के जन अदालत में बताया था) था.

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सीताराम सिंह कौन है

नामः सीताराम सिंह

पिता का नामः राजकुमार सिंह

गांवः लादी, हरातू पंचायत, लातेहार

उम्रः आधार कार्ड के मुताबिक उम्र 01.01.2001

बकोरिया कांड के वक्त उम्रः करीब 14 साल

क्या करता हैः गुरुकुल, गारु में छठे क्लास में पढ़ता है.

चितकबरा ड्रेस पहने व्यक्ति से अनुराग ने हाथ मिलाया थाः सीताराम

सीताराम ने जो बताया है वह चौंकाने वाला है. छह जून 2015 की रात नक्सली अनुराग और उसके साथ के दो लोग लादी गांव में रुके हुए थे. सात जून 2015 को वह (सीताराम) जंगल में गाय चराने गया था. तभी नक्सली अनुराग उर्फ डॉक्टर दो लोगों के साथ उसके पास पहुंचा. अनुराग ने उससे कहा कि चलो रास्ता बताओ. जिसके बाद वह अनुराग के साथ रास्ता बताते हुए चलने लगा. उसके साथ लादी गांव के ही दो और बच्चों सकेंद्र पहारिया व उमेश सिंह को भी अनुराग ने रास्ता बताने के नाम पर साथ ले लिया. बच्चों को साथ लेकर अनुराग सबसे पहले हरातू गांव पहुंचा. वहां से भी एक बच्चे को साथ ले लिया. जिसका नाम महेंद्र सिंह खेरवार था. सीताराम के अलावा तीनों बच्चे सकेंद्र पहारिया, उमेश सिंह व महेंद्र सिंह बकोरिया में हुए कथित फर्जी मुठभेड़ में मारा गया. हरातू से सभी नावाडीह व बेलवा गांव होते हुए औरंगा नदी को पार किया. वहां पर एक बलेरो आया. जिस पर सभी सवार हो गए. इसके बाद सभी एक जगह छिलकी पर रुके. स्थानीय भाषा में नदी के किनारा को छिलकी बोला जाता है. सीताराम के मुताबिक सभी जहां पर रुके थे, वह छिलकी था.

अकेले रुक कर मोबाइल से अनुराग ने किसी से कई बार बात की थी

सीताराम के मुताबिक रास्ते में अनुराग सभी को कुछ दूरी पर रख कर खुद मोबाइल से किसी से बात भी करता रहा था. ऐसा उसने कई बार किया. रास्ते में कुछ और लोग भी अनुराग से मिले और साथ चल रहे थे, जिन्हें वह नहीं पहचानता. रात 9.30 बजे के करीब छिलकी में सभी बलेरो से उतरे. तभी कुछ लोग आये, जिससे अनुराग ने हाथ मिलाया. कुछ चितबरा ड्रेस (इन दिनों पुलिस और उग्रवादी-नक्सली दोनों चितकबरा वर्दी पहनते हैं) पहने कुछ लोग पहुंचे. अनुराग ने चितकबरा वरदी पहने एक व्यक्ति से भी हाथ मिलाया. इसके बाद चितकबरा वर्दी पहने कई सारे लोग पहुंच गये. सीताराम को लगा कि यहां मुठभेड़ वगैरह हो सकता है, इसलिए उसने वहां से भागना चाहा. लेकिन चितकबरा ड्रेस पहने एक व्यक्ति ने उसका हाथ पकड़ लिया. लेकिन वह हाथ छुड़ा कर अंधेरा का फायदा उठाते हुए भाग गया. वहां से भाग कर वह एक गांव में रुका. दूसरे दिन शाम में छह बजे अपने घर पहुंचा. कुछ दिन बाद जंगल के लोग उसे पकड़ कर ले गये. बकोरिया कांड को लेकर उससे पूछताछ की. करीब एक माह बाद वह जंगल से भाग कर फिर घर आ गया. फिर गांव के नजदीक के पिकेट पर चला गया. जिसके बाद उसे कहीं दूसरे जगह पुलिस के पास भेज दिया गया. पुलिस ने करीब दो साल तक उसे अपने पास रखा. इस दौरान उसे खाना खिलाया, कपड़े भी दिये और पढ़ाया-लिखाया भी. फिर घर वापस भेज दिया.

पुलिस सीताराम को साथ लेकर गांव भी आती थीः संगीता देवी

सीताराम सिंह की मां संगीता देवी ने newswing.com को बताया कि पुलिस ने सीताराम को करीब दो साल तक अपने साथ रखा. इस दौरान पुलिस उसे लेकर कई बार गांव भी आयी. पुलिस के लोग जब भी सीताराम को लेकर उसके पास आते थे, तब बताते थे कि सीताराम को पढ़ा रहे हैं. संगीता देवी के मुताबिक वह खुद भी कई बार लातेहार गयी. वहां जाकर पुलिस से मिली और सीताराम से मुलाकात की.

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