रघुवर सरकार के तीन साल में तीन बड़े घोटाले, जीरो टॉलरेंस की जगह कहीं घोटाले ही न बन जाये पहचान

Publisher NEWSWING DatePublished Wed, 05/16/2018 - 12:07

SURJIT SINGH

रघुवर दास की सरकार के तीन साल से अधिक समय हो गये. शपथ लेने के साथ ही जीरो टॉलरेंस की बात करने वाले मुख्यमंत्री रघुवर दास की सबसे बड़ी चुनौती लगातार हो रहे घोटाले को रोकना है.  क्योंकि अगर रघुवर दास घोटालों को रोक नहीं पाते हैं, तो उनकी सरकार की पहचान जीरो टॉलरेंस की जगह घोटालों की सरकार की बन जायेगी. अभी कार्रवाई नहीं हो रही है, क्योंकि राज्य से लेकर केंद्र तक भाजपा की सरकार है. कई मामलों में मीडिया भी विज्ञापन के दवाब में चुप ही है. पर, राजनीति में सरकार कब बदल जाये, परिस्थितियां कब विपरित हो जाये, यह न तो किसी को पता होता है और ना ही किसी के वश में  होता है. ऐसे में जब गड़बड़ियों की जांच शुरू होगी, तब सत्ता शीर्ष पर बैठे लोगों को गर्दन बचाना मुश्किल हो जायेगा.

महिला सखी मंडल के सदस्यों को घटिया मोबाइल देने, बुनकर समितियों से कंबल बनाने के नाम पर बाजार से मनमाने दर पर कंबल खरीद कर गरीबों के बीच बांटने की योजना में घपला, नियमों को नजरअंदाज कर सड़क और भवन निर्माण का टेंडर रामकृपाल कंस्ट्रक्शन को देने में घपला पहले ही सार्वजनिक हो चुके हैं.  अब नया घोटाला सामने आया है. शिक्षकों को टैब उपलब्ध कराने में घोटाला कर दिया गया है. जो टैब खरीदे गये, वह किसी काम के नहीं हैं. क्योंकि खरीदे गये टैब आउटडेटेड हैं. अधिकारियों ने जितनी जल्दबाजी खरीदने में दिखायी, उतनी वितरण करने में नहीं दिखा रहे. क्योंकि वह जानते हैं कि जैसे ही टैब शिक्षकों के हाथ में पहुंचेगा, वह उसे लौटाने लगेंगे.

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मुख्यमंत्री रघुवर दास को करीब से जानने वाले भी यही मानते हैं, उनकी सबसे बड़ी समस्या गड़बड़ियों पर चुप्पी साधे रहना है. वह तथ्यों पर कम और अपने आस-पास के लोगों की बातों पर ज्यादा विश्वास करते हैं. यही कारण है कि अफसरों के भ्रष्टाचार की खबरें मीडिया में आने के बाद भी उन तक इसकी जानकारी नहीं पहुंचती. यही कारण है कि रघुवर दास अब भी यह दावा कर रहें हैं कि उनके राज में जीरो टॉलरेंस है और यहां घोटाला करने वालों को बख्शा नहीं जायेगा. पर, राज्य के हालात बिल्कुल उलट हैं. महिला सखी मंडल के एक लाख सदस्यों को घटिया मोबाइल दिये गये, मीडिया में इसकी खबरें आयीं. सरकार ने इसकी जांच तक नहीं करायी. कंबल घोटाला में चूंकि तत्कालीन विकास आयुक्त अमित खरे ने रिपोर्ट कर दी और महालेखाकार ने भी आपत्ति कर दी, इसलिए मामला मुख्यमंत्री की जानकारी में आ गया. और उन्होंने जांच का भी आदेश कर दिया. लेकिन अफसरों ने यहां भी बेईमानी कर दी. अमित खरे ने मामले की जांच भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो से कराने की अनुशंसा की थी, लेकिन जांच का जो आदेश निकाला, उसमें उद्योग विभाग के अफसरों को जांच करने की बात कही गयी. सवाल यह उठता है कि जिस उद्योग विभाग के अफसर जानकारी रहने के बाद भी कंबल घोटाला करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने के बदले चुप्पी साधे रहे, वही अफसर अब आगे कार्रवाई करेंगे, इसमें संदेह है.

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बात शिक्षकों को देने के लिए टैब की खरीद में घपले की करें, तो यह बिल्कुल मोबाइल सेट घोटाला जैसा ही है. जिस तरह आउटडेटेड मोबाइल खरीदे गये, उसी तरह आउटडेटेड टैब खरीदे गये. जो टैब बाजार में अब मिलता ही नहीं, वह टैब अफसरों ने खरीदे. अफसर तर्क देते हैं कि प्रक्रिया का पालन करके, मसलन टेंडर करके टैब खरीदे गये. इसलिए कोई घपला नहीं है. पर, सवाल यह है कि करोड़ों रुपये खर्च करके जो टैब खरीदे गये, उससे कुछ काम ही नहीं होगा, तो वह खरीदे क्यों गये. फिर सरकारी धन की बर्बादी क्यों? आखिर अफसरों पर हर माह लाखों रुपये खर्च किस बात के किये जाते हैं. क्या वह दिमागी रुप से इतने निर्धन हो गये हैं कि मोबाइल-टैब के बारे में मामूली जानकारी भी नहीं रखते.

इन तीन घोटालों में सबसे बड़ी बात यह है कि इन तीनों योजनाओं की कोई तैयारी पहले से नहीं की गयी थी. संयोग यह भी है कि घोटाले उन्हीं योजनाओं में हुए, जिसकी घोषणा बिना किसी तैयारी के मुख्यमंत्री रघुवर दास से करवा दिया गया. फिर नीचे के अफसरों पर यह धौंस दिखाकर कि मुख्यमंत्री ने घोषणा कर दी गयी है, इसलिए किसी भी तरह इसे पूरा करना पड़ेगा. इस तरह अफसरों ने योजनाबद्ध तरीके से पहले मुख्यमंत्री से ऐसी-ऐसी घोषणा करवा दी, तो सुनने में लोक लुभावन और ऐसा लगे कि सरकार प्रगतिशील विचार वाली है. सरकार आईटी के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ना चाहती है. चूंकि घोषणा से पहले न तो योजना की तैयारी की गयी और न ही कोई विचार-विमर्श किया गया. एक-दो अफसरों ने मनमाने तरीके अपने फायदे के लिए सारी गड़बड़ी कर दी. और बदनामी हो रही है मुख्यमंत्री औऱ सरकार की.

मोबाइल व टैब की खरीद के मामले में चौंकाने वाला तथ्य यह है कि जिस विभाग को मोबाइल या टैब बांटना है, उसे खरीददारी से मतलब ही नहीं है. सारे काम जैप-आइटी को दे दिये गये. अब सवाल यह उठता है कि झारखंड सरकार का जैप-आइटी विभाग है क्या. क्या वह मोबाइल या टैब बनाने वाली कंपनी है. या उसके पास मोबाइल या टैब बनाने वाली कंपनी का सीएनएफ है. नहीं, वह सिर्फ एक विभाग है. जैसा कि सरकार के बाकी विभाग. जिसकी जिम्मेदारी सरकार के आईटी विंग को संचालित करना है. ऐसे में जैप-आइटी को मोबाइल या टैब की खरीद का काम देना अपने आप में संदेहास्पद है. अगर सत्ता शीर्ष पर बैठे लोग इस पर ध्यान नहीं देंगे, सतर्क नहीं रहेंगे, तो आने वाले दिनों में सरकार की परेशानी ही बढ़ेगी.

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