सरहुल 'खेखल बेंज्जा' : सर्वशक्तिमान सूर्य और जगत जननी माता धरती की शुभ विवाह का पर्व

Publisher NEWSWING DatePublished Tue, 03/20/2018 - 15:27

Raj Kumar Minj

Ranchi : सरहुल आदिवासी सरना धर्मावलंबियों का सबसे बड़ा त्यौहार है, यह पर्व फागुन के बाद चैत महीने में मनाया जाता है. उरांव समुदाय की मान्यता के अनुसार इस पर्व में मुख्य रूप से धरती एवं सूर्य को परिणय सूत्र में बांधा जाता है, जिसका प्रतिनिधित्व कमश: उरांव पुरोहित 'पाहन' और उसकी धर्मपत्नी करते हैं. इस विवाह में पाहन सूर्य के प्रतिक होते हैं एवं उनकी धर्मपत्नी धरती के प्रतीक होते हैं, इन्हीं दोनों पाहन एवं उनकी पत्नी के बीच विवाह का सॉन्ग गाया जाता है. सरहुल का एक मुख्य उरांव गीत

चैनुम-चैनुम नैगायो

वेलर लेखा बेंज्जरआ लगदय।

खद्दी चंद्दो नैगायो

वेलर लेखा बेज्जरआ लगदय॥

गीत का अर्थ- सूर्य रूपी पाहन राजा का शुभ विवाह महाराजे की भांती प्रतिवर्ष सरहुल में संपन्न होता है.

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वैवाहिक संस्कार की रस्म पूरी होने के बाद प्रजनन क्रिया होती है. इसके बाद ही वंश बढ़ता है. सरहुल पूजा उत्सव के पूर्व तक धरती अविवाहित कन्या की भांति देखी जाती है. उरांव संस्कृति के मुताबिक वह अगम्या है. इस समय धरती से उत्पन्न नये फल-फूल का सेवन वर्जित होता है साथ ही उसकी घरों में प्रवेश वर्जित होता है. जिस प्रकार उरांव समाज में यदी अविवाहित लड़की भूल-चूक से अवैध सन्तान को जन्म देती है तो उस सन्तान को समाज अंगीकार नहीं करता है. यहां तक कि उसे गांव में दफन के लिए भी जगह नहीं अपने गांव में मिलना मुश्किल होता है और उनका सामाजिक बहिष्कार भी होता है, ठीक उसी प्रकार की व्यवस्था उरांव जाति के लिए सरहुल पर्व के पूर्व फल-फूल को भोग करने वालों के लिए होता है. सरहुल पर्व के पूर्व उरांव समाज में किसी भी प्रकार का शुभ कार्य वर्जित है.

उरांव समाज में सरहुल की तैयारी महीने भर पहले शुरू हो जाती है साफ-सफाई, लिपाई-पुताई की जाती है. नये बेटी-दामाद को बुलाया जाता है. इसके दूसरे दिन समधी और समधन को भी बुलाया जाता है. मुख्य व्यंजन डुबकी है जो कि उरद बड़े की तरह बनाया जाता है, इसके अलावा छिलका भी प्रचलित है जो की चावल के आटे से बनाया जाता है.

पहला उपवास - सरहुल त्यौहार की शुरुआत एक दिन पहले से होती है, इससे पहले उपवास रखा जाता है, इसी दिन पाहन एवं उनकी पत्नी पहला उपवास रखते हैं. सरहुल पूजा के पूर्व सरना स्थल को अच्छी तरह से सफाई करने के बाद लिपाई-पुताई करके सजाया जाता है. दो नये घड़े में गांव के कुएं से पानी भर कर सरना पूजा स्थल पर सरना वृक्ष के नीचे रखा जाता है. जो सृष्टि का प्रतीक के रूप में देखा जाता है. घड़ा के सिर को अरवा सूता से एक साथ लपेटा जाता है. एवं पाहन द्वारा सरना वृक्ष को स्नान कराके नये परिधान के रूप में सूत को लपेटा जाता है. पाहन के द्वारा तेल, सिंदूर, धूप, धूवन से पूजा कर 'धर्मेशका आह्वान किया जाता है. पाहन एक सखुआ के डंडे से घड़ों के जल को मापता है, इस रस्म के होने के बाद कोई व्यक्ति न किसी पेड़ पर चढ़ सकता है और न ही धरती की खुदाई कर सकता है.

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सरहुल - पहला उपवास के दूसरे दिन यानि सरहुल के दिन पाहन नहा-धोकर तैयार हो जाता है. बाजा-गाजा के साथ गांव के बुजुर्ग भी पाहन के साथ रहते हैं और पूजा की जाती है. पूजा की सामग्री जिसमें अरवा चावल, सिंदूर, धूप दिया सलाई, नया सूप, चाकू, अरवा सूता, नया तवा, आटा एवं बलि के लिए तीन मुर्गे होते हैं. सफेद मुर्गा धर्मेश होता है, लाल मुर्गा गांव का देवता के लिए जो ग्रामीणों की रक्षा करता है. काला मुर्गा पूर्वजों के लिए होता है.

सरहुल के दिन सर्वप्रथम पाहन दोनों घड़ों को अच्छी तरह से निरीक्षण करता है. सुखवा के डंडे से घड़ों के जल को मापता है और जल की अवस्था के आधार पर ही भविष्यवाणी करता है. घड़ों का जल ज्यों का त्यों भरा हो तो इस वर्ष अच्छी बारिश, अच्छी फसल की घोषणा करता है साथ ही यह भी घोषणा करता है कि उक्त वर्ष कौन सी फसल के लिए उपयुक्त है.

फूलखोंसी - सरहुल के बासी यानी दूसरे दिन फूलखोंसी का नेग होता है. पाहन सूप में फूल लेकर साथ में पहनाइन भी पूजार छेद वाला घड़ा में पानी लेकर साथ-साथ चलती है पानी के धार गिरते हुए प्रत्येक घर में क्रमश: घूमते हैं वह घर के दरवाजे के ऊपर भी फूल खोंसते जाते हैं. गृहस्वामीनी पाहन एवं पुजार (पनभरा) को सम्मान पूर्वक चटाई पर बैठाती हैं, तत्पश्चात उनका पांव धोती है, तेल एवं सिंदूर का टीका लगाया जाता है, इसके बाद नये सूप में चावल के साथ कुछ दक्षिणा देती है और पुण: उसी में फूल खोंसती है. ईश्वर की भक्ति भाव से याद करते हुये गृहस्वामीनी धर्मेश से अपने परिवार गांव के लिए सुख समृद्धि की कामना करती है. पाहन का पांव धोया हुआ पानी को गृहस्वामीनी छत पर फेंकती है और उस पानी को अपने आंचल में लेती है, इसके पीछे मान्यता है कि गृहस्वामीनी का आंचल हमेशा धन-दौलत से भरा रहे.

सालफुल की महिमा - पाहन के द्वारा दिये गये साल फुल बहुत अच्छी तरह से किसी साफ कपड़े में बांधकर हिफाजत से रखा जाता है. जेठ वैशाख के महीने में धान के बीज को खेत में बुवाई के लिए निकालते हैं, तब उस फूल के हाथों में लेकर ईश्वर को याद करते हुये बीज निकाला जाता है.

सरहुल को लेकर अलग-अलग भाषा परिवार की अलग-अलग मान्यता है. जो की प्रकृति के इर्द गिर्द है. खड़िया समुदाय इसे जांकोर पर्व के रूप में मनाते हैं. आस्ट्रिक भाषा परिवार में मुंडा, संथाल, इसे बहा पर्व के रूप में मनाते हैं. द्रविड भाषा परिवार में उरांव समुदाय खद्दी के रूप में इस त्यौहार को मनाते हैं.

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