साहब आप तो कागजों पर वो हादसा देख रहे हैं, मैंने अपनी नंगी आंखों से नक्सलियों का वो तांडव देखा हैः पीसी देवगम

Publisher NEWSWING DatePublished Tue, 02/13/2018 - 17:14

Bokaro :  सर.. आप का कहना है कि नकुल यादव के खिलाफ मैं गवाही ना दूं और यदि जो गवाही दूं भी  वह ऐसा हो कि कोर्ट से उसे राहत मिल जाये. लेकिन सर ऐसा नहीं हो सकता है, क्योंकि आपने तो महज कागज पर ही हादसे को देखा होगा, मगर  मैंने अपनी आंखों से उस हादसे को देखा है. मैंने देखा है कि कैसे हमारे 11 जवान शहीद हो गये, सर मैंने यह भी देखा है कि कैसे 60 से ज्यादा पुलिसकर्मी घायल हो गये और मुझे भी मौत छूकर निकल गयी. इसलिए मैं तो गवाही दूंगा ही और जब तक नकुल को सजा नहीं दिलवा लेता, तब तक चैन से नहीं बैठूंगा ? यदि ज्यादा दबाव बना तो नौकरी ही त्याग दूंगा, लेकिन फिर भी कोर्ट में गवाही दूंगा और नकुल को सजा दिलवाकर ही दम लूंगा. यह करारा जवाब  दारोगा पी सी देवगम ने तथाकथित एएसपी अभियान को दिया है. जिन्हें झारखंड-बिहार में एनकाउंटर स्पेशलिस्ट माना जाता है और जो नक्सलियों की मोस्ट वांटेड की लिस्ट में सबसे उपर हैं.

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वह अपनी ड्यूटी करते रहे और पुलिस की सार्थकता साबित करते रहे

मगर फिर भी उन्होंने कोई परवाह नहीं की और वह अपनी ड्यूटी करते रहे और पुलिस की सार्थकता साबित करते रहे. उनका यह दुर्भाग्य ही है कि कई एनकाउंटर में लगे पुलिस अधिकारियों को गैलेंट्री दिया गया. लेकिन  वरीय अधिकारियों की ओर से की गयी सिफारिश के बावजूद उन्हें गैलेंट्री से वंचित रखा गया. उन्हें अफसोस तो बस इस बात का है कि एक ओर नक्सलियों को मुख्य धारा में लाने के लिए बनायी गयी सरेंडर नीति में कई तरह की सुविधाएं दी जा रही है, तो वहीं दूसरी ओर सीरियल बम विस्फोट में अपनी जान की बाजी लगा देने वालों को इलाज तक का पैसा नहीं दिया गया. गैलेंट्री नहीं मिलने से निराश इस जाबांज को जोर का झटका तब लगा, जब वह लोहरदगा के सेन्हा थाना कांड संख्या 50/11 से संबंधित मामले में नक्सली कमांडो नकुल यादव व अन्य के खिलाफ गवाही देने पहुंचे. तो इस दौरान पुलिस के ही अधिकारी या तो कोर्ट  में ही रहे या फिर फोन करके उन्हें यह नसीहत देने लगे कि, नकुल ने सरकारी सरेंडर नीति के तहत सरेंडर किया था, इसलिए ऐसी गवाही ना दें जिसमें उसे परेशानी हो जाये. लेकिन फोन करनेवाले सीनियर अफसर को जो टका सा जवाब दिया गया, वह उनके लिए सबक भी है और एक कानूनप्रिय अधिकारी की कतर्व्य निष्ठा भी.

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हालांकि गवाही के बारे में नसीहत देनेवाले ने अपने को एएसपी अभियान बताया था, पर लोहरदगा के एएसपी ने साफ कर दिया है कि उन्होंने कोई फोन नहीं किया था. लेकिन इस फोन वार्ता व कनीय पुलिसकर्मी से लेकर क्राइम रीडर तक की भूमिका ने देवगम को हिला कर रख दिया है. वह कभी नौकरी छोड़ देने की बात करते हैं तो कभी हताशा में गैलेंट्री से वंचित रहने का सवाल उठाते हैं. 1994 बैच के दारोगा पी सी देवगम इतने हताश हैं, जिसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यदि वह नक्सलियों के हाथों मौत के घाट उतार दिये गये होते, तो मरणोपरांत ही उन्हें सम्मान मिलता. लेकिन उनका जिन्दा बच जाना ना तो विभाग को अच्छा लग रहा है और ना ही उसे खुद ही ठीक लग रहा है. क्योंकि अब वह अपनी उपेक्षा से अब आजिज आ चुके हैं. क्योंकि एक ओर उन्होंने कोर्ट में नक्सली के पक्ष में गवाही देने के लिए उनपर दबाव बनाने को लेकर सवाल उठाया है, तो दूसरी ओर वे खुद के खिलाफ हो रहे साजिश से भी इंकार नहीं करते हैं. अपनी जांबाजी, दिलेरी व दुस्साहस का परिचय कई बार दे चुके यह दारोगा बेहद चिंतित हैं. कहते हैं कि गवाही देने के दौरान उनके साथ कोई भी हादसा हो सकता है. पी सी देवगम ने अपनी इस चिंता से वरीय अधिकारियों को भी अवगत करा दिया है. उनका स्पष्ट रूप से कहना है कि यदि उन पर किसी भी तरह का अनुचित दवाब बनाया गया, तो वह नौकरी छोड़ देंगे.  लेकिन किसी भी शर्त पर नक्सली के खिलाफ गवाही नहीं छोड़ेंगे. उन्होंने मायूस होते हुए कहा कि उनके सामने आज भी वह घटना कौंध जाती है, कि किस कदर 11 पुलिसकर्मियों ने तड़प-तड़पकर मौत को गले लगाया था. साथ ही किस कदर सीरियल ब्लास्ट कर पुलिस को तबाह किया गया था. घटना के बारे में बताते- बताते  देवगम आज भी सुबक पड़ते हैं.

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पुलिस महानिदेशक को लिखे पत्र में उन्होंने अपने क्रियाकलापों का पूरा ब्यौरा दिया है

राज्य के पुलिस महानिदेशक को लिखे पत्र में उन्होंने अपने क्रियाकलापों का पूरा ब्यौरा दिया है और उन कारणों को भी बताया है कि कैसे उन्हें टॉर्चर किया गया. किस कदर उनको गैलेंट्री से वंचित रखा गया. उन्होंने यह भी खुलासा किया कि जिनको गैलेंट्री मिलना चाहिए था, उनको नहीं मिला और जो एनकाउंटर में नहीं थे उन्ही का नाम गैलेंट्री पाने वाले लोगों में शामिल हो गया. देवगम अभी बोकारो जिला बल के सदस्य हैं और फिलहाल पुलिस केन्द्र में पड़े हैं. थाना में रहने पर सुरक्षा की चिन्ता उनको नहीं रहती थी, लेकिन अब उनको हर समय खतरा ही दिखता है. हालांकि इनका संकल्प इस बात को दोहराता है कि पी सी देवगम जीते जी ना तो नक्सलियों के सामने झुक सकते हैं और ना ही कायरता के साथ पीछे हट सकते हैं. जरूरत पड़ी तो वह जान की बाजी लगाकर उनका मुकाबला करेंगे और इस काम में अगर उन्हें खुद को कुर्बान भी करना पड़े तो भी उसको अफसोस नहीं होगा. अपने पत्र में उन्होंने यह भी आग्रह किया है कि उन्हें गैलेंट्री देने पर एक बार फिर विचार किया जाये. साथ ही उन्हें  मनोबल को बनाये रखने के लिए यह सम्मान दिलाया जाये, जिसके वे असली हकदार हैं.

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देवगम ने कई मौकों पर अपनी जान की बाजी लगाकर वर्दी की लाज बचायी

1994 बैच के दारोगा पी सी देवगम ने कई मौकों पर अपनी जान की बाजी लगाकर वर्दी की लाज बचायी और सेवा के दौरान देश की सेवा के लिये गये शपथ का भी पूरा ख्याल रखा. लेकिन सराहना करने की बजाय विभाग ने उनके कामों की अनदेखी की. अपनी दिलेरी के किस्से गढ़ चुके पी सी देवगम आज बोकारो पुलिस केन्द्र में कार्यरत हैं. बिहार-झारखंड के कई जिलों में अपनी सेवा का परचम लहरा चुके पी सी देवगम ने कई बार अपनी मौत को नजदीक से देखा. उन्होंने मौत से सामना किया और फिर नक्सलियों को जो जवाब दिया, उसके बाद से नक्सली पी सी देवगम को अपना दुश्मन मानते हैं. उनके काम को देखते हुए उन्हें काफी पहले ही गैलेंट्री सम्मान मिल जाना चाहिए था. इस बात की अनुशंसा भी की गयीलेकिन इस दारोगा की दिलेरी व जांबांजी की फाइल जाने कहां गुम हो गयी.

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देवगम को पासिंग आउट परेड के बाद योगदान देने के लिए पहली पोस्टिंग औरंगाबाद में मिली. इन्होंने  साल 1996  में 22 जनवरी को मदनपुर थाना के मथान बिगहा गांव में नक्सलियों से मुठभेड़ में सात नक्सलियों को मार गिराया. उसमें जोनल कमांडर सागर चटर्जी भी मारा गया था. तब उनके नाम की अनुशंसा गैलेंट्री के लिए तत्कालीन एसपी अनिल पालटा ने की थी. इस वारदात के बाद जब भी कोई नक्सली घटना होती, उस थाना इलाके में सेवा देने के लिए पी सी देवगम को पदस्थापित कर दिया जाता था. 16 जून 2000 को रणवीर सेना ने मियांपुर में 40-42 लोगों की हत्या कर दी थी. इसके बाद मौके पर पहुंच कर उन्होंने कई लोगों की जान बचायी. साथ ही बाद में इस कांड का अनुसंधान करते हुए मामले में छह अभियुक्तों को आजीवन कारावास की सजा दिलवायी. 2003 में नवादा जिले में पदस्थापित कर दिया गया. कैडर बंटवारा में झारखंड आये पी सी देवगम को रांची मुरहू थाना में पदस्थापित किया गया. वहां उसने कुंदन पाहन के साथ मुठभेड़ किया. रांची में पांच साल काम करने के बाद उन्हें लोहरदगा भेज दिया गया. लोहरदगा में सेन्हा थाना क्षेत्र में पीएलएफआई के साथ मुठभेड़ में तीन को मार गिराया. 2011 में नक्सली अभियान के दौरान 3 मई को सीरियल बम धमाके में धरधरिया में वह बुरी तरह घायल हो गये. इस वारदात में 11 जवान शहीद हो गए थे. नक्सलियों ने उनको टारगेट किया था, लेकिन वे अपनी दिलेरी से नुकल के दस्ते से भिड़े रहे, जिससे नकुल यादव को भागना पड़ा. कई कांडों में अपनी उपलब्धियां दर्ज करा चुके पी सी देवगम को बहुत पहले ही गैलेंट्री मिल जाना चाहिए था. लेकिन तकनीकी कारणों को बताकर उन्हें इससे वंचित रखा गया. आज उनेके साथ नीचे ओहदे पर काम करकने वाले लोग अपनी वर्दी में गैलेंट्री का तमगा चमका रहे हैं. जबकि एक दिलेर अफसर विभाग की अनदेखी से हैरान और परेशान होकर रह गया है.

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