वीडियो गेम्स का हिंसक घटनाओं से संबंध, कर रहा युवाओं की सोच को प्रभावित: ट्रंप

Publisher NEWSWING DatePublished Fri, 03/09/2018 - 13:26

Washington : : बच्चों के दिलोदिमाग पर विडियो गेम्स हावी हो रहा है. इसके चलते बच्चे न केवल चिड़चिड़े हो रहे हैं, बल्कि उनका स्वाभाव भी काफी आक्रामक हो रहा है. यही कारण है कि बच्चे भी अब आपराधिक घटनाओं को अंजाम देने लगे हैं. कुछ ऐसा ही कहना है अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का.

हाई स्कूल में हुये हमले के पीछे वीडियो गेम

गुरुवार को गेमिंग इंडस्ट्री के नेताओं को संबोधित करते हुये ट्रंप ने  कहा कि हकीकत की दुनिया में हो रही हिंसा का कहीं न कहीं वीडियो गेम से संबंध है. पिछले महीने अमेरिका के एक स्कूल में हुयी गोलीबारी के बाद हथियारों को लेकर राष्ट्रीय बहस छिड़ गयी है. गोलीबारी की घटना के कुछ ही दिन बाद ट्रंप एवं एंटरटेनमेंट सॉफ्टवेयर एसोसिएशन( ईएसए) कारोबार समूह के बीच गुरुवार को यह बातचीत हुयी. फ्लोरिडा हाई स्कूल के एक पूर्व छात्र ने अर्द्धस्वचालित राइफल से17 लोगों की हत्या कर दी थी.

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युवाओं की सोच को कर रहा है प्रभावित

फ्लोरिडा हत्याकांड के बाद ट्रंप ने वीडियो गेम्स को गोलीबारी की घटनाओं में इजाफा करने वाला संभावित कारक बताया. व्हाइट हाउस ने एक बयान में कहा कि बैठक में ट्रंप ने माना कि कुछ अध्ययनों में यह संकेत मिलता है कि वीडियो गेम हिंसा और वास्तविक हिंसा के बीच संबंध हैं. फ्लोरिडा गोलीबारी के बाद ट्रंप ने कहा कि कई लोग यह कह रहे हैं कि वीडियो गेम पर हिंसा का स्तर कही न कहीं युवाओं की सोच को हकीकत में प्रभावित कर रहा है.

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हर हफ्ते करीब 20 घंटे गेम खेलने में निकाल देते है बच्चे

अगर हम भारत की बात करें तो एसोचैम ने दिल्ली, एनसीआर, मुंबई, गोवा, कोचीन, चेन्नई, अहमदाबाद, हैदराबाद, इंदौर, पटना, पुणे, चंडीगढ़, देहरादून और अहमदाबाद में 5 से 17 साल के बच्चों और उनके माता-पिता से बातचीत करने तथा बच्चों के स्वभाव में हो रहे बदलाव का आकलन करने के बाद यह रिपोर्ट तैयार की. यह सर्वे एसोचैम की सोशल डिवेलपमेंट फाउंडेशन ने तैयार किया. जिसमें कहा गया है कि अधिक  वीडियो गेम खेलने की लत से बच्चों और किशोर हिंसक और आक्रामक रहे है. उद्योग मंडल एसोचैम की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि वीडियो गेम के प्रति बच्चों की दीवानगी दिनों-दिन बढ़ती जा रही है. 82 प्रतिशत से अधिक किशोर हर हफ्ते औसतन 14 से 16 घंटे कंप्यूटर, वेब पोर्टल आदि पर गेम खेलने पर खर्च करते हैं. करीब सात प्रतिशत बच्चों में एक तरह से गेम की बीमारी सी हो गयी है. वे हर हफ्ते करीब 20 घंटे गेम खेलने में निकाल देते है.

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अकेले गेम खेलना पंसद करते है बच्चे

सर्वे में कहा गया है कि मेट्रो शहरों में माता-पिता के नौकरी-पेशा में व्यस्त होने या उनके बिजी लाइफ स्टाइल के चलते वे बच्चों पर ज्यादा ध्यान नहीं दे पा रहे हैं. इस कारण बच्चे अपना अधिकांश समय विडियो गेम्स में गुजारते हैं. ये बच्चे अधिकतर हिंसात्मक वीडियो गेम्स खेलते हैं. इसका असर इनके दिलोदिमाग पर हो रहा है. मेट्रो शहरों में करीब 66 प्रतिशत बच्चे अकेले ही विडियो गेम्स खेलते हैं जबकि मात्र 32 प्रतिशत बच्चे माता-पिता या परिवार के अन्य सदस्यों के घर में मौजूद रहने पर गेम्स खेलते हैं.

माता-पिता अपने बच्चों को चाहकर भी हिंसात्मक विडियो गेम्स खेलने से रोक पाते

सर्वे में ये भी कहा गया है कि मेट्रो शहरों में करीब 65 फीसदी बच्चों के कमरे में कंप्यूटर हैं. यही कारण है कि बच्चे जब भी चाहते हैं, विडियो गेम्स खेलते हैं. इस बात को माता-पिता भी मानते हैं. अधिकतर माता-पिता का कहना है कि उनके बच्चे स्कूल से वापस आने के बाद अधिकांश समय विडियो गेम्स में ही बिताते है. एसोचैम के सेक्रटरी जनरल डी. एस. रावत का कहना है कि माता-पिता अपने बच्चों को चाहकर भी हिंसात्मक विडियो गेम्स खेलने से रोक नहीं पा रहे हैं. एसोचैम की हेल्थ कमिटी के चेयरमैन डॉ. बी. के. राव का कहना है कि विडियो गेम्स का असर इस कदर बच्चों के दिलोदिमाग पर पड़ रहा है कि वे ज्यादा हिंसात्मक हो रहे हैं. इसका नतीजा भी सामने आ रहा है. अब बच्चे भी कई आपराधिक घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं.

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