इंसाफ से वंचना के सवाल का संदर्भ सांस्कृतिक है

Publisher NEWSWING DatePublished Tue, 06/12/2018 - 13:04

Faisal Anurag

झारखंड की राजनीतिक वंचना को गहरे राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक तरीके से समझने की जरूरत है. झारखंड के ज्यादातर राजनीतिक दलों का एजेंडा भी क्रोनी पूंजी के आधार पर ही संचालित होता है. राजनीतिक दलों ने झारखंड आंदोलन के बाद से ही झारखंड के समुन्न्त विकास का एजेंडा छोड़ दिया है और इसका प्रमुख कारण वह पूंजी है, जो निवेश के नाम पर यहां के संसाधनों की लूट करना चाहती है और राजनीतिक दल जिसे पैरोकार बने हुए हैं. इस तथ्य को समझने की भी जरूरत है कि विकास का मतलब केवल पूंजीनिवेश के दरवाजे को पूरी तरह से खोलना नहीं है, बल्कि आत्मनिर्भर  तरीके से विकास को नीचे से निर्धारित करने की प्रक्रिया को तेज करना है और इसके लिए जरूरी सहायता हक के रूप में हासिल करना है. पांचवीं अनुसूची और पेसा एक्ट या भूमिक कानूनों की खासियत से झारखंड कोई विशेष राज्य नहीं मान लिया जा सकता. विशेष राज्य के संदर्भ आर्थिक हैं और विकास के आर्थिक अवसरों के लिए सुविधाजनक माहौल बनाना है.

जबकि पांचवी अनुसूची और पेसा एक्ट स्थानीय भावनाओं के अनुरूप नीतियों के निर्धारण के लिए रास्ता बनता है. 14 सालों में राज्य इसका लाभ भी नहीं उठा सका है तो इसके कारणों की समीक्षा की जानी चाहिए. कारण साफ है कि झारखंड के राजनीतिक दलों ने इस सवाल पर न केवल संविधान का पालन नहीं किया है, बल्कि उसका पालन समुचित तरीके से ना हो इसमें सहायता कर अपने मतदाताओं के साथ धोखा किया, विकास को उसकी जरूरतों के अनुरूप विकसित होने और प्रशासनिक मॉडल बनाने का अवसर दे सकता है. यदि इसे तरीके से समझा जाए और इसे हासिल करने के लिए बड़ा आंदोलन खड़ा किया जाए. झारखंड के आदिवासी मूलवासी विकास के वर्तमान मॉडल को नकराते रहे हैं और दर्जनों जनांदोलन इसके सबूत हैं. इसलिए विशेष राज्य का सवाल एक तरह से झारखंड आंदोलन के दौरान  देखे गए सपने को हासिल करने का हथियार बन सकता है.

बहुलतावादी जनतंत्र की कामयाबी के लिए जरूरी है कि इंसाफ के सभी अवसरों की वैधानिक गारंटी की जाए और इसमें आर्थिक मानवाधिकार सबसे अह्म है. आर्थिक मानवाधिकार को केवल कानूनी संदर्भ में देखने की अपनी सीमाएं और बाध्यताएं हैं. इस नजरिए की पहली सीमा तो यही है कि यह केवल कानून को ही इंसाफ के लिए एक मानक मान लेता है. यह अनिवार्य है कि विधि का प्रशासन  पूरी संजीदगी से सक्रिय हो और वह अपने नागरिकों के लिए इंसाफ की गारंटी करे. लेकिन इसमें सामाजिक विविधता और सामाजिक गैर-बराबरी के सवाल पर अक्सर ओझल हो जाते हैं. इन सवालों पर न तो बहस होती है और न ही इन कारणों से होने वाले नाइंसाफी को जवज्जो दिया जाता है. अक्सर देखा गया है कि मानवाधिकार का पूरा संदर्भ एक मध्यवर्गीय रूझान बन कर रह जाता है और इंसाफ हासिल करने से वंचित सवाल उसके दायरे से बाहर हो जाते हैं. मानवाधिकारों को इस लिए व्यापक संदर्भ में देखना चाहिए, उसका मतलब यह नहीं है कि मानवाधिकार के उन विमर्शों से स्वयं को मुक्त कर दिया जाए, जिसमें कानून हाथ में लेने के शासकीय संदर्भ जुड़े हुए हैं.

आमतौर पर मानवाधिकार और सामाजिक इंसाफ का सवाल या तो दरकिनार होता है या फिर उसे विमर्श के हाशिए पर रखा जाता है. भारतीय समाज में जो सामाजिक और अन्य समाजी नाइंसाफ के सवाल हैं, उसे संबोधित किए जाने की जरूरत है. समानता का संदर्भ इसे हल किए बिना हासिल नहीं किया जा सकता और असमानता की बढ़ती खाई अंततः लोकतांत्रिक प्रकियाओं को बाधित करने तथा फांसीवाद प्रवृतियों को बढ़ावा देने का आधार बन जाती है. भारत की खासियत उसकी विविधता और बहुलतावादी संस्कृति में है. हजारों सालों की समन्वयकारी प्रवृतियों ने इससे कई तरह के नागरिक अधिकारों का इजाद किया है. खासकर इसमें नागरिक संदर्भ कई तरह के सामाजिक अन्याय के खिलाफ हुए संघर्षों के आधार पर निर्मित हुए हैं. इस प्रक्रिया में न केवल समाज की अंतर संरचना को बदलने का प्रयास किया गया है, बल्कि समानता के अनेक सामाजिक संदर्भो को उजागर करने का प्यास किया गया है. लेकिन सच्चाई यह है कि इन तमाम संघर्षों के बाद भी भारतीय समाज व्यापक रूप से सामाजिक गैर-बराबरी और उससे होने वाले अन्यायों का शिकार है. संविधान निर्माण के समय इन तमाम पहलुओं पर व्यापक विमर्ष हुआ और सामाजिक इंसाफ के लक्ष्य को हासिल करने के लिए अनेक प्रावधान निर्धारित किए गए. खासकर कर वंचितो के साथ हो रहे सामाजिक अन्याय को समाप्त करने के लिए संविधान ने अनेक वायदे किए हैं.

बावजूद इसके भारतीय समाज में स्त्रियों, दलितों और आदिवासियों के साथ न केवल भेदभाव बल्कि नाइंसाफी होती है और इसका असर कानून लागू करने वाली संस्थाओं पर भी पड़ता है. भारतीय सोच में अब भी सामाजिक गैर-बराबरी के सवाल  हल नहीं हुए हैं. लेकिन आमतौर पर इन सवालों पर जब हम बात करते हैं तो इसके मानवाधिकार  के पहलू को नजरअंदाज करते हुए ही, इसके कारण समाज में अन्याय के न केवल रूप बदले हैं बल्कि तरीके भी बदले हैं और भारतीय समाज में दलित-आदिवासी और अकलियत के इंसाफ वंचना का सवाल मौजूद है. यह एक सांस्कृतिक सवाल भी है क्योंकि अब भी सदियों से चली आ रही अनेक प्रवृतियां सोचने और व्यवहार को प्रभावित करती हैं. जैसे किसी को ऊंचा और नीचा समझना. छुआछूत के नए तरीके निकालना और अवसरों की समानता में वंचना के लिए हालात और प्रभाव बनाना. अवसर की समानता के लिए आरक्षण केवल एक पहलू है, जबकि वास्तविक समानता के लिए जरूरी है कि हमारा नागरिक समाज एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बने और उसके सोचने देखने और व्यवहार में इन सब को समाहित किया जाए. लेकिन ऐसा होता नहीं है. हमारी पूरी प्रणाली अब भी किसी न किसी तरह के पूर्वग्रहों से ग्रस्त हैं और इसका सबसे पहला शिकार समाज के वंचित जनसमुदायों को ही झेलना पड़ता है, जिसमें उनके लिए मानव बने रहने की भी सीमाएं एक तरह से निर्धारित की जाती हैं और उनके लिए मानवाधिकर तब एक कागजी घोषणा भर बन के रह जाता है.

आदिवासी जनगण के लिए जिन पांचवी और छठी अनुसूची का निर्माण किया गया और विभिन्न तरह के अन्य संवैधानिक प्रावधान बनाए गए, लेकिन उसे लागू नहीं किया गया. हालांकि यह मूलवासियों के लिए भी उतना ही जरूरी संदर्भ है. इसका नजीता यह है कि आदिवासी जनगण न केवल आर्थिक, संस्कृति बल्कि सामाजिक वंचना का शिकार है और जब वह इस प्रवंचना के खिलाफ आवाज उठाता है तो उसे न केवल प्रताड़ित किया जाता है बल्कि उसके लिए किसी तरह के मानवाधिकर की गारंटी नहीं की जाती है. आदिवासी जनगण मानवाधिकार को व्यापक सामाजिक संदर्भ में देखता है. वह संविधान सम्मत और अपने परंपरागत कानूनों के किसी भी उल्लंघन को मानवाधिकार का उल्लंघन मानता है. लेकिन इस सवाल को सामाजिक राजनीतिक फोरम पर भी नहीं उठाया जाता. आखिर एक खास तरह की जीवन दृष्टि रखने वालों के लिए किसी खास तरह के मानवाधिकार की बात क्यों नहीं की जा सकती है. विश्व के विभिन्न मंचों पर इस तरह के सवाल उठते रहे हैं, लेकिन भारत सहित दुनिया के कई देश हैं जो देशज लोगों के अस्तित्व होने का ही निषेध करता रहा है. इससे बड़ी त्रासदी और क्या हो सकती है.

(लेखक न्यूज विंग के वरिष्ठ संपादक हैं और ये उनके निजी विचार हैं)

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