राजकिशोर जी का जाना 70-80 के दशक की पत्रकारिता के एक शानदार स्तंभ का जाना है

Publisher NEWSWING DatePublished Tue, 06/05/2018 - 11:49

Babban Singh

राजकिशोर जी का जाना सत्तर-अस्सी के दशक की गंभीर पत्रकारिता के एक शानदार स्तंभ के जाने के समान है. हमें याद हैं रविवार के शुरुआती दौर में एसपी के रविवार पत्रिका में राजकिशोर के कुछ लेख. लेकिन हिंदी में राजकिशोर जी के गंभीर लेखन 80 के दशक में राजेन्द्र माथुर के दौर के नभाटा के विचार पृष्ठ पर छपने वाले लेख थे. कदाचित उस दौर में वे वहां विचार पेज के संपादक भी थे.

राजकिशोर ने उस दौर में समाज, राजनीति, कला-संस्कृति व अर्थव्यवस्था सहित तमाम विषयों पर उम्दा लेख लिखें. उन दिनों उनके लिखे अधिकांश लेख हमारे कतरनों की ढेर में आज भी कहीं होंगे. कदाचित हिंदी में राजेन्द्र माथुर के बाद राजकिशोर ही थे जिनके लिखें लेखों ने हमें हिंदी पत्रकारिता को करियर के रूप में अपनाने के लिए प्रेरित किया.

हालांकि 90 के दशक के शुरुआत में हम दिल्ली पहुंच गए पर नभाटा से जाने के कारण उनसे कभी मुलाकात नहीं हो पाई. बाद के दिनों में मुख्य पत्र-पत्रिकाओं में उनके लेखों के आने का क्रम कम हो गया था और कदाचित अपनी अंग्रेजी में पढ़ने की गति अधिक होने के कारण उनके लिखे लेखों से जुड़ाव कम होता गया.

लेकिन राजकिशोर के सुनहरे लेखन के अंतिम दौर का एक लेख मुझे आज भी याद है. सुरेंद्र वर्मा का उपन्यास "मुझे चांद चाहिए" पर उन्होंने जबरदस्त समीक्षा लिखी थी. हालांकि उन्होंने उत्तर आधुनिक काल के पृष्ठभूमि वाले उस उपन्यास को खारिज किया था पर उस लेख के अंतिम पारा तक पहुंचने तक ऐसा लगता कि वे उस उपन्यास की कथ्य व शैली का समर्थन कर रहे हैं. हालांकि उनके उसी लेख के कारण हमने तत्काल ही उस उपन्यास को पढ़ा और एक पाठक के तौर पर पसंद भी किया था. पर आज हमें यह कहने में कोई आपत्ति नहीं कि हम राजकिशोर के उस उपन्यास के नकार का पूरी तरह समर्थन करते हैं.

हाल में समकालीन जनमत के किसी पुराने अंक में "लोकतंत्र" विषय पर उनका लेख पढ़ा था और उसके एक अंश को इस फोरम पर शेयर भी किया था.राजकिशोर जी को हाल ही में पुत्रशोक हुआ था. कदाचित उसे वे बर्दाश्त नहीं कर पाए. लेकिन वे जहां भी हों,  हम जैसे उनके पाठक उन्हें उनके लेखों व विचारों के कारण याद करेंगे. नमन.

बबन सिंह के फेसबुक वॉल से साभार

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