रिम्स प्रकरण : क्रिमनल ऑफेंस है, सरकार नहीं बच सकती अापराधिक आरोप से

Publisher NEWSWING DatePublished Mon, 06/04/2018 - 13:23

Faisal Anurag

चालीस घंटों में रिम्स में जो मौत का तांडव हुआ, वह एक अपराधिक कृत्य है और इसकी जिम्मेदारी से मुख्यमंत्री, स्वास्थ्य मंत्री और विभाग के सचिव बच नहीं सकते हैं. औचक हड़ताल के आयोजक, नर्सेस और डॉक्टर के साथ रिम्स प्रबंधन भी इसका सह अपराधी हैं. जिनकी जिंदगी बच सकती थी, उन्हें बेमौत मार दिया गया है. हाईकार्ट से उम्मीद की जा रही है, वह इसे स्वतः संज्ञान में लेगा और अपराधिक मुकदमा दायर करने का आदेश जारी करेगा. राज्य सरकार की विफलता साबित करती है कि वह तत्काल की चुनौतियों और समस्याओं से निपटने में कारगर नहीं है. राज्य की पूरी मिशनरी जिस तरह तमाशबीन बनी रही वह स्वयं में एक तल्ख और क्रिमिनल ऑफेंस  है.

मुख्यमंत्री ने 3 जून को 1 बजकर 33 मिनट पर ट्विट कर अपनी चिंता जाहिर किया. तब तक बहुत देर हो चुकी थी.  एक दर्जन से ज्यादा मरीज दम तोड़ चुके थे और बहुत सारे लोग तड़प रहे थे. उन चीखों और रूदन को सुनने वाला कोई नहीं था. जिससे पूरा रिम्स परिसर दर्द में डूबा हुआ था. जब चारों ओर अफरातफरी थी, प्रशासन और सरकार में कोई भी कराह नहीं सुन रहा था और न ही मरीजों को कोई तसल्ली दे रहा था. ऐसा लग रहा था कि लोगों को तड़पने के लिए और अपने हाल पर रहने के लिए जानबूझ कर छोड़ दिया गया हो.

यह एक आपात स्थिति थी और इससे आपात तरीके से निपटा जा सकता था. लेकिन इसके लिए पहल किसी ने भी नहीं की. दुखद प्रसंग यह भी है कि इस हालात को बनने के तुरंत बाद जिस तरह रिम्स प्रबंध को सक्रिय होना चाहिए था, वह नहीं हुआ. न ही नाजुक अवस्था वाले मरीजों की चिकित्सा के लिए फौरी तौर पर कोई कदम उठाया गया. जाहिर है कि यह सामान्य तथ्य नहीं है. बावजूद इसके लिए कोई भी जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार नहीं है और न ही किसी की जिम्मेदारी सुनिश्चित की जा रही है. समझौता वार्ता के बाद भी लापवाही बनी हुयी है और सरकार इसमें कोई कारगर कदम उठाने का संकेत नहीं दे रही है.

स्वास्थ्य मंत्री की नींद मुख्यमंत्री के संदेश के बाद ही खुली. रिम्स को हर छोटे-बड़े मामले में दखल देने वाले स्वास्थ्य मंत्री रामच्रंद्र च्रद्रवंशी की यह लापरवाही माफ नहीं की जा सकती है. हड़ताल होते ही उन्हें दखल देना चाहिए था और हेल्थ सेक्रेटरी को भी इसमें पीछे नहीं रहना चाहिए था. अन्य मंत्रि़यों को भी चाहिए था कि वे इस अपात स्थिति से निपटने में अपनी सक्रियता दिखाते. सवाल उठता है कि दर्जनों  मौत के बाद भी वे सब सजग क्यों नहीं हुए. आखिर कोई आपदा होगी तो उससे निपटने में राज्य की मिशनरी कैसे कारगर होगा. उसके पास कोई ठोस कार्य योजना है ही नहीं और न ही वैकल्पिक तैयारी है.

विपक्ष भी बयान देने तक सिमटा रहा. उसे जिस तरह त्वरित कार्रवाई कर राज्य मशीनरी को जीवंत कराना चाहिए, इसमें वह विफल रहा. आखिर इस चौतरफा विफलता से क्या आगे कोई सबक लिया जाएगा. अभी तक की पहल देखकर कहा जा सकता है कि इसकी कोई ठोस कार्ययोजना किसी के पास नहीं है. हेल्थ सेवाओं के प्रति इस तरह की संवेदनहीनता बताती है कि राज्य के नागरिकों को किन हालातों पर छोड़ दिया गया है. इन्हीं कारणों से मरीज राज्य के बाहर के अस्पतालों में जाते हैं. राज्य सरकार का यह दायित्व है  कि वह राज्य के नागरिकों में यह विश्वास बहाल करे कि राज्य के सबसे बड़े अस्पताल रिम्स में ऐसे हालात पैदा नहीं होंगे और बेहतर चिकित्सा की सुविधा प्रत्येक मरीज को उपलब्ध करायी जाएगी.  इसकी गारंटी करें. हर समय मीडिया में आने के लिए लालायित अफसर, मंत्री रिम्स प्रकरण पर खामोश क्यों रहें.

राज्य के सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं और संस्थानों का पहले से ही बुरा हाल है. जमशेदपुर के एमजीएम मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में पिछले साल जिस तरह बच्चों की मौत हुयी है, उसे भी गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है. जमशेदपुर के इस अस्पताल में सुधार के लक्षण नजर नहीं आ रहे हैं. क्योंकि इस दिशा में कोई पहल ही नहीं है. सवाल उठता है कि इस तरह के गैरजिम्मेदाराना हरकतों की जबावदेही से सरकार कैसे बच सकती है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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