प्रणब ने साधा संघ का मकसद

Publisher NEWSWING DatePublished Fri, 06/08/2018 - 13:59

Satyendra Ranjan

प्रणब मुखर्जी की बेटी ने एक दिन पहले समझदारी भरी बात कही. वैसे पूर्व राष्ट्रपति में ये समझदारी ना हो, ये मानना कठिन है. बल्कि ये मानने के ठोस कारण हैं कि अगले दिन यानी 7 जून को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मंच पर अवतरित होने और उसके पहले संघ के संस्थापक केशव बलिराम हेगडेवार को भारत का महान पुत्रबताने का उनका निर्णय सुनियोजित था. बहरहाल  शर्मिष्ठा मुखर्जी की ये बात पत्थर पर लिखी लकीर की तरह है कि प्रणब मुखर्जी ने संघ के मंच से क्या कहा, यह किसी को याद नहीं रहेगा. जबकि वो तस्वीरें याद रहेंगी, जो वहां से लोगों के दिमाग में उतरीं. इनमें मुखर्जी की उपस्थिति में संघ के भगवा ध्वज का आरोहण, संघ के वो गीत जिनमें हिंदू राष्ट्र का कई बार उल्लेख हुआ और मुखर्जी के साथ खड़े होकर संघ नेताओं का अपने ख़ास ढंग से अभिवादन करना शामिल है.  

वैसे भी मुखर्जी क्या कहेंगे, इसे संघ प्रमुख मोहन भागवत ने आरंभ में ही अप्रासंगिक बता दिया. कहा कि संघ-संघ है, प्रणब मुखर्जी-प्रणब मुखर्जी हैं. मतलब वे अपनी बात कहें, मगर उससे संघ पर कोई फर्क नहीं पड़ता. दरअसल मुखर्जी को वहां संघ ने उनकी बात सुनने के लिए नहीं बुलाया था. बल्कि उन्हें बुलाकर उसने अपना मकसद साधा. खुद मोहन भागवत ने कहा कि जिस मौके पर मुखर्जी आए हैं, वह सालाना आम कार्यक्रम है. लेकिन इसके पहले कब उसकी इतनी चर्चा हुई थी? इसके पहले कब देश के तमाम टीवी चैनलों ने उसका लाइव प्रसारण किया था? इसके पहले कब वहां होने वाले संघ के कर्मकांड की झलक इतने व्यापक रूप से लोगों तक पहुंची थी? इस बार यह सब हुआ, तो उसके लिए संघ अवश्य ही प्रणब मुखर्जी का आभारी होगा.

ये बात बेमायने है कि संघ ने स्वीकार्यता पाने की कोशिश में मुखर्जी को आमंत्रित किया. आज संघ को ऐसी स्वीकार्यरता की जरूरत नहीं है. खुद उसकी शाखाओं से निकले व्यक्ति आज राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री पदों पर हैं. देश के लगभग एक तिहाई मतदाताओं को संघ ने अपनी विचारधारा के आधार पर गोलबंद कर लिया है. इस सूरत में एक पूर्व राष्ट्रपति से उसे स्वीकार्यकता की जरूरत होगी, ये समझना खुद को भ्रम में रखना है. मगर संघ उस वैचारिक संघर्ष से वाकिफ़ है, जो इस वक्त देश में चल रहा है. ऐसी लड़ाईयों में विरोधी खेमे के चर्चित व्यक्तियों का अपने एजेंडे के मुताबिक उपयोग एक कारगर रणनीति होती है. प्रणब मुखर्जी का ऐसा ही इस्तेमाल उसने किया.

मुखर्जी ने ऐसा कुछ नहीं कहा, जिससे संघ और उसके समर्थक असहज होते. मोहन भागवत ने उनसे पहले ही विविधता में एकता, भारत में जन्मे सभी लोगों के भारत-पुत्र होने और संघ की राय में पूरे विश्व के एक कुटुंब होने की बातें कह दी थीं. तो उसके बाद मुखर्जी ने बहुलता या धर्मनिरपेक्षता पर जोर देकर कौन-सी ऐसी बात कह दी, जो संघ को बुरी लगती. उल्टे उन्होंने प्राचीन भारत की वैसी व्याख्या की जो संघ के स्वर्ण युगकी धारणा से मेल खाती है. उन्होंने पांच हजार साल के इतिहास में भारत में विभिन्न मानव-समूहों के आने का उल्लेख किया, लेकिन हमलावरसिर्फ मुसलमानों को बताया. प्राचीन भारत का जिक्र करने के बाद उन्होंने 600 साल की छलांग लगा दी. और उस पूरे काल को लांघ गए, जब भारत पर मुस्लिम शासकों ने राज किया. अशोक, चंद्रगुप्त मौर्य, गुप्त वंश, चाणक्य आदि का उल्लेख किया. लेकिन अकबर का नाम उनकी जुबान पर नहीं आया. सहिष्णुता की बात की, लेकिन उन 600 वर्षों के दौरान हुए मेल-जोल और वजूद में आई गंगा-जमुनी तहजीब पर चुप रहे. राष्ट्र, राष्ट्रवाद और देशभक्ति को परिभाषित करते हुए अपनी बात शुरू की, लेकिन 1857 के बाद भारत में राष्ट्रवाद की विभिन्न धारणाओं के बीच हुए वैचारिक टकराव का उल्लेख करने से मुंह चुरा लिया. भारतीय संविधान को हमारे आधुनिक राष्ट्रवाद का स्रोत बताया, लेकिन संविधान और इस राष्ट्रवाद के लिए पिछले चार साल में कैसे खतरे पैदा हुए हैं और किसकी वजह से हुए हैं, इससे आंखें मोड़ लीं.

जब उन्होंने ऐसी विचाराधारात्मक बातें नहीं कीं, यह उम्मीद करना बेमतलब ही है कि संघ जो कहता और जो करता है, उस फर्क पर वे कुछ बोलते. जाहिर है, उन्होंने महात्मा गांधी का नाम लिया, लेकिन गांधीजी की हत्या किस वजह से हुई, ये बोलने का साहस उनमें नहीं था. भारत की महान संस्कृतिका जिक्र करते समय वर्ण-व्यवस्था की अमानवीय व्यवस्था और इसके नाम पर हुए मानवाधिकारों के घोर हनन की बात किसी के ध्यान से बाहर रहे, तो यही समझना चाहिए कि वो व्यक्ति या तो अज्ञानी है, या फिर उसके इरादे में खोट है. इसी तरह क्या यह अपेक्षित नहीं था कि मुखर्जी संघ को बताते कि भारत में जन्मे सभी लोगों के भारत-पुत्रहोने की बात करना लिंग-भेदी सोच है, क्योंकि इसमें भारत-पुत्रियों और ट्रांसजेंडर्स के लिए कोई जगह नहीं है. उनके ऐसा ना कहने के बावजूद देश के सेक्यूलर खेमे का एक हिस्सा उनके भाषण पर संतुष्ट है, तो इस पर सिर्फ तरस ही खाया जा सकता है. जब ज़रूरत संघ और मुखर्जी के मकसदों को बेनकाब करने की है, तब पूर्व राष्ट्रपति के निराकार (abstract) और दब्बू भाषण पर राहत महसूस करना अज़ीब है.

बेशक बात मुखर्जी के मकसद पर भी होनी चाहिए. वे भोलेपन में वहां चले गए, इसे कोई विवेकशील व्यक्ति नहीं मानेगा. बल्कि इस संदर्भ में वे खबरें अधिक विश्वसनीय लगती हैं कि वे 2019 में प्रधानमंत्री पद के सर्व-सम्मत उम्मीदवार के रूप में उभरने की कोशिश कर रहे हैं. प्रधानमंत्री बनने की उनकी महत्त्वाकांक्षाएं जग-जाहिर हैं. अब ये चर्चाएं भरोसे के काबिल लगती हैं कि राष्ट्रपति बनने के बावजूद उनकी ये प्रबल इच्छा शांत नहीं हुई है.

वरना  यह तो वे भी जानते होंगे कि संघ पर उनकी बातों का कोई फर्क नहीं पड़ेगा. महात्मा गांधी की सलाह से संघ प्रभावित नहीं हुआ था. सभी धर्मावलंबियों के लिए संघ की शाखाओं के द्वार खोलने के जयप्रकाश नारायण के परामर्श का भी उस पर कोई असर नहीं हुआ. जबकि वे दोनों ऊंचे नैतिक कद वाली शख्सियत थे. प्रणब मुखर्जी का तो सार्वजनिक जीवन में कभी कोई नैतिक कद नहीं रहा. जब संघ ने जेपी का रणनीतिक उपयोग करने के बाद उन्हें महज तस्वीरों में समेटने लायक मान लिया, तो प्रणब मुखर्जी की उसकी राय में क्या कीमत होगी?

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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