प्रणव मुखर्जी का इतिहासबोध आरएसएस का एंटी थीसिस है

Publisher NEWSWING DatePublished Fri, 06/08/2018 - 13:23

Faisal Anurag      

क्या आरएसएस प्रणव मुखर्जी का इस्तेमाल करने में सफल रहा या प्रणव मुखर्जी अपनी बातों से संघ के विचारो में बदलाव की प्रकिया की शुरूआत करा सकेगे ? मुखर्जी से भाषण के बाद यह सवाल पूछा जा रहा है कि प्रणव मुखर्जी की नागपुर या़त्रा से किसका मकसद पूरा हुआ और इसका राजनीतिक महत्व क्या है इन सवालों की ठोस वजह है, क्योंकि संघ की राष्ट्रवाद, राष्ट्रीयता और देशभक्ति की अपनी रूढ़ी मान्यता है और इसी तरह वह सास्कृतिक संगठन होने के बाद भी राजनीतिक प्रक्रिया भी पहले जनसंघ और अब भारतीय जनता पार्टी का आधार है. संघ की यह कोशिश 1967 से ही चल रही है कि उसे भारत में हाशिये पर से निकल कर यदि बड़ी राजनीतिक भूमिका निभानी है तो सेकुलर समूहों के स्थापित लोगों को अपने बीच लाना होगा. 1967 में डा. राममनोहर लोहिया ने उसे जहां सर्वस्वीकृत बनाने में मदद किया, वहीं 1974 में जयप्रकाश नारायण ने. 1974 के पहले जनसंघ और संघ दोनों के बारे जेपी के विचार बहुत अलग थे, वे इन संगठनों को भारतीय समाज के लिए घातक मानते थे, लेकिन 1974 के बाद उनके विचार बदले और 1975 में उन्होंने आरएसएस की बैठक में ही यह कह दिया कि यदि वह फासिस्ट हैं तो जेपी भी फासिस्ट हैं. अब प्रणव मुखर्जी ने संघ के संस्थापक हेडगेवार को भारत का सपूत बताकर बहस को तेज कर दिया है.

यदि प्रणब मुखर्जी के व्याख्यान को देखा जाए तो उसमें कई मान्यताएं उस इतिहास की एंटी थीसिस है जिसे संघ प्रचारित करता है. उन मिथकों का निशेध भी प्रणव मुखर्जी करते हैं जिसे संघ ने प्रचारित कर रखा है. बावजूद इसके उनके व्याखान में प्राचीन भारत और मध्यकालीन भारत की जो बात कही गयी है, वह आरएसएस के नजरिए से मेल खाती हैं. प्रणव मुखर्जी ने अपने भाषण में कहा कि 12वीं सदी में मुसलमान आक्रांता के रूप में भारत आए. संघ भी यही कहता रहा है. हालांकि ऐतिहासिक तथ्य यह है कि तीन चरण में इस्लाम मानने वाले भारत आए. इस्लाम पहली बार व्यापारियों के माध्यम से दूसरी बार सूफियों के साथ और फिर शासकों के साथ आया. इन शासकों  में कई हमलावर थे और कई भारत के राजाओं के निमंत्रण पर भी आए थे. प्रणव बाबू ने आधुनिक  भारत के संदर्भ में जिन ऐतिहासक तथ्यों का हवाला दिया, वह जरूर संघ के इतिहास का एंटी थीसिस जैसा है. तो क्या आरएसएस इससे सबक सीख इतिहास का अपना नजरिया बदलेगा ? आलोचक कह रहे हैं कि जब जेपी इस संगठन को नहीं बदल पाए तो शायद ही प्रणव बाबू की बातों का उन पर कोई असर होगा. क्या 2019 के बाद उभरने वाले राजनीतिक परिदृष्य में फिर प्रणव बाबू का राजनीतिक इस्तेमाल होगा, यह सवाल तो भविष्य ही हल करेगा.

प्रणव मुखर्जी ने अपने व्याखान में भारत की बहुलतावादी संस्कृति पर जोर दिया. देखा जाए तो हिंदु राष्ट्र की अवधारणा के यह विपरीत है. हिंदु राष्ट्र जहां एक भाशा, एक धर्म, एक संस्कृति की वकालत करता है, वहीं बहुलतावाद का अर्थ है 450 समूहों से ज्यादा आदिवासी  1200 दलित जातियों और 3743 अन्य जातियों के साथ बनने वाली वह संस्कृति है, जिसमें 7 बडे धर्म और हजारों बोलियों और भाषाओं से सचा गया समूह और समाज की विविधता. प्रणव बाबू ने कहा कि हम अपनी ताकत सहिश्णुता से हासिल करते हैं. हम अपनी विविधता को ज्यादा महत्व देते हैं क्योंकि हम एक अस्मिता नहीं हैं.यानी कई अस्मितायें भारतीय अस्मिता का निर्माण करती हैं. प्रणव बाबू कहते हैं कि भारत की आत्मा बहुलता और सहिश्णुता में ही बसती है. भारत का राष्ट्रवाद किसी भाषा या धर्म से बंधा हुआ नहीं है. मुखर्जी ने नेहरू और अंबेडकर की चर्चा की. उनके व्याखान का बड़ा हिस्सा नेहरूवादी इतिहासबोध का ही परिचायक है, जो भारत की खोज के लिए संघ के नवप्रशिक्षित को आमंत्रित करता है. यह वह भारत नहीं है, जिसे संघ अब तक पढाता है. मुखर्जी ने सार्वजनिक  विमर्ष को हिंसा से मुक्त कराने की बात की और साथ एक राष्ट्र के रूप में शांति,सौहार्द्र और खुशहाली की ओर बढ़ने की भी बात की. राष्ट्र को यदि धर्म, हठधर्मिता या असहिष्णुता से परिभाषित  किया जाएगा तो हमारा अस्तित्व कमजोर होगा. उन्होंने कहा कि राष्ट्रवाद को हिंदु,मुस्लिम,सिख इसाई के फ्यूजन से ही आगे ले जाया जा सकता है. उन्होंने कहा कि सार्वजनिक संवाद का निर्माण भिन्न मतों के स्वीकार्यरता से ही मजबूत होता है. गांधी,नेहरू,पटेल और अंबेडकर के दर्शन पर उन्होंने  जोर दिया और उसे भारत के लिए जरूरी भी बता दिया. इन्होंने भारतीय विविधता और बहुलता की व्यापक व्याख किया और कहा कि इसे किसी एक के वर्चस्व के आइने में नहीं देखा जा सकता.

प्रणव बाबू ने अपनी बात कह दी है. संघ के नवप्रशिक्षित स्वयंसेवक और पुराने लोग इससे क्या सीखते हैं या संवाद की प्रक्रिया को किस दिशा में आगे ले जाते हैं, यह तो वक्त ही बताएगा. लेकिन प्रणव मुखर्जी की खत्रा से उठा गुबार अभी कई तरह के विश्लेषण और व्याख्याओं का दौर जारी रखेगा.

(लेखक न्यूज विंग के वरिष्ठ संपादक हैं और ये उनके निजी विचार हैं)

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