बंदूक के संरक्षण और मुनाफे की लालच में नशे की खेती, चतरा, लातेहार और खूंटी के बीहड़ों में लहलहा रही अफीम की फसल

Publisher NEWSWING DatePublished Sat, 01/13/2018 - 16:30

Satya Sharan Mishra/ Sonu Ansari

Ranchi: झारखंड की खेतों में इन दिनों फसलों से ज्यादा अफीम की खेती धडल्ले से हो रही है. झारखंड भी अब अफगानिस्तान की तरह नारकोटिक्स ट्राइएंगल हब बनता जा रहा है. नक्सलियों के बन्दूकों की संरक्षण और ज्यादा मुनाफे की लालच ने यहां के दूरदराज के ग्रामीण किसानों को नशे की खेती में ढकेल दिया है. इस अवैध कारोबार से हो रही काली कमाई से नक्सली मालामाल हो रहे हैं और राज्य के किसान अपराध के दलदल में फंसते जा रहे हैं.  प्रदेश के 24 में से 18 जिलों में अफीम की खेती होती है. पहले सिर्फ चतरा जिला ही अफीम की खेती के लिए बदनाम था, लेकिन अब खूंटी, पलामू, गढ़वा, लातेहार और हजारीबाग में भी व्यापक पैमाने पर अफीम की खेती हो रही है. फिलहाल चतरा, लातेहार और खूंटी जिला अफीम की खेती में सबसे आगे चल रहा है. महज एक महीने के अंदर इन जिलों में सैकड़ों एकड़ जमीन में लगी अफीम की अवैध खेती को नष्ट किया गया है. गौरतलब है कि अफीम की खेती के लिए नारकोटिक्स ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंस रूल्स-1985 के नियम 8 के तहत लाइसेंस लेना जरूरी होता है, जबकि झारखंड में अफीम की खेती करने वालों के पास लाइसेंस है ही नहीं.

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महज एक महीने के अंदर नष्ट की गयी अफीम की खेती

11 जनवरीः खूंटी के मुरहू और अड़की थाना क्षेत्र के रायतोडांग, दुन्दीडीह गांव में लगभग 26 एकड़ से अधिक में लगे अफीम की फसल को नष्ट किया गया है.

11 जनवरीः चतरा के कुंदा थाना क्षेत्र के बनठा के जंगल में पांच एकड़ में लगे पोस्ते के फसल को नष्ट किया गया.

8 जनवरीः चतरा के कान्हाचट्टी प्रखंड के बीर लुटूदाग के जंगलो में सीआरपीएफ के सहयोग से वन कर्मियों ने पांच एकड़ में लगे अफीम की खेती को नष्ट किया.

6 जनवरीः चतरा के लावालौंग पुलिस ने कोलकोले पंचायत के सात एकड़ वन भूमि पर लगी अफीम की फसल को नष्ट कर दिया.

27 दिसंबरः लातेहार की चंदवा पुलिस बोदा पंचायत में लगभग सात एकड़ वनभूमि में लगे पोस्ता की फसल को पुलिस ने नष्ट किया.

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26 दिसंबरः  लातेहार के बालूमाथ थाना क्षेत्र के बालुभांग पंचायत में 8 एकड़ में लगे अफीम की खेती को नष्ट किया गया.

25 दिसंबरः पलामू जिले के तरहसी थाना क्षेत्र अंतर्गत चिड़ी खुर्द गांव स्थित वन भूमि में लगाए गए करीब दो एकड़ में लगी पोस्ते की फसल नष्ट की गयी.

17 दिसंबरः लातेहार की चंदवा पुलिस अंबाटांड़ एवं जामुनटाड़ के पहाड़ की तलहटी वन भूमि में चार एकड़ में लगी पोस्ता की खेती को नष्ट किया.

14 दिसंबरः लातेहार के चंदवा थाना क्षेत्र के मरमर व सेकलेतरी नदी किनारे पांच एकड़ भूमि पर लगे पोस्ते की फसल को पुलिस ने नष्ट किया.

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सालाना 100 करोड़ से अधिक का है झारखंड में अफीम का कारोबार

पुलिस के अनुसार ब्राउन शुगर और अफीम से जुड़े नशीले पदार्थों के लिए झारखंड एक कॉरिडोर की तरह बनता जा रहा है. यहां अक्सर बांग्लादेश और नेपाल से तस्कर आते रहते हैं. अनुमान के मुताबिक झारखंड में अफीम का सालाना अवैध व्यापार सौ करोड़ से अधिक का है. अफीम की खेती के लिए पहाड़ों और जंगलो से घिरे स्थानों का चयन किया जाता है. ऐसे जगह इसलिए चुने जाते हैं क्योंकि ये आम जनों और पुलिस की नजरों से काफी दूर होते हैं. इन बीहड़ स्थानों तक पुलिस और सुरक्षा बलों का पहुंचना आसान नहीं होता है. 2016 में नोटबंदी ने जब नक्सलियों की कमर तोड़ दी तब उसके बाद उन्होंने अफीम की खेती को अपनी आमदनी का जरिया बना लिया. नोटबंदी के बाद मजदूर और किसान भी आर्थिक तंगी का शिकार हो गए थे. इसका फायदा नक्सलियों ने उठाया और उन्हें लालच देकर अफीम की खेती में लगाया.  

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नारकोटिक्स एक्शन प्लान फेल

अफीम की खेती पर नकेल करने के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय के नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के डिप्टी डायरेक्टर जनरल  ने मुख्य सचिव राजबाला वर्मा को इस बाबत पत्र लिखा था. उन्होंने अफीम और पोस्ता की अवैध खेती के मामले में केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो के एक्शन प्लान को लागू करने की जरूरत बताई थी, साथ ही ब्यूरो के स्तर से मामले में महत्वपूर्ण निर्देश भी दिए थे, लेकिन यह प्लान सही तरीके से लागू ही नहीं हो गया. यही वजह है कि राज्य में अफीम की खेती बदस्तूर जारी है.

नारकोटिक्स एक्शन प्लान के तहत क्या है गृह मंत्रालय का निर्देश

नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो मुख्यालय के एक्शन प्लान के तहत अवैध अफीम की खेती को नष्ट करने का निर्देश दिया गया है. यह भी निर्देश है कि हर जिले में उस स्थान की मैपिंग करना है जहां अफीम और पोस्ता की खेती होती है. गांव और थाना क्षेत्र का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए. सितंबर से जिला लेवल कमेटी के अधिकारी प्रखंड और थाना लेवल पर मामले में बैठक कर रणनीति बनाने का भी निर्देश दिया गया है. प्लान के तहत अफीम की खेती से होने वाले नुकसान को लेकर जागरूकता अभियान चलाना का निर्देश है. एफएम रेडियो, एसएमएस, टीवी, सिनेमा आदि के जरिए लोगों को जागरूक करने और सभी ग्राम पंचायतों में एनडीपीएस एक्ट के संबंध में स्थानीय भाषा में एडवाइजरी जारी करने का निर्देश है.

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अफीम की खेती कर आर्थिक तंत्र मजबूत करते हैं नक्सली

झारखंड में उगाये जाने वाली अफीम के कारोबार में नक्सली संगठनों की भूमिका अहम है. इन्हीं के जरिए ड्रग तस्कर और फाइनांसर किसानों तक अपनी पैठ बनाते हैं. फायदे का बड़ा हिस्सा नक्सलियों को मिलता है. यही नक्सलियों के आर्थिक तंत्र को मजबूत करता है. अफीम की बिक्री से मिले पैसे से नक्सली हथियार और विस्फोटकों का जखीरा खरीदते हैं.

अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक लाख किलोग्राम बिकता है अफीम

अफीम की खेती इसलिए भी फायदे का व्यवसाय माना जाता है. क्योंकि इसके पौधे का हर भाग महंगे दामों में बिकता है. बताया जाता है कि एकड़ जमीन में 40 किलोग्राम अफीम की पैदावार होती है. यह स्थानीय बाजार में 25 हजार रुपये किलो बिकती, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमत एक लाख रुपये तक होती है. इतना ही नहीं अफीम के फल से निकलने वाला पोस्ता दाना बाजार में एक हजार रुपये किलोग्राम, फल का छिलका भी 500 से 700 रुपये प्रति किलो बिक जाता है.

झारखंड में किस वर्ष अफीम की कितनी फसल हुई नष्ट

2012-13 : 274 एकड़

2013-14 : 158 एकड़

2014-15 : 527.5 एकड़

2015-16 : 474 एकड़

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