राजनीति से प्रेरित है समय पर छात्र संघ चुनाव का न होना, युवा नेतृत्व को कुंठित कर रहे सरकार-विवि प्रशासन

Publisher NEWSWING DatePublished Wed, 06/06/2018 - 17:11

Ranchi : छात्र राजनीति देश व राज्य की राजनीति की दिशा व दशा तय करती है. इसके दो बड़े उदाहरण इस देश के अंदर है. 1974 के समय जयप्रकाश नारायण द्वारा किए गए छात्र आंदोलन के बाद छात्र राजनीति को एक नया आयाम मिला. JP के नेतृत्व में पूरे देश भर के छात्रों ने 1 साल तक विश्वविद्यालय महाविद्यालय बंद रखने का आह्वान किया था. JP ने कहा था कि केवल मंत्रीमंडल का त्यागपत्र या विधानसभा विघटन काफी नहीं है, आवश्यकता एक बेहतर राजनीतिक व्यवस्था निर्माण करने की है. छात्रों की सीमित मांग जैसे भ्रष्टाचार एवं बेरोजगारी का निराकरण, शिक्षा में क्रांतिकारी परिवर्तन के बिना देश में क्रांति की कल्पना नहीं की जा सकती है.  यह आंदोलन सत्ता बनाम जनता का रूप ले लिया. दूसरा बड़ा उदाहरण आजसू है जो झारखंड अलग राज्य की मांग को लेकर संघर्षरत था. छात्र जेपी का आंदोलन अपने समय तीव्र हुआ और आजसू का आंदोलन अपने समय उग्र हुआ, इसका परिणाम यह हुआ कि केंद्र की राजीव गांधी सरकार को झुकना पड़ा तथा मजबूरन छात्रों से वार्ता करनी पड़ी थी. जेपी आंदोलन के समय ही विश्वविद्यालय में छात्र राजनीति की दशा और दिशा तय हो गई थी, जिसका उदाहरण छात्रों का आजसू आंदोलन था.

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अनियमित छात्र संघ चुनाव से बढ़ी छात्रोंं की समस्याा

रांची विश्वविद्यालय में छात्र संघ चुनाव लगातार अनियमित तरीके से होते रही है. 2007 में रांची विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव लगभग तीन दशक के बाद और फिर 2007 के बाद 2016 में दोबारा चुनाव हुआ, यानी दोबारा चुनाव होने में लगभग एक दशक लग गए. लगातार छात्र संघ चुनाव को रांची विश्वविद्यालय द्वारा टाला जाता रहा है, जिसका सीधा असर छात्र और युवा विचारधारा पर हुआ. जबकि देश और राज्य के तमाम ऐसे विश्वविद्यालय हैं, जहां लगातार समय पर छात्र संघ चुनाव कराई जाती रही है और उसके सकारात्मक परिणाम भी हुए हैं. रांची विश्वविद्यालय के द्वारा छात्र संघ चुनाव को टालना किसी ना किसी राजनीति से प्रेरित रहता है, जिसका खामियाजा लगातार छात्र भुगत रहे हैं और छात्रों की समस्या के निराकरण हेतु उनका कोई नेतृत्व नहीं कर पा रहा है. नेतृत्वकर्ता की कमी की वजह से विश्वविद्यालय और महाविद्यालय प्रशासन पर काम करने का दबाव नहीं बनाया जा पा रहा है, जिससे शिक्षा विभाग से जुड़े कर्मी और पदाधिकारी बेलगाम हो गए हैं और छात्र की समस्या बढ़ गई है.

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क्या कहते हैं छात्र नेता

आजसू छात्र संघ, प्रदेश प्रवक्ता साहित्य सिंह  ने कहा कि छात्र राजनीति लोकतंत्र में आरंभिक नेतृत्व है. चुनाव ना कराने से यह साफ तौर पर पता चलता है कि विश्वविद्यालय प्रशासन व सरकार छात्रों की समस्याओं के साथ खिलवाड़ कर रही है, इससे साफ तौर पर जाहिर है कि विश्वविद्यालय प्रशासन व सरकार युवा नेतृत्व का विकास नहीं चाहती है. लोकतंत्र में छात्र संघ चुनाव नहीं कराना लोकतंत्र की भ्रूण हत्या कराने के बराबर है.

झारखंड छात्र संघ, अध्यक्ष एस अली  ने कहा कि चुनाव होना ही चाहिए और सिर्फ चुनाव ही नहीं, बल्कि चुनाव पूर्व छात्र नेताओं के अधिकार क्षेत्र तय होने चाहिए.

एनएसयूआई, छात्र नेता विश्वजीत सिंह  ने कहा कि सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन छात्र विरोधी है. चुनाव ना होना इस बात को साबित करता है.

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