बाबा साहेब आंबेडकर द्वारा 25 नवम्बर 1949 को संविधान सभा का काम पूरा होने पर दिये गये भाषण का अंश

Publisher NEWSWING DatePublished Sat, 04/14/2018 - 12:48

Faisal Anurag

"...भारतीय समाज में जो दो बातें नहीं हैं उनमें से एक है - बराबरी या समानता. भारतीय समाज गैर बराबरी या असमानता के सिद्धांत पर आधारित है. हमारे समाज में कुछ लोगों के पास अकूत संपत्ति है जबकि कई बहुत गरीबी में रहते हैं.

26 जनवरी, 1950 को हम विरोधाभास में जीना शुरू करने जा रहे हैं. राजनीति में सबको समानता या बराबरी का दर्जा मिलेगा, लेकिन सामाजिक और आर्थिक असमानता या गैर बराबरी बनी रहेगी. राजनीति में हम हर व्यक्ति को एक वोट देने का अधिकार देने जा रहे हैं, इस वोट की कीमत एक बराबर होगी. सामाजिक और आर्थिक जीवन में हरेक आदमी को ऐसी बराबरी का बर्ताव नहीं मिलने वाला है. इसका कारण है हमारे समाज का ढांचा और हमारा आर्थिक ढांचा.

हम विरोधाभास की ये जिंदगी कब तक जी पाएंगे? हम कब तक अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में सबको बराबरी का हक देने से मुंह मोड़ते रहेंगे? अगर हम लंबे समय तक सामाजिक और आर्थिक समानता से मुंह मोड़ते रहेंगे तो हम राजनीतिक लोकतंत्र को मुश्किल में डाल देंगे. जो असमानता का शिकार हो रहे हैं, वे राजनीतिक लोकतंत्र के ढांचे को उलट देंगे."  सामाजिक और आर्थिक गैर बराबरी भारत में लगातार बढ़ती जा रही है. लोकतंत्र को चुनाव तक सीमित कर देने की सत्ता वर्ग की साज़िश ने समानता के विमर्श को कमजोर किया है. बाबा साहेब कहते थे, लोकतंत्र सिर्फ एक शासन पद्धति नहीं है यह सामूहिकता का साझा एहसास है. लोकतंत्र का अलगाव या अलग-थलग रहने के विचार से कोई मेल नहीं है जिसमें कुछ लोग विशेषाधिकार से लैस हों और शेष लोग अधिकारों से वंचित हों. बाबासाहेब की 127 जयंती  के दिन हमें जाति राष्ट्र और स्त्री मुक्ति के संदर्भ को गहराई से विश्लेषित करने की जरूरत है. बाबासाहेब के राजनीतिक अपहरण करने की साजिश उनके विचारों को नष्ट करने का षड्यंत्र भी कर रही है. समानता ,जाति उन्मूलन,साम्प्रदायिक सद्भाव और संपत्ति से सामान वितरण के सवाल गायब किये जा रहे हैं. लेकिन बाबा साहेब के विचारों की ऊर्जा उन्हें प्रासांगिक बनाती है और भारत में बदलाव की राजनीति को प्रेरित करती है. वंचित समुदायों की वास्तविक मुक्ति जो  वर्गीय और वर्णीय संघर्ष की नई राह बनाती है. आज जब फर्जी राष्ट्रवाद भारतीय जनगण के संघर्षों को कमजोर करने के लिए साम्प्रदायिक उन्माद पैदा कर रहा है. साथ ही क्रोनी पूंजीवाद नग्न हो वंचितों मेहनतकशों के अधिकारों को छीन रहा है. शासक समूह उसके साथ खड़ा है.

दुनिया में जब ग्लोबलाइजेशन दम तोड रहा है, भारत के शासक नव साम्राज्यवादी ताकतों के आगे घुटने टेक रहे हैं, इस हालत में बाबासाहेब के विचार और भी प्रासांगिक हो जाते हैं. बाबा साहेब यथास्थिति के समर्थक नहीं थे. वे सामाजिक आर्थिक बदलाव के सूत्रधारों में एक थे. जनतंत्र को वे व्यापक वंचित समूहों की राजनीतिक ताकत बनाना चाहते थे और आर्थिक सामाजिक समानता लाना चाहते थे. इसीलिए वे कहते हैं "अगर हिंदू राष्ट्र बन जाता है तो बेशक इस देश के लिए एक भारी खतरा उत्पन्न हो जाएगा. हिंदू कुछ भी कहें, पर हिंदुत्व स्वतंत्रता, बराबरी और भाईचारे के लिए एक खतरा है. इस आधार पर लोकतंत्र के अनुपयुक्त है. हिंदू राज को हर क़ीमत पर रोका जाना चाहिए."

"If Hindu Raj does become a fact, it will, no doubt be the greatest calamity for this country. No matter what the Hindus say, Hinduism is a menace to liberty, equality and fraternity. It is incompatible with democracy. Hindu raj must be prevented at any cost."

--Dr. B.R. Ambedkar wrote in Annihilation of caste in 1937 . आज अम्बेडकर के विचारों को दफन करने की शासकीय कोशिश गैर बराबरी को बनाये रखने के लिए है, जो लोकतंत्र के लिए ही खतरा है. बराबरी और भागीदारी आज के संदर्भ में बड़ा सवाल है. भागीदारी को प्रतीकात्मक ना बनाकर स्वायत्तता से लैस करना होगा और इसके लिए वर्ग और वर्ण संदर्भ में व्यापक जनांदोलन की जरूरत है. बाबा साहेब ने गावसत्ता के सामन्ती ढांचे को नष्ट करने का आह्वान किया था. वे इसके लिए व्यापक वैज्ञानिक चेतना के निर्माण के पक्षधर थे. जबकि आज इस वैज्ञानिक चेतना पर पुरातन पंथ हमला कर रहा है और इस हमले से गावसत्ता के सामन्ती तत्व हावी हो रहे हैं. यही ताकतें अम्बेडकर के अपहरण में भी लगी हुई हैं. सवाल है कि क्या अम्बेडकर के विचार नष्ट किये जा सकते हैं जो की पुरातनवादियों का मकसद है. वंचित समूह यह होने नहीं देगा क्योंकि सदियों से की गई अवहेलना के खिलाफ वे जाग गए हैं और शोषण और वर्चस्ववाद के खिलाफ वे संघर्ष कर रहे हैं. यही उम्मीद का मशाल है जो बाबा साहेब को जीवंत बनाये हुए है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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