झारखंड राज्य में अल्पसंख्यक विकास राम भरोसे: चार वर्ष से वक्फ बोर्ड बिना अध्यक्ष, हज कमेटी का 06 माह बाद भी पुनर्गठन नहींं

Publisher NEWSWING DatePublished Tue, 05/08/2018 - 10:29

Md. Asghar Khan

Ranchi:  मुख्यमंत्री रघुवर दास ने 20 अगस्त 2016 को रांची के प्रोजक्ट भवन में राज्य के विभिन्न मुस्लिम संगठनों के प्रतिनिधि के साथ कार्यक्रम कर उनकी समस्याओं को हल और उनके विकास को लेकर आश्वस्त किया था. तब दूसरे दिन अखबारों की सुर्खियां देख मुसलमानों के बीच ‘सबका साथ, सबका विकास’ जैसे नारे की चर्चा और रघुवर दास की सराहाना हुई थी. तब सीएम से कई तंजीमों के सदर ने झारखंड में अल्पसंख्यकों से संबंधित बोर्ड, समिति के गठन और संचालित संस्थाओं को सशक्त करने की आग्रह कर ज्ञापन भी सौंपा था. लेकिन बीते 18 महीनों में तस्वीर बदलने के बजाय और बिगड़ी है.

विकास पर एक नजर

पिछले छह माह से स्टेट हज कमेटी का पुर्नगठन नहीं हुआ. बीते चार साल से वक्फ बोर्ड का अध्यक्ष नहीं चुना गया है. ये संवैधानिक बोर्ड और समिति सीधे मुसलमानों से जुड़ी है और इनके ठप रहने से कई काम बाधित हो रहे हैं. वहीं झारखंड अल्पसंख्यक वित्त एवं विकास निगम, राज्य में एक रुपये की भी राशि सिर्फ इसलिए नहीं ला पाया, क्योंकि एनएमडीएफसी के मांगने के बावजूद भी सीएम ने आज तक गारंटी लेटर नहीं दिया. नतीजा अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए मिलने वाली अनुमानित 800 करोड़ रुपये की राशि लैप्स कर गई. इसके अलावा भी अल्पसंख्यकों से संबंधित राज्य की कमोबेश सभी बोर्ड और कमेटी का भी यही हाल है. अल्पसंख्यक मामलों के जानकार एस अली कहते हैंः “झारखंड गठन के बाद से लगातार हो रही मांग के बावजूद मदरसा बोर्ड, उर्दू एकेडमी और अल्पसंख्यक निदेशालय का गठन बिहार पुनर्गठन अधिनियम 2000 के तहत सरकार को किया जाना था, जो कि आजतक नहीं हुआ है. जिसका हुआ है, उसके पुर्नगठन में चार-चार साल का विलंब होता आया है. जबकि नियमानुसार किसी भी संवैधानिक बोर्ड या कमेटी का कार्यकाल समाप्त होने से पहले ही उसके पुनर्गठन को लेकर प्रक्रिया शुरु कर देने का प्रावधान है. इसी के कारण अल्पसंख्यकों का विकास नहीं हो पाता है.”

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एस अली इसके लिए राज्य सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए कहते हैं कि इस बात की चिंता सरकार को भी नहीं है. ऐसा मालूम होता है कि "सबका साथ, सबका विकास" का नारा महज दिखावा मात्र है. राज्य के अल्पसंख्यक समुदाय को 18 सालों में विकास के नाम पर आश्वासन और भरोसा मिला. यहां अल्पसंख्यक विकास राम भरोसे है.

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मांगों को लेकर राज्यपाल के समक्ष प्रदर्शन करते मुसलिम समुदाय के लोग.

फाइल अप्रूवल के लिए सीएम के यहां फंसी

झारखंड में स्टेट हज कमेटी के पुर्नगठन को लेकर सभी सरकारों का रवैया सुस्त रहा है. इस कमेटी का कार्यकाल तीन साल का होता है. तीन जूलाई 2001 को झारखंड स्टेट हज कमेटी का गठन हुआ, जिसका अध्यक्ष कोई मुस्लिम न होकर राज्य के तत्कालिन मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा बने. चार साल के विलंब के बाद 2008 में इसका पुनर्गठन होता है, जिसके अध्यक्ष पूर्व अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री हाजी हुसैन अंसारी बनते हैं. 2011 में इसका फिर पुनर्गठन होना चाहिए था, परंतु 2014 तक हाजी हुसैन अंसारी के अध्यक्ष बने रहें. लगभग एक साल के विलंब के बाद अक्टूबर 2015 में कमेटी का फिर से पुनर्गठन होता है, जिसके अध्यक्ष हाजी मंजूर अहमद अंसारी चुने जाते हैं. फिलहाल पिछले छह माह कमेटी का पुनर्गठन नहीं हुआ और तीन माह पहले ही कमेटी के सीईओ सेवानिवृत हो गए हैं. सुत्रों की माने तो चार माह पूर्व ही अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय ने सीएम के पास कमेटी के गठन की फाइल अप्रूवल के लिए भेज दी है, जो अभीतक सीएम के पास ही फंसी हुई है.

राज्य में सिस्टम नहींः रुमी

एक अगस्त से झारखंड में हज यात्रा शुरु होने वाली है और कमेटी का गठन नहीं हो पाने के कारण कई काम पेंडिंग पड़े हैं. मरहबा ह्युमन सोसाइटी के महासचिव व हज सेवक नेहाल अहमद ने बताया कि आजमीनों को यात्रा के लिए दूसरी किस्त की राशि भरने में काफी परेशानी हो रही है. उनकी ट्रेनिंग भी समय पर नहीं हो पा रही है. वहीं झारखंड हाजी कमेटी के पूर्व सदस्य व प्रवक्ता खुर्शीद हसन रुमी कहते हैं कि राज्य में ना ही कमेटी है और न उसका सीईओ. ऐसा सिर्फ झारखंड में ही मुमकिन है, क्योंकि यहां सिस्टम काम ही नहीं कर रहा है.

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करोड़ों की संपत्ति पर अवैध कब्जा

झारखंड सुन्नी वक्फ बोर्ड भी विलंब और सरकार की उदासीनता का शिकार होता आया है. 2008 में बोर्ड का गठन हुआ, जिसका पुनर्गठन पांच साल पर किया जाना था. लेकिन डेढ़ साल के विलंब के बाद 2014 के अंत में बोर्ड का पुनर्गठन होता है, जिसका बीते चार के बाद के भी अध्यक्ष नहीं चुना जा सका है. एस अली कहते हैं, अध्यक्ष नहीं चुने जाने के कारण बोर्ड नियामित ढंग से काम नहीं कर पा रहा है. राज्य में वक्फ की करोड़ों रुपये की संपत्ति अवैध कब्जे में है. इसे मुक्त कराने और अध्यक्ष चुने जाने को लेकर सीएम और विभागीय मंत्री को पत्राचार भी कर चुका हूं. इधर कई वर्षों के बाद भी वक्फ बोर्ड और हज कमेटी को आज तक स्थाई कार्यलय नहीं आवंटित हो पाया है. दोनों ही दो-दो कमरे और दो-दो कर्मचारी के भरोसे चल रहा है.

सरकार का टूल्स बनकर रह गया है आयोग

झारखंड अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष डॉ शाहिद अख्तर कहते हैं कि आयोग का काम अल्पसंख्यकों के सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक विकास करना है. उनके मसलों और मुद्दों से सरकार को अवगत कराकर उसे हल करने की अनुंशसा करनी होती है, ना कि फीता काटना. आयोग के पुनर्गठन में होने वाले विलंब पर शाहिद अख्तर कहते हैं कि ये एक ट्रेंड होता जा रहा है, जिससे संस्था के प्रति सरकार की असंवेदनशीलता का पता चलता है. वह कहते हैं कि आयोग के सक्रिय नहीं रहने पर अल्पसंख्यक समुदाय और सरकार के बीच समान्य नहीं बन पाता है, जिससे अल्पसंख्यक समुदाय तक कई कल्याणकारी योजना नहीं पहुंच पाती है. सरकार आयोग का इस्तेमाल अपने राजनीतिक टूल्स की तरह करती आई है. उन्होंने कहा कि मैंने अपने कार्यकाल से अल्पसंख्यकों के उत्थान के लिए कई अनुशंसा की, जिसे आजतक सरकार ने अमली जमा नहीं पहनाया.

हर बार आयोग का विलंब से हुआ पुनर्गठन

झारखंड अल्पसंख्यक आयोग का गठन तीन नवंबर 2002 में हुआ, जिसके अध्यक्ष कमाल खान बने. इसका कार्यकाल तीन साल का होता है. दूसरा टर्म समय से शुरु हुआ और 30 नवंबर 2004 आयोग का पुनर्गठन हुआ. जिसके अध्यक्ष निर्मल चटर्जी चुने गए. लेकिन फिर आयोग के पुनर्गठन के साथ विलंब चस्पा हो गया. 14 महीने के विलंब के बाद आयोग का तीसरा कार्यकाल 24 फरवरी 2009 से शुरु हुआ और अध्यक्ष गुलफाम मोजीबी बने. फिर इसके पुनर्गठन में एक साल होता है और 09 जनवरी 2013 को चौथे कार्यकाल के अध्यक्ष डॉ शाहिद अख्तर बनते हैं. आयोग का पांचवां कार्यकाल और चौथी बार पुर्गठन भी 14 विलंब से ही हुआ. और इसके अध्यक्ष एक बार फिर से कमाल खान बनाए गए.

समस्या ध्यान में है: मंत्री

स्टेट हज कमेटी के पुनर्गठन में हो रहे विलंब पर अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री लूईस मरांडी ने न्यूज विंग से बातचीत को क्रम में बताया कि कमेटी के पुनर्गठन का काम अंतिम पड़ाव में है, जो जल्द ही पूरा हो जायेगा. जबकि अन्य समस्याओं के प्रश्न पर वह कहती हैं कि सब ध्यान में हैं. उन्होंने कहा कि सरकार सबका साथ, सबका विकास के एजेंडे पर काम कर रही है, और इसका प्रमाण राज्य में बन रहा बहुमंजिला भवन है. वहीं कांग्रेस विधायक आलमगीर आलम सरकार पर आरोप लगाते हुए कहते हैं कि राज्य भाजपा सरकार अल्पसंख्यकों से जुड़े सभी बोर्ड और कमेटी को खत्म कर देना चाहती है. सरकार का विकास का नारा झूठा है.

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