गांव स्वशासन की प्रक्रिया से छेड़छाड़ खतरनाक

Publisher NEWSWING DatePublished Thu, 06/07/2018 - 14:24

Faisal Anurag

स्वशासन झारखंडियों की न केवल आकांक्षा है, बल्कि राजनीतिक चेतना भी. इस राजनीतिक अवधारणा ने लंबे समय से झारखंड में अनेक आंदोलनों और वैचारिक संघर्ष को जन्म दिया है. झारखंडी जनसमाज की मान्यता है कि ग्राम सभाएं जितनी मजबूत होंगी, झारखंडी राजनीति का चेहरा और तरीका भी उतना ही प्रभावी तरीके से बदलेगा. कानूनी संघर्षों के अनेक उतार-चढ़ाव के बाद झारखंड ने पंचायती राज और पेसा के बीच गराव स्वशासन का समन्वय स्वीकार किया था. ग्राम स्वशासन के बीच विमर्ष जनतंत्र की असली ताकत ही असहमति और विभिन्न तरह के विचारों के बीच समन्वय स्थापित करना है. यह तथ्य है कि पंचायतराज की भूमिका और उसकी भागीदारी को लेकर झारखंड में आम राय नहीं है. एक ओर जहां अनुसूचित क्षेत्रों के मूलवासी भागीदारी के नजरिए से अपने को ठगा हुआ महसूस करते रहे हैं, वहीं दूसरी ओर आदिवासियों के एक तबके को भी लग रहा है कि जिन सामाजिक संस्थाओं ने लोकतंत्र के देशज रूपों को विकसित किया है, उसका इस प्रणाली में समावेश नहीं किया गया है. इन दो रूझानों को ध्यान में रखने के बाद भी यह कहा जा सकता है कि झारखंड में यदि समावेशी उन्नति को जमीन तक पहुंचाना है और आर्थिक प्रगति का दरवाजा पूरी तरह खोलना है और साथ ही विकास के विस्थापनकारी स्वरूप को भी बदल कर झारखंडी समुन्नति की राह पकड़नी है तो उसमें लोगों के हाथ में वास्तविक निर्णय की व्यक्ति जरूरी है. इस नजरिए से संवादहीनता को खत्म करते हुए पंचायतराज को व्यापक संदर्भ में देखने-परखने की जरूरत है. राज्य सरकार ने जिस तरह पंचयातों को कमजोर करने के लिए ग्राम विकास समितियों की स्थापना कर रही है, उससे सामाजिक टकराव बढ़ने और पत्थलगड़ी जैसे आंदोलनों के मुखर होने की संभावना बढ़ गयी है.

भारतीय संविधान ने आदिवासी इलाकों के लिए विशेष प्रावधान किए हैं. यानी इस तथ्य को स्वीकार किया गया है कि आदिवासी इलाकों की राजनीतिक,सामाजिक और भौगोलिक बनावट अलग तरह की है और इसके लिए इन इलाकों में खास तरह के हस्तक्षेप की जरूरत है. यह विशिष्टता क्या है. संविधान सभा की बहसों में इस पर काफी चर्चा हो चुकी है. इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि संविधान की पांचवीं ओर छठी अनुसूची बनाते समय इस तथ्य को ध्यान में रखा गया था कि आदिवासी समाजों के साथ रहने चाले अन्य समुदायों राजनीतिक हित प्रभावित नहीं हो. लेकिन इस तथ्य को स्वीकार कर ही आगे बढ़ा जा सकता है कि आदिवासी इलाकों की आकांक्षाएं प्राकृतिक संसाधनों के साथ उनके विशिष्ट नजरिए से निर्धारित होता है. लेकिन इसमें उन समुदायों के राजनीतिक अधिकारों तथा प्रतिनिधित्व में भागदारी के रास्ते बंद नहीं होते जो आदिवासी समाजों के साथ रहते हुए भी अपनी अलग पहचान रखते हैं. भूरिया कमेटी की बहसों में इस पर भारी विवाद हुआ है. पंचायत उपबंध-अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार- अधिनियम 1996 को लेकर जिस तरह के सामाजिक तनाव का माहौन बनाया गया है, वास्तव में इस कानून की अधूरी समझ का ही परिचायक है.

आखिर गांव की सत्ता का अर्थ क्या है? क्या यह केवल कागजी बात है, या इसके जनतांत्रिक विमर्ष के व्यापक आधार और बहस का संदर्भ भी है. वंचित और उत्पीड़ित जनसमाजों के हाथ में सत्ता जाने से आखिर किसे परेशानी होती है और यदि पंचायत कानून इन वंचितों के लिए इंसाफ की राह बनाता है तो इससे परेशान होने के बजाय इसमें छूट गए जनसमुदायों को भी अधिकार के साथ प्रतिनिधित्व देने के लिए नए रस्ते की तलाश की जरूरत है. इस तथ्य को स्वीकार कर ही इस बहस को आगे बढ़ाया जा सकता है. क्योंकि पंचायतराज न केवल झारखंड का राजनीतिक चेहरा बदल सकता है बल्कि समुन्नति की राह में छलांग भी लगा सकता है. कई जानकार मानते हैं कि ग्रामसभाओं की सश्क्ति का अर्थ है एक नई राजनीतिक परिघटना में प्रवेश. यदि इतिहास से तुलना कर देखा जाए तो  भी इस तथ्य की पुष्टि होती है कि झारखंड के आदिवासियों और मूलवासियों ने साथ रहने और अधिकारों के शांतिपूर्ण भागीदारी का तरीका हमेशा से ही अपनाया है. हो सकता है कि इसकी दिशा में झारखंड की राजनीति दलों को जिस तरह की भूमिका निभाने की जरूरत थी, उसमें चूक हुई हो लेकिन यह एक बड़ा अवसर है, जिसमें संभावनाए अंतरनिहित है. इसलिए किसी भी तरह के अतिवाद से बचने हुए सत्ता के विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया को तेज करने की जरूरत है. इससे न केवल विकास का अर्थ ही बदलेगा, बल्कि झारखंड के लोग जिस तरह के विकास या उन्नति का सपना देखते हैं, उसे जमीन पर उतारने का मौका भी मिलेगा. यह तभी संभव है जब सामुदायिकता और सहिया की झारखंडी विरासत में किसी भी तरह का खरोच न पहुंचाया जाए. साथ ही झारखंड की सामाजिक संरचना तथा उसके सांस्कृतिक इतिहास को भी ध्यान में रखा जाए. झारखंड का सांस्कृतिक और आर्थिक इतिहास कई अर्थों में एक साथ कई अवधारणाओं का संपुजन है. इस प्रयोग से जनतंत्र में वास्तव में जन की सत्ता को मजबूत किया जा सकता है और साथ जल,जंगल, जमीन पर झारखंडियों के हक की स्थापना तथा इस संदर्भ में न्यायपूर्ण वितरण और संवर्द्धन से पूरे देश को दिशा दी जा सकती है.

1996 से 2000 का जमान याद कीजिए. यह वह दौर था जब आबुआ हातू आबुआ राज का के नारे से न केवल पूरा झारखंड आंदोलित था, बल्कि हजारों गांवों में पत्थलगड़ी की गयी और इस घोषणा में आस्था प्रकट किया गया कि अब एक नया जमाना जा रहा है, जिसमें वंचितजन अपने हक की न केवल हिफाजत करेंगे, बल्कि झारखंडी सामाजिक ढांचे को और मजबूती मिलेगी. यह आंदोलन झारखंड आंदोलन की तरह ही व्यापक फलक लिए हुए था और इसमें झारखंड के सभी जनसमुदायों की भागीदारी थी. जिन गांवों में स्वषासी प्रणाली कमजोर पड़ गयी थी वहां स्वत: स्फूर्त ग्रामसभाओं का गठन कर लिया गया और संसाधनों पर हक के बारे में गांव में समझ का विस्तार हुआ. अनेक विचारक मानते हैं कि इतिहास में जनपहल के ऐसे दौर कम ही आते हैं. लेकिन तब भी कई हलकों में इस जनआभार को लेकर चिंता की रेखाएं दिखती थी. यहां इस सवाल की प्रासंगिता है कि झारखंड के लोगों ने हजारों सालों से आपसी संवाद से ही सामाजिक विवाद को हल किया है तो आज किन कारणों से ऐसा संभव नहीं हो रहा है. देश के 9 राज्य पांचवीं अनुसूची में शामिल है और झारखंड को छोड़कर बाकी आठ राज्य पेसा के तहत पंचायतराज के सहारे आगे बढ़ रहे हैं. झारखंड में विवाद वास्तव में जितना कानूनी नहीं है उतना वह वर्चस्व का है. झारखंड में ऐसे वर्चस्व के लिए इतिहास में उदाहरण नहीं मिलते हैं. फिलवक्त पंचायतों को गांवों की तस्वीर बदलने के केंद्र में में बदलने की जरूरत है और साथ ही इस बात की भी सामाजिक तौर पर सहमति का रास्ता बनाया जाए.

झारखंड के क्रांतिकारियों ने एक ऐसे स्वशासी समाज का सपना देखा था, जिसमें राजनीतिक एवं आर्थिक शोषण के लिए स्थान नहीं होना था, क्योंकि झारखंड का देशज बोध और सामुदायिक जनतंत्र का बुनियादी आधार ही समानता और पोषणविहीनता है. झारखंडी विद्रोहों की परंपरा का सारतत्व उसकी साम्राज्यवाद विरोधी धारा इस चेतना के विपरीत आचरण का है. एक ओर जंगल-जमीन  पर जनाधिकार की बात की जाती है तो दूसरी ओर विश्व बैंक तथा बहुराष्ट्रीय निगमों के लिए परिप्रेक्ष्य भी तैयार किया जाता है. समाजीकरण झारखंड का एक अन्य तत्व है, जिसे आज का नेतृत्व समझने से ही इंकार करता है. समाजवादी मूलक झारखंडी समाज पर 1760 के बाद से ही सामंतवाद थोपा गया और इस कारण अभिजनों का एक तबका अस्तिव में आया. ये अभिजन आज इतिहास चेतना की स्वशासी आकांक्षा की वास्तविकता पृष्ठभूमि के बारे में जानकारी तक नहीं रखते बल्कि इसके विरोध में खड़े हैं.

पेसा के तहत अनेक विशेषाधिकार गांवों को संविधान दे रहा है. साथ ही झारखंड के लोगों को मानसिक तौर पर इस बात के लिए भी तैयार होने की जरूरत है कि जमाना बदल रहा है. झारखंड की ग्रामीण अर्थ व्यवस्था को विरासत के मूल्यों के आधार पर गति देना है तथा उसमें विकास भी करना है. इस का अर्थ है किस प्राकृतिक संसाधनों पर झारखंडियों के निर्णायक हक के साथ तकनीक की दुनिया में प्रवेश करना है और तकनीक को झारखंडी मूल्यों के अनुरूप् अपनाने की जरूरत है. देश के अनेक राज्यों ने पंचायती कानून के सहारे ही ग्रामीण विकास में लोगों की भागीदारी और आकांक्षा के लिए स्थान बना लिया है. केरल में जिस तरह गांव से योजना निर्माण की प्रक्रिया अपनायी गयी है, उससे केरल में जनतंत्र के प्रति लोगों में न केवल विश्वास गहराया है बल्कि उन्हें लगता है कि समुन्नति का इतिहास लिखने में उनकी भी भूमिका है. इसी तरह पश्चिम बंगाल में भी पंचायतों ने राजनीतिक तौर पर गांवों की दशा और नेतृत्व में व्यापक बदलाव का मार्ग बनाया है.

पेसा के बारे में ज्यादा समझ बनाने की जरूरत है. उसे अतिवादी नजरिए से खारिज कर हम झारखंड में जनतंत्र में वास्तविक जन की ताकत का ही निशेध करेंगे. पेसा झारखंड के ग्रामीण संरचना,उसके रीतिरिवाज और सांस्कृतिक पहचान को बचाए रखने की गारंटी करता है. जब संविधान सभा में बोलते हुए मरांग गामके जयपाल सिंह ने कहा था कि लोकतंत्र झारखंडी जनगण की आत्मा और रक्तप्रवाह है, जिसके बिना झारखंड के होने का मतलब नहीं है. उन्होंने यह भी कहा था कि झारखंड के लोग सदियों से निर्णय लेने ओर जीने के जनतांत्रिकता के साथ ही जीवंत जनसमाज हैं. इसे बार-बार  प्रमाणित भी किया गया है. वक्त आ गया है कि भावी इतिहास बनाया जाए और गांव स्वशासन की मंजिल हासिल की जाए.

राज्य सरकार को पेसा और पंचायत के बीच के टकराव को दमर करने की दिशा में ठोस कार्ययोजना बनाना चाहिए और इन संस्थाओं को कमजोर करने का प्रयास नहीं करना चाहिए.

(लेखक न्यूज विंग के वरिष्ठ संपादक हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)

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