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मैथिली अति प्राचीन व समृद्ध भाषा है, इस स्थापित सत्य को अब तर्क नहीं लट्ठ से समझाने का है समय

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खट्टरकाका की चिट्ठी वीरेंद्र झा के नाम

मैथिली अति प्राचीन व समृद्ध भाषा है. इस स्थापित सत्य को अब तर्क नहीं लट्ठ से समझाने का समय आ गया है क्योंकि जो मैथिली को हिंदी की बोली कह प्रचारित कर रहे हैं वो अज्ञानी नहीं बल्कि शातिर है. दैनिक जागरण को अपने किये पर कोई अफसोस नहीं है और एक के बाद एक बौद्धिक अपराध किये जा रहा है. शायद अखबार को स्वयं के सर्वशक्तिमान होने का वहम हो चला है.

इस अखबार ने अपने प्रस्तावित हिंदी भाषा कार्यक्रम में पहले मैथिली को हिंदी की बोली कह कर शामिल किया. फिर विरोध के बाद मैथिली को हटा लिया और आज फिर आमंत्रण पत्र में अखबार ने मैथिली को बोली की श्रेणी में दिखाया और एक वक्ता भी खोज लिया है. इस दौरान दैनिक जागरण अखबार प्रबंधन ने कई बार खुदका थूका चाटा है.

नए वक्ता हैं प्रोफेसर वीरेंद्र झा, पटना विश्वविद्यालय के मैथिली विभाग के हेड. और जब आज एकाध को छोड़कर मैथिली का शेष साहित्यिक समाज दैनिक जागरण के इस कुकृत्य पर चुप है और कुछ साहित्यकार मैथिली भाषा के मान- सम्मान की कीमत पर दैनिक जागरण के इस साहित्यिक सर्कस में रिंग डांस करने के लिए मरे जा रहे हैं; तो आज मैथिली में इनके योगदान के बारे में जानना जरूरी है.

बीरेंद्र झा पटना विश्वविद्यालय में शिक्षक हैं क्योंकि पटना विश्वविद्यालय में मैथिली की पढ़ाई होती है. पटना विश्वविद्यालय में मैथिली की पढ़ाई इसलिए होती है क्योंकि बाबू भोलालाल दास ने भारी विरोध और दुरभसंधि के बावजूद अपने दम पर मैथिली को पटना विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल करबाया था.सन 2003 में जब मैथिली के संविधान के आठवें अनुसूची में शामिल करवाने का अभियान चल रहा था. भारत सरकार को सौंपे जाने वाले मेमोरेंडम लिखने और दस्तावेज जुटाने की तैयारी चल रही थी.

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मेमोरेंडम में मैथिली का इतिहास बताना था, जिसमें पटना विश्वविद्यालय में मैथिली का शामिल होना एक अहम बिंदु था. पटना विश्वविद्यालय के मैथिली विभाग में पटना विश्वविद्यालय के उस सीनेट की बैठक और संबंधित दस्तावेजों की कॉपी थी जिसके आधार पर मैथिली की पढ़ाई शुरू हुई थी.विद्यापति सेवा संस्थान के महासचिव वैद्यनाथ चौधरी बैजू को इन दस्तावेजों को प्राप्त करने के लिए श्री वीरेंद्र झा साहब के पास भेजा गया.

किसी मैथिली प्रेमी और शिक्षक के लिए इससे बड़ी खुशी की बात और क्या हो सकती है कि उसकी भाषा संविधान के आठवीं अनुसूची में शामिल हो रही है.लेकिन प्रोफेसर वीरेंद्र झा एकाएक भड़क गये, उन्होंने बैद्यनाथ चौधरी को डांटते हुए कहा कि आप फालतू के अभियान में मुझे घसीट रहे हैं, मैं प्रोफेसर हूं मुझे आंदोलन से क्या लेना देना. आपकी हिम्मत कैसे हुई कि आप मेरे पास दस्तावेज लेने के लिए आ गए.या कहानी सविस्तार आपको बैजूजी बताएंगे कैसे उन्हें प्रोफेसर वीरेंद्र झा ने बेइज्जत कर भगा दिया था.मैथिली भाषा को बेइज्जत करने के लिए प्रोफेसर वीरेंद्र झा एक बार फिर से तैयार हैं. अखबार के किसी कोने में नाम छप जाए थोड़ा पैसा मिल जाए इसके लिए यह लोग किसी भी स्तर पर जा सकते हैं.

बात बाकी दैनिक जागरण अखबार के प्रबंधन और संपादक अनंतविजय मैं मगध और हिंदी वालों के इशारे पर मैथिली के साथ जो षड्यंत्र करना शुरू किया है, वह दुश्मनी हम मैथिल बेहतर निभाएंगे.

वीरेंद्र झा जैसे लोगों की आरती जरूर उतारी जाएगी

(विजय देव झा के फेसबुक वॉल से साभार)

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