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गर्मियों में नवजात शिशु का रखें खास ख्याल : डॉ शैलेश चंद्र 

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Ranchi : रानी चिल्ड्रेन हॉस्पिटल के शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ शैलेश चंद्र पिछले 14 साल से इस अस्पताल में अपना योगदान दे रहे हैं. इन्होंने एमबीबीएस की पढ़ाई 1999 में रांची के आरएमसीएच से पूरा किया. मास्टर इन पीडियाट्रिक की पढ़ाई 2003 में लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी से किया. अपने कार्यकाल के दौरान शिशु रोग से संबंधित कई बच्चों का ईलाज किया है. डॉ शैलेश चंद्र से बात किया हमारे संवाददाता सौरभ शुक्ला ने. पेश है बातचीत के मुख्य अंश.

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 सवाल: गर्मी के मौसम में बच्चों में किस तरह की बीमारी का खतरा रहता है. 

 जवाब: बच्चों की उम्र 0 साल से लेकर 15 साल तक होती है. उम्र के अनुसार बीमारियां भी बच्चों में अलग-अलग तरह के होते हैं. नवजात बच्चों को अलग प्रकार की बीमारी होती है. जबकि एक माह से चार साल के बच्चों में होने वाली बीमारियों की श्रेणी भी भिन्न है. नवजात बच्चे नाजुक होते हैं. उनपर खास ध्यान देने की जरूरत होती है. गर्मी में बच्चों को इंफेक्शन होने का डर होता है. पीलिया और गर्मी ज्यादा होने की वजह से बुखार होने का खतरा भी रहता है. ऐसे में नवजात बच्चों को रखने वाले कमरे को हल्का गर्म रखने की आवश्यकता होती है. साथ ही मां का दूध बच्चों के लिए पौष्टिक होता  है तो कोशिश यही होनी चाहिये कि नवजात को मां का दूध ही सेवन करवाया जाये. वहीं इस गर्मी में बड़े बच्चों में उल्टी, खांसी, दस्त की शिकायत अधिक रहती है. बच्चों को लू लगने का खतरा रहता है. ऐसी बीमारी से ग्रसित बच्चों की संख्या अस्पताल में ज्यादा है.

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सवाल: गर्मी के मौसम में होने वाली अधिकांश बीमारियां कौन सी हैं.

जवाब: गर्मी में लू लगने का खतरा ज्यादा होता है. सर्दी, खांसी, उल्टी और दस्त का खतरा भी होता है. ऐसी बीमारी प्राय: हर समय होता है. लेकिन गर्मी में सबसे अधिक खतरा लू का होता है. बच्चों को तेज बुखार, सुस्ती, खाना छोड़ देना और कमजोरी की शिकायत भी होती है. शादी-विवाह में बच्चे ज्यादा खा लेते हैं. इससे बीमारी बढ़ने की आशंका होती है.

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 सवाल: बतौर चिकित्सक आपके द्वारा किया गया कोयी ऐसा कार्य जो आपके जेहन में हमेशा रहता हो. 

जवाब: एक पांच दिन का नवजात जो बीमार था और उसका वजन भी काफी कम था. उसे सही समय पर उचित इलाज हमलोगों ने दिया और उसके जीलन को बचाया. जो मेरे लिये एक अबतक की बड़ी उपलब्धि और कभी ना भूलने वाला वाक्या था.

सवाल: मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक गैजेट से बच्चों पर क्या प्रभाव पड़ता है.

जवाब: इसे हमलोग स्क्रीन टाइम कहते हैं. मोबाइल, टीवी, वीडियो गेम का इस्तेमाल बच्चों के सीमित समय के लिए करना चाहिए. सप्ताह में दो घंटे से भी कम वक्त तक ऐसे उपकरणों का प्रयोग करना चाहिए. दो घंटा से अधिक इस्तेमाल करने पर आँख से संबंधित बिमारी, दिमाग में तनाव और भावनात्मक बदलाव होते हैं. इसके साथ पढ़ाई के प्रति भी बच्चों में अरुचि हो जाती है. ऐसी समस्या किसी दवा से ठीक नहीं होती बल्कि बच्चों के व्यवहार को बदलने से ठीक होता है.

सवाल: समाज के लोगों को क्या संदेश देना चाहेंगे.

जवाब: सभी माता-पिता से अनुरोध है कि अपने बच्चों पर विशेष ध्यान दें. उनके पालन से लेकर खान-पान भी सही और पौष्टिक होना चाहिये. साथ ही अपने बच्चों के पढ़ाई पर भी खास ख्याल रखें और प्यार से उसमें बढ़ाई के प्रति रूचि जगायें , जिससे मोबाइल और टीवी जैसे उपकरणों से दूरी बनाये रहें और स्वस्थ रहें.

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