स्थानीय कलाकारों को सम्मान देना भी उचित नहीं समझते राज्य के मुखिया, तीन नेशनल अवार्ड के बाद भी मुख्यमंत्री की बधाई से वंचित हैं झारखंड के ये फिल्म निर्माता

Publisher NEWSWING DatePublished Sun, 04/15/2018 - 16:43

राज्य के सीएम और विभागीय मंत्री बिना लाभ के शिष्टाचार तक खर्च करना नहीं चाहते हैं : झारखंडी कलाकार

Md. Asghar Khan

Ranchi : तीस से भी अधिक फिल्म और तीन नेशनल अवार्ड के बाद भी अगर आप सुबे के मुखिया की नजर में बधाई के पात्र नहीं हैं तो सिनेमा में सियासत की बात को सिरे से खारिज नहीं कर सकते. बीते तीन दिन से फिल्म निर्माता और कथाकार मेघनाथ को देश-विदेश से बधाई तो मिल रही है, मगर प्रदेश के मुख्यमंत्री रघुवर दास की शुभकामना से वो अबतक वंचित हैं. 66 वर्षीय मेघनाथ को डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाने में महारत हासिल है. 2017 में आई इनकी फिल्म “नांची से बांची” ने काफी सुर्खियां बटोरी और कई आवर्ड अपने नाम किए. अब इस फिल्म को इस क्षेत्र के सबसे बड़े सम्मान यानी नेशनल अवार्ड से 3 मई को दिल्ली में बेस्ट बायोग्राफिकल फिल्म से राष्ट्रपति के हाथों सम्मानित किया जायेगा. इससे पहले ‘एक रोपा धान (2010) और आयरन इज हॉट’(2010) जैसी बेहतरीन डॉक्यूमेंट्री फिल्म के लिए मेघनाथ और बीजू टोप्पो को बेस्ट इन्वायरमेंटल और बेस्ट प्रमोशनल फिल्म के लिए भी नेशनल अवार्ड मिल चुका है. इतने बड़े अवार्ड मिलने के बाद भी राज्य सरकार की तरफ से कोई बधाई या सम्मानित नहीं किए जाने पर फिल्म निर्माता और साहित्यकारों कहना है कि राज्य के सीएम और विभागीय मंत्री फिजुल (बिना लाभ) में शिष्टाचार तक खर्च करना नहीं चाहते हैं.

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सरकार के दावे हाथी के दांत की तरह : मेघनाथ

फिल्म नांची से बांची की कहनी पद्मश्री डॉ रामदयाल मुंडा (1939-2011) की जीवनी पर आधारित है, जिसमें 70 के डॉ मुंडा के झारखंड से अमेरिका तक बिखरे हुए सामाजिक और संस्कृतिक कार्यों को 70 मिनट एकत्रित करने का प्रयास किया गया है. इससे पहले फिल्म निर्माता मेघनाथ ने झारखंड के आदिवासी पर संस्कृति पर द हंट, शहीद जो अंजान रहे, गाड़ी लोहरदगा मेल, विकास बंदूक के नाल पर, हमारे गांव में हमारा राज, गांव छोड़ब नहीं समेत 30 से ज्यादा फिल्म बना चुके हैं, जिसे देश-विदेश में दर्जनों पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है. मेघनाथ ने न्यूजविंग से बातचीत में बताया कि जब मुझे पहली बार 2010 में एक रोपा धान और आयरन इज हॉट के लिए नेशनल अवार्ड मिला था, तबके तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने भी बधाई या शुभकामना नहीं दी थी. नेशनल अवार्ड हासिल कर दिल्ली से वापस रांची पहुंचे मेघनाथ को तब कोई अधिकारी एयरपोर्ट लेने भी नहीं पहुंचे थे. जबकि शिष्टाचार के तहत विभागीय मंत्री या उसके अधिकारी पहुंचते हैं. राज्य के मंत्री, पूर्व मंत्री या किसी राजनीतिक दल ने भी आधिकारिक तौर पर तब से आजतक बधाई ना देकर शिष्टाचार के बधाई पर छिड़ी बहस को बल देते हैं. मेघनाथ कहते हैं कि तब और अब में बदलाव तो आया, लेकिन राज्य के कलाकारों, आदिवासी रीति-रिवाज और संस्कृति को लेकर सरकार की उदासीनता बरकाकार है. आदिवासियों के कल्याण और उत्थान के लिए किए जाने वाले सरकारी दावों पर मेघनाथ कहते हैं कि सरकार के दावे हाथी के दांत की तरह है, जो दिखाने और खाने के लिए अगल-अलग होते हैं.

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अनुपम को सम्मान, अपनों का अपमान

मेघनाथ की उपलब्धि पर सरकार की खामोशी को नेशनल अवार्ड से सम्मानित और फिल्म मेकर श्री प्रकाश क्षेत्रीय कलाकारों का अपमान का बताते हैं. प्रकाश कहते हैं कि फिल्म अभिनेता अनुपम खेर को सरकार की तरफ से कई सम्मान और फिल्म संबंधित कार्य का जिम्मा सौंपा गया है. लेकिन जिसे तीन बार नेशनल अवार्ड दिया गया उसे एक बधाई तक नहीं. ऐसा लगता है कि जो विचारधारा का थैला ढोयेगा, उसे ही पुरस्कृत किया जायेगा. साहित्यकार पंकज मित्र भी कहते हैं कि ये क्षेत्रीय कलाकारों का अपमान है. मेघनाथ जी को बधाई या उन्हें सरकार के द्वारा सम्मानित नहीं किया जाना दुखद है. झारखंड की रघुवर दास सरकार ने अनुपम खेर को 2015 में झारखंड फिल्म नीति के सलाकार समिति और 2016 में झारखंड फिल्म डेवलपमेंट कारपोरेशन का अध्यक्ष बनाया था. इसी के बाद कई बार अनुपम खेर रांची आए और झारखंड का दौरा जारी रहता है. सरकार ने उन्हें सार्वजानिक मंच और सभाओं में सम्मानित भी किया. यही वजह है कि स्थानीय फिल्म निर्माता और साहित्यकार इसे इस तौर पर देख रहे हैं. साहित्यकार देवेंद्र पाठक का कहना है कि मेघनाथ जी की फिल्म झारखंडी रहन-सहन और उसके इतिहास से अवगत कराती है. ये समझ से परे है कि इस काबलियत की समझ भारत सरकार को तो है पर राज्य सरकार की अनदेखी क्यों.

2010 में मिले नेशनल अवार्ड
2010 में मिले नेशनल अवार्ड

सिनेमा संवाद का माध्यम

जल, जंगल और जमीन के संरक्षण की बात करने वाले मेघनाथ को वामपंथी विचारधारा का बताया जाता है. 2010 में मिले नेशनल अवार्ड के समय भी झारखंड में भाजपा गठबंधन की सरकार थी और इस बार भी. ‘सरकार की तरफ से बधाई नहीं दिया जाने को क्या आप विचारधारा की लड़ाई मानते हैं’ के प्रश्न पर, मेघनाथ कहते हैं कि ऐसा नहीं है. जब मंत्री-संत्री डॉ रामदयाल मुंडा के योगदान को नजरअंदाज कर सकते हैं, तो मैं क्या हूं. सरकार गाड़ी-घोड़े वालों और कारोबारियों की है. गरीब या आदिवासी की नहीं. अगर मेरी फिल्म में सलमान या नौटंकी होती तो मुझे भी लोक लिया जाता. सरकार या मंत्री की तरफ से किसी तरह की बधाई नहीं दिए जाने का मेघनाथ को कतई अफसोस नहीं है. वो कहते हैं कि मैंने कभी भी इस बारे किसी से चर्चा नहीं की है और मुझे परवाह भी नहीं है. मेरा मानना है कि डॉक्यूमेंट्री फिल्म जनता से कम्युनिकेशन का एक रास्ता है, जिससे आप बहुत सारी अच्छी चीजे बता सकते हैं. नांची से बांची फिल्म के सहायक निदेशक रुपेश साहू कहते हैं कि सवाल सम्मान या शुभकामना देने का नहीं है, बल्कि झारखंड पर बनी फिल्म को नेशनल अवार्ड मिलना राज्य के लिए गौरव का विषय है. और इसके बावजूद भी सरकारी महकमा मौन है तो ये दूर्भाग्यपूर्ण है.

लूना लेकर गये थे मंत्री से मिलने, दो घंटे इंतजार कराकर स्टाफ ने वापस भेजा, मंत्री ने कहा लूना लेकर आये थे इसलिए नहीं मिलने दिया

अपनी बातचीत के अंत में मेघनाथ ने झारखंड के एक मंत्री से जुड़े बहुत ही रोचक वाक्य का जिक्र किया. उन्होंने नाम और वर्ष नहीं बताने की शर्त पर कहा कि झारखंड के कल्चरल मुद्दों पर कैसे काम किया जाए, इसके लिए मुझे एक मंत्री ने अपने घर बुलाया. तब मैं समय से पौन घंटा पहले ही मंत्री के आवास पर अपनी साइकिलनुमा लूना मोटरसइकिल से पहुंच गया था. मैंने वहां मौजूद स्टाफ को बताया कि मंत्री जी ने मुझे मिलने के लिए बुलाया. दो घंटे के इंतेजार के बाद कहा गया कि मंत्री जी तो चले गए. बाद में मैंने फोन लगाकर उन्हें (मंत्री) को कहा कि आपको जब मिलना नहीं था तो मुझे क्यों बुलाया था. इसपर मंत्री जी ने बहुत ही चकित मुद्रा में कहा कि आप आए कहां थे. तब मैंने उन्हें जवाब दिया कि मैं वहां समय से पहले ही पहुंच चुका था और दो घंटे के इंतजार के बाद आपके स्टाफ ने कहा कि मंत्री जी तो चले गए. मेघनाथ ने बताया कि कुछ घंटे के बाद मंत्री जी का फोन आया और उन्होंने कहा कि सॉरी बोलते हुए कहा कि आप लूना मोटरसाइकिल से आए थें न, इसलिए मेरे स्टाफ ने आपको मुझसे नहीं मिलवाया.

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