पावर प्लस मनी का खेल होता दिख रहा है झारखंड का राज्यसभा चुनाव

Publisher NEWSWING DatePublished Tue, 03/13/2018 - 11:57

Akshay Kumar Jha
Ranchi:
शोले फिल्म के गब्बर सिंह के डायलॉग की तरह हो गया है झारखंड का राज्यसभा चुनाव. “सीट दो और उम्मीदवार तीन, बहुत नाइंसाफी है ये”. किसी एक को हारना ही होगा. हार कौन से दो उम्मीदवारों में से एक की किस्मत में हो सकता है, यह किसी से छिपा नहीं है. बेशक बीजेपी राज्य में अच्छी स्थिति में है. करीब 50 वोट उनके पास है. लेकिन दो तरफा जीत के लिए यह आंकड़ा कम पड़ रहा है. ऐसे में खेल शुरू होगा साम, दाम, दंड और भेद का. हर वो तरीका जिससे जीत अपनी झोली में गिरे, ऐसे किसी भी तरीके से गुरेज करने की गुंजाइश नहीं दिख रही. लिहाजा नामंकन के बाद की रणनीति कई बंद कमरों में बननी शुरू हो गयी है. हर वो डाल हिला कर देखा जा रहा है जिससे फल गिरने की जरा सा भी उम्मीद हो. 

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आखिर क्यों बढ़ गया झारखंड राज्यसभा चुनाव का रोमांच 
झारखंड की ही तरह बिहार में भी राज्यसभा चुनाव होने हैं. झारखंड से ज्यादा छह सीटों पर वहां चुनाव होना है. लेकिन देखा जाये तो बिहार से ज्यादा झारखंड में राज्यसभा चुनाव को लेकर उठा पटक होने की संभावना है. क्योंकि यहां रणभूमि में हर बार की ही तरह इस बार भी सिर्फ राजनीति ही नहीं बल्कि पावर और मनी की भी जोर आजमाइश है. झारखंड में राज्यसभा की दो सीटें हैं, लेकिन उम्मीदवार तीन. तीन में एक सबसे गरीब यानि समीर उरांव की बात की जाये तो उनकी सीट पक्की मानी जा रही है. कांटे की लड़ाई धनकुबेरों में है. झामुमो के समर्थन और कांग्रेस के उम्मीदवार धीरज साहू की रीजनीतिक समझ-बूझ की बात करें तो, वो बीजेपी के दो नंबर के उम्मीदवार प्रदीप सोंथालिया से ज्यादा है. लेकिन दौलत, कारोबार और व्यवसाय की बात की जाये तो सोंथालिया भारी पड़ते दिखते हैं. उपर से सत्ता का साथ भी. किसी से छिपा नहीं है पिछले राज्यसभा चुनाव में सत्ता ने अपना कैसा-कैसा रंग दिखाया था. ऐसे में सीधी टक्कर में आमने-सामने यही दोनों उम्मीदवार हैं. 

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क्या होगी कांग्रेस और झामुमो की रणनीति 
शिकारी जानवर आदतन झुंड में खड़े उस शिकार को ही टारगेट करता है, जो या तो कमजोर हो या फिर बीमार. उसी तरह से इस चुनाव में भी विपक्ष के उम्मीदवार धीरज साहू को उस उम्मीदवार को पूरी तरह से सुरक्षित रखना है, जो या तो पार्टी से नाराज चल रहा हो, या फिर पार्टी से बगावत करने के मूड में हों. क्योंकि अगर विपक्ष की वोट नंबर की बात की जाये तो आदर्श तौर पर उनके पास जीत का आंकड़ा है. लेकिन बदलते मौसम के वक्त कौन बीमार पड़ जाये, किसका बीपी या शुगर गड़बड़ा जाये, कहा नहीं जा सकता. ऐसे में सावधानी ही बचाव के नियम पर धीरज साहू रणनीति बनाते दिख रहे हैं. ऐसे में कौन सा मरहम किस घांव पर लगाना है, यह धनकुबेर अच्छी तरह जानते हैं. इस पर भी ध्यान देना होगा कि एेन वक्त पर किसी विधायक की गिरफ्तारी वारंट लेकर पुलिस उसे ढूंढने ना लगे. 

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बीजेपी को जीत के लिए हर हाल में शिकार करना ही होगा
बीजेपी को भूख से मुकम्मल निजात मिलना तभी संभव है, जब वो विपक्ष के दो-तीन विधायकों का शिकार कर ले. बीजेपी की नजर उन सभी विधायकों पर टिकी है, जो या तो बीमार होते दिख रहे हैं, या फिर विपक्षी पार्टी से बगावत कर लें. जाहिर तौर पर बीजेपी अगर दूसरी सीट पर जीतती है तो क्रॉस वोटिंग होगी. यह आंकड़े बता रहे हैं. ऐसे में क्रॉस वोटिंग करेगा कौन, तलाश उसकी है. साथ ही देश में हालिया चुनाव में बीजेपी की लगातार जीत ने उसे इतना तो सिखा ही दिया है, कि जीत के लिए कब-कौन सा फॉर्मूला कहां इस्तेमाल करना है. कारोबारी प्रदीप सोंथालिया से जीत की उम्मीद इसलिए भी बढ़ जाती है, क्योंकि चुनाव के लिए दायर हल्फनामा में सबसे ज्यादा दौलत भी इन्हीं के खाते में है.

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