झारखंड चारा घोटाला : पहले टेंडर निकालने में विभाग ने की नियमों की अनदेखी, मीडिया में खबर आने के बाद दिया एफआईआर का आदेश, कंपनी से मांगा स्पष्टीकरण 

Publisher NEWSWING DatePublished Tue, 02/13/2018 - 14:56

Ranchi: 2016 में कृषि एवं पशुपालन विभाग ने करीब पांच करोड़ रुपये का चारा खरीदने के लिए टेंडर निकाला. साफ तौर से टेंडर किसी एक कंपनी को फायदे पहुंचाने के लिए निकाला गया था. महालेखाकार की रिपोर्ट के बाद जब यह मामला मीडिया में आया, तो विभाग एफआईआर का आदेश दे रहा है. साथ ही कंपनी से स्पष्टीकरण मांगा जा रहा है, लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि कैसे विभाग ने कंपनी को फायदा पहुंचाने के लिए काम किया. कैसे सारे नियमों को विभाग ने ताक पर रखकर टेंडर प्रक्रिया को पूरा किया. सबसे पहले ये जानना जरूरी है कि कैसे कंपनी ने टेंडर निकालने में कंपनी को फायदा पहुंचाया. 

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टेंडर प्रक्रिया में जो गड़बड़ियां की गयीं

टेंडर अखबार में आने के बाद सात कंपनियों ने टेंडर डाला. एल-1 मानते हुए M/s KPR Agrochem Ltd. को 16 दिसंबर 2016 को काम दे दिया गया. प्वाइंट में समझें गड़बड़ियों को.
- टेंडर में इस बात की शर्त रखी गयी कि कंपनी को 10 साल का अनुभव होना चाहिए. M/s KPR Agrochem Ltd  कंपनी ने शपथ पत्र दायर किया कि कंपनी को 10 साल का अनुभव है, लेकिन कंपनी ने जहां लिखा था कि उसे 10 साल का अनुभव है, उसमें साफ तौर से छेड़-छाड़ देखा जा रहा है. 

- कंपनी ने कहा कि जून 2006 में आंध्रप्रदेश उद्योग एवं वाणिज्य विभाग से लाइसेंस के लिए आवेदन दिया गया था, लेकिन आवेदन की कॉपी टेंडर के साथ नहीं लगायी गयी. 

- आयकर ने जो पैन कंपनी को निर्गत किया है,  वो जनवरी 2007 का है, लेकिन आंध्रप्रदेश वाणिज्य कर विभाग ने जो निबंधन सर्टिफिकेट दिया है, वह जून 2014 का है. साथ ही Drugs Control Administration, आंध्रप्रदेश सरकार ने जो लाइसेंस कंपनी को निर्गत किया है, वो 27 अप्रैल 2011 का ही है. इससे यह साबित होता है कि कंपनी किसी भी तरह से 10 साल का अनुभव नहीं रखती है. 

- टेंडर की अधिसूचना के क्लाउज सात के मुताबिक कंपनी को कम-से-कम तीन सालों तक Market Standing Certificate for Quoted Product, राज्य के Drug Controller या किसी Charted Accountant से सत्यापित होना चाहिए, लेकिन ऐसा कोई दस्तावेज काम लेने के लिए कंपनी ने नहीं लगाया. 

- टेंडर की अधिसूचना के क्लाउज नौ के मुताबिक कंपनी में इनहाउस रिसर्च एंड डेवलपमेंट की व्यवस्था होनी चाहिए. साथ ही काम से जुड़े क्षेत्र में शोध के तीन साल का प्रमाण देना अनिवार्य था. M/s KPR Agrochem Ltd.  ने इस संबंध में अपने रिसर्च एंड डेवलपमेंट यूनिट का नाम M/s Sri Sai Swarup Seeds Pvt ltd. तेलंगाना का नाम दिया था, जो कि एक बीज उत्पादन से जुड़ी संस्थान है ना कि पशु आहार बनाने वाली संस्था है. साथ किसी तरह का कोई शोध भी संस्थान की तरफ से नहीं किया गया है. 

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खेती करने वाली कंपनी को बना दिया पशु आहार बनाने वाली कंपनी
टेंडर में साफ तौर से इस बात का उल्लेख था कि उसी कंपनी को चारा सप्लाई करने का दिया जाएगा, जिसके पास पशु आहार में शोध करने का कम-से-कम तीन साल का अनुभव हो. M/s KPR Agrochem Ltd. ने जिस कंपनी का टेंडर लेने के लिए दिया वो पशु आहार से जुड़ी कंपनी है ही नहीं. कंपनी खेती करने से जुड़े शोध करती है. Registrar of Companies की बेबसाइट पर यह स्पष्ट है कि M/s Sri Sai Swarup Seeds Pvt Ltd. का काम खेती से जुड़ा हुआ है ना कि पशु आहार से. इस कंपनी का पता और पशु आहार सप्लाई करने वाली कंपनी M/s KPR Agrochem Ltd. का पता बिलकुल एक है. इन दोनों कंपनियों की बैठक भी एक साथ होती है. कंपनी ने अपनी साइट पर लिखा है कि कंपनी की स्थापना 2014 में हुई है. टेंडर की प्रक्रिया 2016 में हुई है. शोध का अनुभव तीन साल होना अनिवार्य था. ऐसे में M/s KPR Agrochem Ltd. ने कैसे टेंडर भरा और काम भी उसे मिल गया. यह सवालों के घेरे में है. 

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विभाग ने अपने पदाधिकारियों और कंपनी को शोकॉज किया
कृषि पशुपालन एवं सहकारिता विभाग की विशेष सचिव शुभ्रा वर्मा ने गव्य विकास निदेशालय के तत्कालीन संयुक्त निदेशक शैलेंद्र कुमार (सेवानिवृत्त), अजीत कुमार सहायक निदेशक, चंद्रकुमार सिंह और प्रियंका कुमारी तकनीकी पदाधिकारी से मामले में स्पष्टीकरण मांगा है. जिन सारे मामलों पर विभाग स्पष्टीकरण मांग रहा है, उसे न्यूज विंग ने अपनी पहली खबर में उजागर किया था. पूछा गया है कि 

- टेंडर में सीवीसी की गाइडलाइन की घोर उपेक्षा की गयी है, साथ ही टेंडर NIT फॉर्मेट में नहीं निकाला गया. 

- टेंडर निकालने से पहले वित्त विभाग की अनुमति क्यों नहीं ली गयी. साथ ही क्यों विधि विभाग से सुझाव नहीं लिया गया. 

- टेंडर डालने के लिए इनकम टैक्स रिटर्न क्यों नहीं मांगा गया, जो जरूरी होता है. 

- 4.65 करोड़ के काम के लिए आखिर क्यों 50 करोड़ टनओवर रखा गया, जबकि इतनी राशि के काम के लिए 50 लाख टर्न ओवर होना काफी होता है. 

- NBBD के दिशा-निर्देशों का क्यों उल्लंघन किया गया. 

- कंपनी का अनुभव दस साल का होना चाहिए, जबकि जिस कंपनी को काम दिया गया उसे 10 साल का अनुभव नहीं है. ऐसे में कैसे कंपनी को वर्क ऑर्डर मिला. 

- क्यों कंपनी ड्रग कंट्रोलर और सीए से सत्यापित नहीं है. 

- उसी कंपनी को काम दिया जाना चाहिए था, जिसके पास पशु आहार मामले में इनहाउस रिसर्च एंड डेवलपमेंट करने की व्यवस्था है, लेकिन M/s KPR Agrochem Ltd. के पशु आहार से संबंधित शोध का कोई अनुभव नहीं है. जिसका कंपनी का नाम टेंडर में दिया गया है, उसे बीज से संबंधित शोध का अनुभव है. 

- बिरसा कृषि विश्वविद्यालय ने पशु आहार के डोज से संबंधित रिपोर्ट को अमान्य कर दिया. बावजूद इसके कैसे M/s KPR Agrochem Ltd. को एल-वन घोषित कर काम दे दिया गया.

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