भ्रष्टाचार पर करारा प्रहार के नाम पर सिर्फ छोटे कर्मियों और अधिकारियों पर चला सरकारी डंडा, एसीबी की कार्रवाई पर झारखंड सरकार थपथपा रही अपनी पीठ

Publisher NEWSWING DatePublished Sat, 03/17/2018 - 13:29

Akshay Kumar Jha

Ranchi: भ्रष्टाचार पर करारा प्रहार तीन वर्षों में 276 गिरफ्तार. नेक इरादे हौसले बुलंद... आइए बनायें न्यू झारखंड”. ऐसे स्लोगन आपको सड़क पर तमाम होर्डिंग्स, अखबार और दूसरी जगह देखने को मिल जाया करते होंगे. इस विज्ञापन के जरिए सरकार यह बताने की कोशिश कर रही है कि तीन सालों में सरकार ने भ्रष्टाचार पर कमाल तरीके से नकेल कसा है. 276 भ्रष्ट सरकारी कर्मी और अधिकारियों को रंगे हाथों पकड़ा है. लेकिन  इस विज्ञापन के पीछे का सच यह है कि सरकार जिसे अपनी कार्रवाई बता रही है, वो एसीबी (एंटी करप्शन ब्यूरो) की कार्रवाई है. यह सभी अधिकारी या कर्मी एक छोटे कद के थे.

सवाल : क्या जिस रफ्तार से छोटे अधिकारियों और कर्मियों पर एसीबी ने कार्रवाई की, उसी रफ्तार से बड़े अधिकारियों पर कार्रवाई हुई.

जबाव : किसी भी बड़े अधिकारी पर आरोप लगने के बाद भी ना तो सही तरीके से जांच हुई और ना ही कार्रवाई. किसी-किसी मामले में सरकार ने आईवॉश करते हुए अक्षम पदाधिकारियों से मामले की जांच करायी और मामले को रफा-दफा कर दिया.    

एसीबी ने एक आम आदमी के आवेदन पर कार्रवाई करते हुए तीन साल में 276 लोगों को गिरफ्तार किया है. इसमें सरकार का कहीं से कोई रोल नहीं है. दूसरी तरफ सरकार को जहां भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़े कदम उठाने थे, वहां सरकार पूरी तरह से बैकफुट पर नजर आयी. हर बार देखा गया है कि बड़े अधिकारियों पर आरोप लगने के बाद भी सरकार ने उसे क्लीन चिट दे दिया है. 

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पूर्व सीएस राजबाला वर्मा के रिटायरमेंट का रास्ता किया साफ

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राजबाला वर्मा

राजबाला वर्मा के सीएस बनने के पहले ही उनपर कई तरह के आरोप लगते रहे हैं. उनपर आरोप लगाने वाला कोई आम आदमी नहीं बल्कि सरकार के ही मंत्री सरयू राय हैं. उन्होंने एक से एक कई मामलों को लेकर सीएम को राजबाला वर्मा के खिलाफ जांच करने की बात कही. लेकिन सीएम की तरफ से किसी तरह की कोई जांच समिति नहीं बनायी गयी. बल्कि उन्हें आराम से रिटायर होने दिया गया.

-              सरयू राय ने सीएम रघुवर दास को चारा घोटाले में सीबीआई की तरफ से आयी राजबाला वर्मा के खिलाफ चिट्ठी को लेकर जांच करने के लिए लिखा. मामले पर बजट सत्र का पूरा सेशन हंगामे की भेट चढ़ गया. लेकिन सीएम ने सिर्फ चेतावनी देकर राजबाला वर्मा को छोड़ दिया. जबकि चेतावनी देने के सरकार के कई प्रावधान हैं. उनमें से किसी तरह का कोई प्रावधानों को इस मामले में नहीं माना गया. सिर्फ मौखिक चेतावनी देकर उन्हें छोड़ दिया गया.

-              पश्चिम सिंहभूम जिला के गुआ-सलाई पथ निर्माण को लेकर एनजीटी ने तत्कालीन पथ निर्माण सचिव राजबाला वर्मा पर ईमानदार ना होने की टिप्पणी की. मामले को लेकर सरयू ने सीएम को जांच को लिये लिखा. लेकिन सीएम ने किसी तरह की कोई कार्रवाई नहीं की.

-              इंडसइंड बैंक के एक बड़े अधिकारी के ट्विटर पर राजबाला वर्मा को लेकर ट्विट किया कि पेमेंट को लेकर सीएस रहते हुए राजबाला वर्मा ने बैंक अधिकारी को अपने बेटे के कारोबार में इन्वेस्ट करने को कहा. मामला ने जब विधानसभा में हंगामे का शक्ल लिया तो सीएम ने स्पेशल ब्रांच से इसकी जांच करा दी. जबकि सीएस के खिलाफ एक जूनियर आईपीएस जांच कानूनी रूप से नहीं कर सका. जांच के बाद राजबाला को क्लीन चिट दे दी गयी. लेकिन जांच रिपोर्ट की कॉपी मांगने के बाद भी सरयू राय को उसकी कॉपी नहीं मुहैया नहीं कराया गया.

-              भवन निर्माण के तत्कालीन सचिव रहते हुए कैसे राजबाला वर्मा ने अपने पसंदीदा ठेकेदारों को ठेके दिए इस बात की शिकायत भी सरयू राय ने सीएम से की. लेकिन सीएम की तरफ से कोई कार्रवाई नहीं की गयी.

-              पथ निर्माण सचिव रहते हुए कैसे राजबाला वर्मा ने नकली सर्वे करा कर सड़क का चौड़ीकरण किया. इससे जुड़े सबूतों को पेश करने के बाद भी सीएम रघुवर दास ने सरयू राय के आग्रह पर सीएस के खिलाफ किसी तरह की कोई कार्रवाई नहीं की. एनजीटी ने सड़क निर्माण का काम करने वाली कंपनी आरके कंस्ट्रक्शन पर भी ईमानदार ना होने की टिप्पणी की थी. सरयू राय ने सीएम को लिखी चिट्ठी में भी कंपनी के गलत इरादों का जिक्र किया था. बावजूद इसके सरकार ने किसी तरह की कोई कार्रवाई नहीं की.

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राजबाला के अलावा कई शीर्ष अधिकारियों को मिला अभय दान

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पूजा सिंघल

पूजा सिंघल : पलामू जिले के कठोतिया कोल ब्लॉक मामले में सरकार पूजा सिंघल के खिलाफ जांच नहीं कराना चाहती है. पीएमओ की चिट्ठी आने के बाद भी सरकार की तरफ से क्या कार्रवाई की जाएगी, यह भी अभी तक स्पष्ट नहीं है. डेढ़ साल होने को है, लेकिन सरकार ने एसीबी को अभी तक जांच की अनुमति नहीं दी है. विभाग के अधिकारी एक दूसरे से सिर्फ मंतव्य मांगने का काम कर रहे हैं. रिटायर्ड आईएएस और तत्कालीन पलामू कमिश्नर एनके मिश्रा ने मामले की जांच की थी. उन्होंने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि तत्कालीन डीसी पूजा सिंघल ने गलत तरीके से कोल ब्लॉक का आवंटन किया है, जिससे सरकार को करोड़ों रुपए की राजस्व की क्षति हुई है.

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अविनाश कुमार

अविनाश कुमार :  हाउसिंग बोर्ड की सरकारी जमीन को एक बिल्डर को देने का आरोप आईएएस अविनाश कुमार पर लगा. मामले ने एक समय खूब तूल पकड़ा था. सरकार तक बात गयी. लेकिन सरकार की तरफ से अविनाश कुमार को क्लीन चिट दे दी गयी.

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राजीव रंजन

राजीव रंजन  : सामाजिक सुरक्षा के प्रधान सचिव मुखमीत एस भाटिया ने सामाजिक सुरक्षा के निदेशक, प्रोजेक्ट डायरेक्टर राजीव रंजन के खिलाफ एक सिक्रेट रिपोर्ट बनायी. जिसमें साफतौर से भाटिया ने कहा कि राजीव रंजन किसी काम के नहीं हैं, वो रिश्वत लेने के लिए बिचौलिये रखते हैं, महिलाओं के साथ भी उनका आचरण ठीक नहीं है. इतनी कड़ी रिपोर्ट बनाने के बाद भी राजीव रंजन पर सरकार की तरफ से किसी तरह की कोई कार्रवाई नहीं की गयी. बल्कि उनका तबादला एक अच्छे पोस्ट पर कर दिया गया. वो अभी धनबाद नगर निगम के आयुक्त हैं.

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रामचंद्र चंद्रवंशी

मंत्री भी नहीं रहें पीछे

विधायक रामचंद्र चंद्रवंशी : पलामू जिले के विश्रामपुर के विधायक रामचंद्र चंद्रवंशी पर अपने नाम पर चल रहे कॉलेज में सरकारी राशि के दुरुपयोग करने का आरोप लगा. तत्कालीन हेमंत सरकार ने मामले के जांच के लिये लिखा. लेकिन रघुवर सरकार आने के बाद बिहार के नियमों का हवाला देकर तत्कालीन उपायुक्त पूजा सिंघल ने संयुक्त बिहार की नियमावली का हवाला देते हुए विधायक को क्लीन चिट दे दिया. जबकि 2002 में तत्कालीन सीएस वीएस दुबे ने विधायक मद की राशि के खर्च की पूरी नियमावली बनायी थी. इस नियमावली की अनदेखी करते हुए पुराने नियमावली पर ही सरकार ने फोकस किया.

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निजी ठेकेदार को पहुंचाया करोड़ों का फायदा : प्रधान महालेखाकार ने (पीएजी) ने सरकार को नोटिस देकर कहा कि जुडिशियल अकादमी की आंतरिक साज-सज्जा का बजट 5.46 करोड़ का होने के बाद भी इस पर 14.37 करोड़ रुपए खर्च कर दिये गये. कमरों को पांच-सितारा होटल की तरह सजाया गया. रिपोर्ट में कहा गया कि कार्यपालक अभियंता ने बिना किसी लिखित आदेश पर अपने ही स्तर से बदलाव कर दिया. जिस वजह से बजट से ज्यादा 8.91 करोड़ रुपए खर्च हुए. हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल ने भी माननीय न्यायाधीशों की ओर से स्पेसिफिकेशन में किसी तरह का बदलाव के आदेश दिये जाने से इंकार किया है. इस काम को मेसर्स हाईटेन कंस्ट्रक्शन कर रही थी. शिकायत के बावजूद कंपनी पर किसी तरह की कोई कार्रवाई रघुवर सरकार की तरफ से नहीं की गयी.

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