झारखंड में भी किसान बेहाल, आत्महत्या करने की प्रवृति हो रही हावी

Submitted by NEWSWING on Fri, 01/05/2018 - 09:12

Pravin Kumar

Ranchi:  खेती किसानी बहुत ही दर्दनाक व्यवसाय के रूप में देशभर में जाना जाने लगा है. अपने राज्य झारखंड के किसानों का हाल भी कुछ ऐसा ही है. जहां एक ओर अर्थोपार्जन के लिए देश की अधिंकाश आबादी की अजीविका का मुख्य स्रोत कृषि कार्य है, वहीं किसानी में आ रही समस्या के कारण किसान आत्महत्या को मजबूर होते जा रहे हैं. झारखंड के ग्रामीण क्षेत्रों से लाखों की तादाद में किसान धनकटनी के बाद मजदूरी और दो वक्त की रोटी की जुगाड़ में पलायन करते रहे हैं लेकिन बचे हुए लोग, जो पलायन नहीं करते अपना भविष्य आज भी गांव में खेती किसानी के रूप में देखते हैं. इस अवस्था में खेती संकट से जूझ रहे झारखंड के किसानों के लिए सरकार की नीतियां मददगार साबित नहीं हो रही हैं. किसानों को सरकार से सही ढंग से अनुदान एवं सब्सिडी समय पर नहीं मिल पाता है. अपने फसल की सही कीमत किसानों को नहीं मिलने और कृषि संबंधी समस्यओं के कर्ज के बोझ तलेवाली जिंदगी किसानों को आत्महत्या करने को मजबूर कर रही है. 2017 में  रांची के आसपास के इलाके में  ही  सात किसानों ने कर्ज और तंगी के बोझ तले अपनी जीवन लीला का अंत कर लिया था. इनमें रांची के पिठोरिया में दो, बुढ़मू, ओरमांझी, मांडर में एक और लोहरदगा जिले में एक साथ ही गुमला जिले का एक किसान शामिल है. राज्य में किसानी संकट की स्थिती गहराती जा रही है. देश में किसानों का जो हाल है, उससे कहीं-कहीं ज्यादा खराब हाल में झारखंड के किसान हैं क्योंकि यहां बहुफसलिए कृषि और सिंचाई के साधन नहीं होने के कारण किसान कृषि कार्य छोड़ कर पलायन करने को मजबूर होते हैं.

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कई किसानों ने कर ली आत्महत्या

13 जून 2017 को पिठोरिया इलाके के किसान कमलेश्वर महतो ने बैंक का कर्ज न चुका पाने और फसलों को हुए नुकसान की वजह से आत्महात्या कर ली थी.

बढ़मू साहूकार के कर्ज में दबे किसान दुखन यादव (40) ने 22 जुलाई को आत्महत्या कर ली। उसने साहुकारों से कई हजार रूपये कर्ज ले रखे थे जिसे चुकाने में असमर्थ था9 इस वजह से वह लगातार तनाव में था और इससे उबरने का एक ही तरीका उसे सुझा आत्महत्या करना.

मांडर के कारलूस कुजूर ने भी आर्थिक तंगी के कारण 15 दिसंबर को आत्महत्या कर ली. आत्महत्या का कारण केसीसी लोन वापसी था. कारलूस को मनरेगा द्वारा कूप निर्माण कर्य मिला था, जिससे वह अपने खेत में सिंचाई की व्यव्स्था कर सके लेकिन कुंआ तैयार करने के बाद भी उसे पूरी राशि का भूगतान नहीं किया गया. कूप की प्राक्लन राशि 4,23,560 रुपये थी. लेकिन मात्र 1,76,000 रुपये देकर कार्य को पूर्ण दिखा दिया गया. किसान कारलूस कुजूर की आत्महत्या का कारण भी आर्थिक तंगी ही बना. आर्थिक तंगी की वजह से ही इस किसान के गाय, बैल बिक गये, किसान कर्ज के बोझ तले दब गया था.

क्या कहते है किसानों की आत्महत्या के सवाल पर पूर्व शिक्षा मंत्री बंधु तिर्की

किसानों की आत्महत्या के सवाल पर बंधु तिर्की कहते हैं कि सरकार ने इस मामले में गंभीरता से संज्ञान नहीं लिया. ना ही किसानों की आत्महत्या के मामले पर किसी टीम को गठित करके जांच की गयी. किसानों की मौत के मामले को बीमारी और गरीबी से जोड़कर देखा जा रहा है जबकि यह मामला कृषि कार्यों में लगनेवाले लागत की भरपाई ना होना है. किसान दिन ब दिन गरीब होते जा रहे हैं. कर्ज के बोझ तले किसान दबते जा रहे हैं. तंग आकर राज्य के किसान कृषि कार्य छोड़कर मजदूरी करने के लिए विवश होते जा रहे हैं. किसानों की हालत बहुत बुरी है. ऐसे में सरकार को किसानों के हित में काम करना चाहिए जो कि सरकार नहीं कर रही है.

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संजय कुशवाहा भाजपा किसान प्रकोष्ठ प्रदेश संयोजक

झारखंड में किसानों की मौतें किसानी की वजह से नहीं बल्कि अन्य अलग अलग वजहों से हुई हैं. किसानों की बेहतरी के लिए सरकार की कई योजनाएं हंै, जो किसानों के कल्याण के लिए किये जा रहे हैं. किसानों की मौतों को आत्महत्या के साथ जोड़कर सरकार की लोक कल्याणकारी कार्यों को धूमिल करने का प्रयास किया जा रहा है.

वर्ष 2017 किसान आंदोलन का साल रहा. पूरे साल देश के किसी न किसी हिस्से में किसान आंदोलन करते रहे. विरोध दर्ज कराने के लिए अपनी मेहनत की उपज को सड़कों तक पर फेंक दिया. जून में मंदसौर के छह किसान आंदोलन के दौरान पुलिस की सख्ती और मनमानी भी सामने आयी. किसानों को खदेड़ने के लिए गोली तक दागे गये. विरोध स्वरूप किसानों के 184 संगठनों ने मिलकर एक साझा मोर्चा बनाया और देश भर में किसान मुक्ति यात्रा निकाली. एक ओर जहां किसानों की आत्महत्या को लेकर 2017 में किसान संघर्ष करते नजर आये वहीं केन्द्र सरकार ने इन किसानों को परेशानी से उबारने के लिए कोई ठोस रणनीति बनाने की किसी तरह की कोशिश नहीं की. समाचार एजेंसी भाषा के मुताबिक अकेले कर्नाटक में पिछले 5 साल में 3515 किसान आत्महत्या कर चुके हैं.

तेलंगाना में किसानी का मतलब मौत- बीते जून में जारी एक आंकड़े की मानें तो तेलंगाना राज्य बनने के बाद से अब तक वहां पर 3,000 से ज़्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं. इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट में भी कहा गया है कि अलग राज्य बनने के बाद से तेलंगाना में अब तक 3,026 किसानों ने आत्महत्या कर ली है. एक एनजीओ के हवाले से इस रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2014 में 792, 2015 में 1147 और वर्ष 2016 में 784 किसानों ने आत्महत्या की. 2017 में 294 किसान आत्महत्या कर चुके हैं.

छत्तीसगढ़ के किसान भी आत्महत्या में पीछे नहीं

छत्तीसगढ़ भी किसानों की आत्महत्या के मामले में पिछे नहीं है. विधानसभा के शीतकालीन सत्र में भी मामला उठा. सरकार के आंकड़े के अनुसार छत्तीसगढ़ में मौजूदा वित्तीय वर्ष के आठ माह में 61 किसानों ने आत्महत्या की. इसके अलावा पिछले ढाई सालों में राज्य में 1344 किसानों ने आत्महत्या कर ली.

महाराष्ट्र: 17 साल में 26,339 किसानों ने दी जान

महाराष्ट्र सरकार ने छह महीने पहले किसानों की कर्ज़ माफी की घोषणा तो की लेकिन यह घोषणा किसानों की परेशानी को कम करने में कुछ ज्यादा कारगर साबित नहीं हुई. राजस्व मंत्री चंद्रकांत पाटिल ने विधानसभा में कहा, वर्ष 2001 से अक्टूबर 2017 के बीच करीब 26,339 किसानों ने आत्महत्या की. किसानों की बदहाली और इससे तंग आ कर आत्महत्या करने का सिलसिला महाराष्ट्र में बदस्तूर जारी है.

भारत के कई राज्यों में हज़ारों की संख्या में किसान क़र्ज़, फ़सल की लागत बढ़ने, उचित मूल्य न मिलने, फ़सल में घाटा होने, सिंचाई की सुविधा न होने और फ़सल बर्बाद होने के चलते आत्महत्या कर लेते हैं. पिछले 22 सालों में देश भर में तकरीबन सवा तीन लाख से ज़्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं. न्यूज एजेंसी भाषा के अनुसार, 2015 में कृषि से जुड़े 12,602 किसानों ने आत्महत्या की. 2014 में यह संख्या 12,360 थी. इसके पहले 2013 में 11,772, 2012 में 13,754, 2011 में 14 हजार, 2010 में 15 हजार से अधिक, 2009 में 17 हजार से अधिक किसानों ने अलग-अलग किसानी कारणों के चलते आत्महत्या कर ली.

हाल ही में एक किसान मोर्चे की तरफ से दिल्ली में एक किसान संसद लगाई गई और किसानों के संघर्ष को आगे ले जाने का ऐलान किया गया. वर्ष 2017 के अंत में असम के किसान नेता और आरटीआई कार्यकर्ता अखिल गोगोई को जेल से रिहा किया गया, लेकिन किसानों की समस्या सुलझाने वाली उनकी या अन्य किसान संगठनों की कोई मांग मानी नहीं गयी.

कब बदलेंगे किसानों के हालात कोई नहीं जानता

प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेंद्र मोदी ने लोकसभा चुनाव के समय किसानों से वादा किया था कि यदि वे सत्ता में आये तो किसानों को कृषि में लागत से 50 प्रतिशत अधिक का मुनाफा देंगे, स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश लागू करेंगे, किसानों की आय दोगुनी करेंगे, वगैरह. लेकिन जबसे वे प्रधानमंत्री बने हैं, तबसे किसानों के बारे में शायद ही कोई बात की हो.

वर्तमान हालात में जोखिम एवं जानलेवा आजीविका के स्रोत खेती किसानी करनेवाले किसान बदहाल और फटेहाल जीवन जी रहे हैं. इन जोखिमों के कारण अपनी संघर्षपूर्ण जीवन गाथा का अंत आत्महत्या करके कर रहे हैं. कब बदलेंगे किसानों के हालात कोई नहीं जानता.

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