हथियार हाथ में हो तो हिंसा मचेगी ही, चाहे इस्तेमाल जनक्रांति के लिए हो या शांति के लिए

Submitted by NEWSWING on Sat, 01/13/2018 - 16:56

Roopak Raag

जब झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, आंध्र, तेलंगाना, पूर्वी महाराष्ट्र समेत भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को देखता हूं तो एकबारगी ख्याल आता है कि देश क्या गृहयुद्ध की स्थिति में पहुंच गया है. अगर नहीं तो इन राज्यों में अर्द्धसेना के जवानों की तैनाती चप्पे-चप्पे पर क्यों है? आंतरिक विधि-व्यवस्था की जिम्मेदारी तो पुलिस की होती है, फिर अर्धसैनिक बलों की टुकड़ियों को किस काम और नीयत से इन इलाकों में दाखिल कराया है. जाहिर है कि जब देश के नागरिक राज्य की नीतियों से सहमत नहीं होते हैं तभी वे अपना विरोध दर्ज कराते हैं. विरोध दर्ज कराने के दो ही रास्ते होते हैं- या तो शांतिपूर्ण आन्दोलन या फिर सशस्त्र खिलाफत. लेकिन उस स्थिति को समझाना आसान नहीं है, जब कोई इंसान या समूह अपने ही देश, राज्य या शासन व्यवस्था के खिलाफ लड़ने लगता है. यह जानते हुए कि इसमें उसकी जीत नहीं हो सकती. अंततः, वह मारा जायेगा या जेल जायेगा. उसके घर-परिवार बिखर जायेंगे. भारत देश जिसके पास परमाणु बमों से लेकर तोप, मिसाईलें, और 5 लाख से अधिक की सेना है. हर राज्य में लाखों की संख्या में पुलिस हैं. इसके बाद भी अगर देश के सबसे अधिक गरीबी वाले इलाके के मुट्ठी भर लोग 5 लाख सेना वाले देश की शासन व्यवस्था के खिलाफ विरोध में उठते हैं, तो यह कोई सामान्य बात नहीं है. यह मौजूदा लोकतंत्र के किसी बड़े खामी को उजागर करते हैं. लेकिन इसका संवेदनशील हल की बजाय राजसत्ता ने भी कमर कस ली है कि विरोध में उठ रही आवाजों का दमन हर हाल में जारी रखा जायेगा. इस योजना में सरकार और प्रशासन के आला अफसरों की मिलीभगत भी उजागर हो रही है.

हम यहां तीन राज्यों की घटनाओं से इसे समझने की कोशिश करते हैं;

1.    झारखंड के बकोरिया में फर्जी मुठभेड़- नक्सली अनुराग और 11 निर्दोष लोग पुलिसिया एनकाउंटर में मारे गये.

2.    छत्तीसगढ़- जहां अब हर मुठभेड़ पर संदेह होता है.

3.    मणिपुर के हेड कांस्टेबल हरोजित सिंह का बयान- मुझे मेरे सीनियर अफसर ने कहा था कि दाग दो इसकी छाती पर गोली.

हाल ही में झारखण्ड, छत्तीसगढ़ और पूर्वोत्तर के मणिपुर से फर्जी मुठभेड़ के कई ममाले उजागर हुए हैं. इन मामलों में सरकार और प्रशासन के कई

Naxal Women's wing
Naxal Women's wing

आला अफसरों की भूमिका पर भी संदिग्ध होने के आरोप लग रहे हैं. झारखण्ड में फर्जी मुठभेड़ों में तो राज्य पुलिस के मुखिया डीजीपी तक के नाम सामने आ रहे हैं. 2015 में हुए बकोरिया एनकाउंटर के फर्जी होने ने एक बार फिर साबित कर दिया कि लोकतंत्र में संविधान के रहते भी राजसत्ता और उसकी मशीनरी का चेहरा क्रूर, विभत्स और अमानवीय हो सकता है. पहले भी निर्दोष ग्रामीणों को नक्सली बताकर पुलिस द्वारा हत्या किये जाने की खबरें कई राज्यों से आती रही हैं. लेकिन अपने राज्य झारखंड में यह बेहद ही अमानवीय साजिश के रूप में सामने आयी है. झारखण्ड पुलिस का स्लोगन है- ‘सेवा ही धर्म’. लेकिन नारे की पीछे की सच्चाई सभ्य समाज को हिला देने वाली है. यह लोकतंत्र के जन-कल्याणकारी होने की मौलिक संरचना पर आघात है. आखिर निर्दोष ग्रामीणों की हत्या कर कैसे कोई खुद की छाती चौड़ी कर सकता है. अपने राज्यवासियों को मार कर कैसे कोई बहादुरी का मेडल अपनी छाती पर टांग सकता है.

हथियार हाथ में हो तो हिंसा मचेगी ही, चाहे उसे जनक्रांति कहें या कानून व्यवस्था की रक्षा का नाम दें

यह कोई गूढ़ रहस्य नहीं कि सरकारी सिस्टम की नाकामी से ही हथियारबंद आंदोलनों की जमीन तैयार होती है. झारखण्ड भी इसका कोई अपवाद नहीं है. और उसके बाद नक्सली हिंसा को दबाने के नाम पर सरकारी हिंसा. इन दो तरफ़ा हिंसाओं के बीच झारखण्ड के गांव-देहात पिछले करीब तीन दशकों से भी ज्यादा समय से त्रस्त हैं. झारखण्ड में चौतरफा अंधहिंसा और खूनी संघर्षों के लिए यकीनन यह सिस्टम ही जिम्मेवार है. एक बार हाथ में बन्दूक आ जाये तो हिंसा मचेगी ही. भले ही उसे कोई जनक्रांति के लिए हिंसा कहे या कोई शांति के नाम पर हिंसा कहे. नक्सली कहते हैं उन्होंने जनता के शोषण और अधिकारों के खिलाफ बन्दूक उठायी है. सरकार कहती है, लोकतंत्र को नक्सली हिंसा से बचाये रखने और शांति बहाली के लिए इलाके में सीआरपीएफ के जवान भरे हैं.

मरनेवाला और मारनेवाला, दोनों ही इसी देश के नागरिक हैं

लेकिन यह टकराहट कोई सीमा पर नहीं है. इसमें मरनेवाला और मारनेवाला, दोनों ही इसी देश के नागरिक हैं. यह गृहयुद्ध की सी स्थिति है. नक्सलवाद के भी कई आयाम हैं. यह इतना सीधा सवाल नहीं है जितना हमें बाहर से दिखता है. जिसमें एक तरफ नक्सली हैं और दूसरी तरफ पुलिस. दोनों पक्षों के भीतर भी कई तरह के राजनीतिक दावपेंच और खेल चलते रहते हैं. लंबे समय से चले आ रहे सरकार बनाम नक्सल संघर्ष ने ग्रामीण झारखण्ड को बुरी तरह अराजक और खौफजदा कर रखा है. इसके लिए नक्सलवाद का विचलन जितना अधिक जिम्मेदार नहीं है उससे कहीं अधिक सरकार और उसकी विकास एजेंसियां हैं. सरकार ने नक्सलवाद के वैचारिक आधार से लड़ने की बजाये नक्सलियों से लड़ने में अधिक दिलचस्पी रखी. नक्सल विचारधारा का जन्म अगर गरीबी, बेरोजगारी, अन्याय, अत्याचार और विकासहीनता के आधार पर हुआ तो सरकार इन्हें खत्म कर युवाओं को नक्सल विचाराधारा की ओर आकर्षित होने से रोक सकती थी. मगर ऐसा ना कर सरकार ने उनसे निपटने के लिए बन्दूक, पुलिस और गोलीबारी पर अधिक भरोसा किया. जरुरत थी कि विकास और एंटी-नक्सल पुलिसिंग साथ-साथ चलती. लेकिन जैसे दोनों में होड़ मच गयी कौन ज्यादा से ज्यादा हिंसा कर खून बहा सकता है. इस क्रम में कानून-संविधान की रक्षक पुलिस का एक अमानवीय चेहरा झारखण्ड के गावों में उभरा.

Naxal army in village
Naxal army in village

क्या इस दो तरफा हिंसा का कोई हाल नहीं गोलीबारी के अलावे

मानवाधिकार संगठनों और कार्यकर्ताओं का आरोप है कि झारखण्ड की जेलों में डेढ़ से दो हजार वैसे ग्रामीण बंद हैं जिसे पुलिस ने नक्सली घोषित कर झूठे मुकदमे में फंसाया है, गिरफ्तार किया है. बकोरिया ही नहीं कई फेक एनकाउंटर्स झारखण्ड में सामने आये हैं जिसमें निर्दोष लोग मारे गये हैं.

ल्यूकस मिंज गूंगा और बहरा था. दो-तीन बार पुलिस ने आवाज लगायी. जवाब नहीं मिला तो दाग दी गोली. इसी तरह मंगल होनहागा की भी हत्या नक्सली कह कर जंगल में कर दी गयी थी. बढ़निया कांड भी याद ही होगा जिसमें पांच निर्दोष ग्रामीणों को पुलिस ने नक्सल करार दिया था. और पुलिस एनकाउंटर में ग्रामीणों को मार देने की वाहवाही लूटने में लगी थी. बकोरिया कांड के फर्जी होने का खुलासा नहीं होता तो देश के निर्धनतम आबादी वाले क्षेत्र में पुलिस का यह भयानक चेहरा सामने ना आता. अगर निर्दोषों की ऐसी हत्याएं ही झारखण्ड पुलिस की सेवा है तो यह असंवैधानिक ही नहीं सभ्य समाज के लिए शर्मनाक भी है. अपने नागरिकों के दमन का यह क्रूर इतिहास झारखंडी लोकतंत्र पर हमेशा हंसता रहेगा, सवाल खड़े करता रहेगा.

झारखंड में कथित मुठभेड़ों और हत्याओं के कुछ उदाहरण

2010- तमाड़ के पपीरदाह गांव के एतवा मुंडा और राजेश सिंह मुंडा की हत्या
2011- पश्चिमी सिंहभूम जिले के सारंडा जंगल में मंगल होनहागा की हत्या
2012- नवरनागूगांव (लातेहार) के निवासी मूकबधिर लुकस मिंज की हत्या
2015- पलामू के बकोरिया में फर्जी नक्सली मुठभेड़ में 12 निर्दोष लोगों की हत्या
2017- गिरिडीह के धोलकट्टा गांव में मोतीलाल बास्के की हत्या का आरोप  पुलिस पर है

 

छत्तीसगढ़ में अब हर मुठभेड़ पर संदेह होता है

छत्तीसगढ़ में एंटी-नक्सल मुठभेड़ों का फर्जी होना इतना आम हैं कि उनके रिकॉर्ड से कई पन्ने भर जायें. Bastar Solidarity Network (BSN) ने

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Anti Naxal Operation

अक्टूबर 2016 में दावा किया था कि केवल बस्तर में पिछले सात महीनों में सौ से ज्यादा आदिवासियों की हत्या सुरक्षाबलों ने फर्जी मुठभेड़ में की है. सोनी सोरी का मामला भी याद ही होगा, जिसमें पुलिस के वरीय अधिकारियों की मौजूदगी में सोनी के गुप्तांग में कंकड़ डालने का आरोप लगा था. 2012 का वह मुठभेड़ जिसमें बस्तर में 17 ग्रामीणों को सुरक्षाबालों ने माओवादी करार देकर मार डाला था, पर भी कई सवाल उठे थे. छत्तीसगढ़ में तो अब हर एनकाउंटर पर सवाल उठते हैं.

मणिपुर के हेड कांस्टेबल का खुलासा- अफसरों के आदेश पर हुए कई फेक एनकाउंटर्स

एक समय में मणिपुर के खतरनाक एनकाउंटर स्पेशलिस्ट माने जाने वाले हेड कॉन्स्टेबल हरोजीत सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में सनसनीखेज खुलासा किया. उन्होंने कहा है कि 2003 से 2009 के बीच मणिपुर में बड़ी संख्या में हुए फर्जी मुठभेड़ों के वे गवाह हैं. हरोजित ने हलफनामे में आरोप लगाया है कि "इन सभी फर्जी मुठभेड़ों को वरीय अधिकारियों के आदेश पर अंजाम दिया गया था. सिंह उन छह वर्षों के दौरान मणिपुर कमांडोज के प्रमुख मुठभेड़ विशेषज्ञों में एक रहे थे.

 पुलिस को यह नया चेहरा देने में क्या केवल अफसर शामिल हैं या इसके पीछे सत्ता में बैठे लोगों का भी हाथ है. पुलिस प्रशासन शासन के अधीन ही काम करती है. अफसरों के आदेश के पीछे भी उच्च स्तर से मिले आदेश हो सकते हैं. देश के आन्तरिक असंतोषों का जिस तरह गोलियों से दमन किया जा रहा, वह भारत की घरेलू शांति के लिए उतने ही अधिक खतरनाक परिणामों के सामने आ रहे हैं. भारतीय लोकतंत्र का शासन आंतरिक नागरिकों के असंतोष को संवेदनशील तरीके से हल कर सकता है. सम्मान के साथ खाने-पीने, पढने-लिखने, इलाज की ही तो मांग है. यह उतनी भी नाजायज मांगें नहीं हैं. इतना बड़ा, शक्तिशाली देश और विश्व की उभरती अर्थव्यवस्था के लिए इन मांगों पर गौर करना उतना भी मुश्किल नहीं है. शायद.

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