“पंचहीन बजट” के “राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा योजना” में भी छेद-ही-छेद

Publisher NEWSWING DatePublished Fri, 02/02/2018 - 12:53

Babban Singh

अबतक वन लाइनर पंच के लिए विख्यात मोदी सरकार के इस साल के आम बजट को यदि वन लाइनर पंच देना हो तो यह कहने में अतिश्योक्ति नहीं होनी चाहिए कि इस बजट में वन लाइनर पंच है ही नहीं. यहां तक कि बहुचर्चित फ्लैगशिप स्वास्थ्य योजना राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा योजनाकी गहराई से जांच करने पर उसमें भी बहुतेरे छेद नजर आ रहे हैं. इसलिए फिलहाल अपनी बात इसी तक सीमित रखेंगे. सबको स्वास्थ्य सुविधा देने के उद्देश्य से इस साल के बजट में इस योजना की घोषणा की गई है, जिसके तहत 10 करोड़ गरीब परिवारों को 5 लाख रुपए तक की स्वस्थ्य बीमा दी जाएगी. वित्त मंत्री ने घोषणा की है कि इसके तहत कुल आबादी के 40 फीसद यानि 50 करोड़ लोगों का भला होगा. ज्ञात हो कि पहले पहल राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत 30 हजार की बीमा की योजना थी. जिसे पिछले साल 1 लाख रुपए तक बढ़ा दिया गया था और इसके लिए 1,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था. अब इसे 2,000 करोड़ कर दिया गया है.

अभी इस योजना का ब्लू प्रिंट तैयार नहीं है

आज की वित्त मंत्री के पत्रकार वार्ता में मंत्रालय के एक सचिव का कहना था कि अभी इस योजना का ब्लू प्रिंट तैयार नहीं है और प्रायोगिक दौर के बाद तय किया जाएगा कि दो-तीन योजनाओं में से किस एक योजना का चयन इसके लिए हो. पर उन्होंने इस बात को भी सूचित किया कि इस योजना के लिए इस साल के बचे दो माह के लिए राशि आवंटित कर दी गयी है. हालांकि शाम में एक टीवी चैनल पर नीति आयोग के कार्यकारी प्रशासक अमिताभ कान्त का कहना था कि इसके तहत केंद्र सरकार और राज्य सरकार की हिस्सेदारी 60:40 की होगी और यह आंध्रप्रदेश या केरल में जारी यूनिवर्सल स्वास्थ्य योजना का ही स्वरूप होगा. उल्लेखनीय है कि ये दोनों स्वास्थ्य योजनायें बेहद जनप्रिय हैं. बकौल कान्त इसके लिए प्रत्येक व्यक्ति को साल में 1100 रुपए की बीमा पॉलिसी लेनी होगी, अर्थात एक परिवार के 5 सदस्यों के लिए 5500 रुपए के प्रीमियम पर पांच लाख का स्वास्थ्य बीमा कवर होगा. हालांकि पश्चिम बंगाल के वित्त मंत्री का मानना है कि फिलहाल वे इससे बेहतर स्वास्थ्य योजना चला रहे हैं और उसकी जगह केंद्र सरकार एक ऐसी योजना लाना चाह रही है जिसका ब्लू प्रिंट बनने में भी अभी और छः माह की दरकार है.

यशवंत सिन्हा जैसे विशेषज्ञ पहले से चिंता व्यक्त करते रहे हैं

पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा जैसे विशेषज्ञ पहले से चिंता व्यक्त करते रहे हैं कि यह सरकार पुरानी योजनाओं का ही चोला बदल फ्लैगशिप योजनाओं की घोषणा करती रही है. पर इस पर नीम हकीमी तुर्रा यह है कि सरकार उसके क्रियान्वयन की भी ठीक से देखभाल नहीं करती. फलतः ऐसी योजनायें कागज पर ही रह जाती हैं. सड़क विकास व उज्जवला जैसी योजनाओं को छोड़ दिया जाये तो मोदी सरकार की अधिकांश योजनाओं का यही हश्र हुआ है. लेकिन संदेह इस बात को भी लेकर है कि इसका फायदा तो केवल अस्पतालों में भर्ती हुए रोगियों को ही मिल सकता है, जबकि गांव के गरीब अपने स्वास्थ्य संबंधी अधिकांश खर्चों का 80 फीसद तो दवा और डॉक्टरों पर ही गंवा देते हैं. ऐसे में बचे मात्र 20 फीसद के लिए ही वे बीमा कंपनियों से दावा करने के हकदार होंगे जो कि व्यवहारिक से लाभदायक नहीं प्रतीत होगा.

दूसरी ओर गांव में सरकारी प्राथमिक चिकित्सा सेवाओं की वर्तमान हालात में हितग्राही कैसे इस योजना के फायदे उठायेंगे, यह भी विवाद का मुद्दा है? अधिकांश आलोचक मान रहे हैं कि यह बीमा आधारित निजी अस्पताल उद्योग को आगे बढ़ाने का प्रयास है. उनके विरोध के पीछे तर्क है कि अधिकांश पश्चिमी देशों में इसी तरह के प्रारूप के कारण चिकित्सा इतना महंगा हो गया है कि वहां के बहुतेरे नागरिक केवल इलाज के लिए भारत जैसे सस्ते स्वास्थ्य मुहैया कराने वाले देशों में यात्रा वीजा लेकर आते हैं. कदाचित इसीलिए अमेरिका जैसे देश में ऐसे लोगों को इससे मुक्ति दिलाने के लिए बराक ओबामा के शासन काल में सार्वजनिक ओबामाकेयर आरंभ किया गया था. आलोचकों का मानना है कि इस योजना से एकमात्र लाभार्थी निजी क्षेत्र की बीमा कंपनियां व बड़े अस्पताल होंगे और अंततः और धनी देशों की तरह भारत में अपने पैसे से चिकित्सा कराना असंभव हो जाएगा. कुछ आलोचकों का यह भी मानना है कि इसके बदले ग्रेट ब्रिटेन के चिकित्सा मॉडल को अपनाना चाहिए. जहां प्रारंभिक स्तर की चिकित्सा निजी क्षेत्र के अधिकार में है और मध्य और विशेषज्ञ चिकित्सा सार्वजनिक क्षेत्र के अस्पतालों के हाथ में है. वैसे निजीकरण के इस भारतीय दौर में इस बात की बहुत कम संभावना है कि सरकार ऐसा करेगी क्योंकि ऐसा करना ही होता तो सरकार सार्वजनिक प्राथमिक और विशेषज्ञ अस्पतालों के स्वास्थ्य को ठीक करने के प्रयास पर जोर देती.

उधर, कुछ अन्य जानकारों की माने तो मात्र 2000 करोड़ की प्रस्तावित राशि से किस जिन्न की सहायता से सरकार 40 फीसद से ज्यादा आबादी के स्वास्थ्य रक्षा की उम्मीद जगा सकती है? यहां तक कि नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविन्द पानगडिया ने भी इस नगण्य राशि के आवंटन पर सवाल खड़ा किया है. हालांकि वे मानते हैं कि जल्द संसदीय चुनाव की विवशता में सरकार को आनन-फानन में ऐसे कदम उठाने पड़े हैं. वर्तमान योजना में एक पेंच यह भी है कि गांव के अधिकांश लोगों तक इस तरह की पूर्व की योजनाओं की ही खबर नहीं तो यह योजना कैसे वास्तविक लाभग्राहियों तक पहुंचेगी? अगर सरकार इस योजना को सफल बनाना चाहती है तो उसे हालांकि निजी मेडिकल विशेषज्ञों ने इस योजना का पुरजोर स्वागत किया है क्योंकि उन्हें उम्मीद है, कि इस योजना का बहुत बड़ा हिस्सा निजी अस्पतालों व चिकित्सकों की ओर ही आना वाला है. स्वाभाविक है कि ऐसे में इस योजना का भी वही हश्र होना है, जिस बारे में सिन्हा जैसे आलोचक लगातार चेतावनी दे रहे हैं.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और यह उनके निजी विचार हैं)

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