किसानों के गांव बंद आंदोलन से सरकार बैकफुट पर

Publisher NEWSWING DatePublished Wed, 06/06/2018 - 11:52

Faisal Anurag

आठ राज्यों में  किसानों का गांव बंद आंदोलन एक जून से जारी है. किसानों का यह संगठित आंदोलन अपनी ताकत का अहसास करा रहा है. किसान फसलों की कीमत दुगना करने और स्वामीनाथन रिपोर्ट लागू करने की मांग कर रहे हैं. किसानों की अन्य मांग है कि  कृषि ऋण माफ किया जाए किसानों को उसकी फसल की लागत मूल्य में लाभ जोड़ कर दिया जाए. किसानों की जमीन कुर्क के जो नोटिस भेजे गए हैं वो वापस लिए जाए.

भारतीय जनता पार्टी ने 2014 के चुनावों में इसका वायदा किया था जिसे अब तक लागू नहीं किया गया है. किसानों का गुस्सा कई जगह हिंसक भी हुआ है लेकिन कुल मिलाकर 130  किसान संगठनों ने अपनी ताकत और एकता का परिचय दिया है और विमार्ष को किसानोन्मुख बनाने का दबाव पैदा कर दिया है. इस आंदोलन से सरकार दबाव में है लेकिन केंद्र की कोशिश है कि वह दबाव का इजहार नहीं करे. केंद्रीय कृशि मंत्री  का बयान इसी तथ्य को जाहिर करता है. राधामोहन सिंह जो खुद किसान पृश्ठभूमि का हावाला देते रहे हैं ने कहा है कि किसान मीडिया में हाईलाइट होने के लिए आंदोलन करते हैं और आत्म हत्सा करते हैं. हरियाणा के मुख्यमंत्री समेत अनेक भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने इसी तरह की संवेदनहीनता जाहिर की है और भारत का मध्य औरउच्च मध्यम वर्ग किसानों के आंदोलन को बदनाम करने के तर्क दे रहे हैं. केंद्रीय मंत्री हरसिमरत बादल ने किसानों के वर्तमान संकट के लिए कांग्रेस के कुषाण को जिम्मेदार ठहराया है. गांव परिवेश से कटे हुए लोगों के लिए किसानों का यह आंदोलन लग रहा है उनकी अस्मिता को भी चुनौती दे रहा है. किसानों का हौसला तोंड़ने के लिए किए गए कुप्रचार का असर किसानों पर नहीं पड़ा है.

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अभी हाल ही में संपन्न हुए कर्नाटक के चुनाव में भापजा ने किसानों की कर्जमाफी का वायदा किया था. किसान नेता पूछ रहे हैं कि केंद्र सरकार इस सवाल पर खामोश क्यों है और किसानों के सवालों और संदर्भ में सार्थक पहल क्यों नहीं कर रही है. उसकी ओर से किसान संगठनों से बातचीत करने का भी कोई प्रस्ताव नहीं आया है. आंदोलनरत किसानों के संगठनों ने कहा है कि अगले चार दिनों में  आंदोलन को और तेज किया जाएगा. आंदोलन के कारण अनेक नगरों में सब्जियों और दूध महंगे हो गए हैं.

किसान नेताओं  का दावा है कि आंदोलनरत आठ रज्यों में किसानों का पूरा समर्थन इस आंदोलन को मिल रहा है और किसान अब राजनीतिक तौर पर निर्णायक भूमिका निभाने के लिए कमर कस चुके हैं. उत्तरप्रदेश के कैराना में हुए हाल के उपचुनाव में किसानों की नराजगी दिखी और गन्ना किसानों ने  जिस तरह सरकार के खिलाफ गुस्सा जताया उससे पता चलता है कि किसान राजनीतिक रूप से सजग हो गए है और आने वाले सालों में उनकी यह राजनीतिक एकता और समझ भारतीय राजनीति को गहराई से प्रभावित करेगी. किसान नेताओं का यह भी कहना है कि यदि सरकार का यही उपेक्षापूर्ण रवैया बना रहा तो उसे इसकी भारी कीमत चुकानी होगी. इस आंदोलन की खास बात यह है कि इसने किसानों और खेतिहर मजदूरों के बीच भी गहरा समन्वय बनाया है और अपनी एकता का परिचय दिया है. इस आंदोलन में हर तरह के किसान भागीदारी निभा रहे हैं. किसान नेताओं ने सरकार से पूछा है कि वह बात तो खेती और किसानों के विकास की करती है लेकिन उसका ठोस कार्यक्रम जमीन पर नहीं दिखता है.  किसान नेताओं ने केंद्र सरकार से पूछा है कि 2022 तक वह खेती के लाभ को दुगुना कैसे करेगी और उसके इस वायदे पर भरोसा कैसे किया जाए जबकि वह इसके लिए कोई ठोस कार्ययोजना प्रस्तुत नहीं कर रही है.

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एक ओर पूंजीपतियों के करोड़ो के कर्ज राइट ऑफ किए जा रहे हैं. वहीं दूसरी ओर किसानों को राहत देने की कोशिश तक नहीं की जा रही है. उत्तर प्रदेश में किसानों की कर्जमाफी का ऐलान हास्यास्पद साबित हुआ है और किसान अब भी कर्ज के फंदे से नहीं निकल पाए हैं. इसी तरी माहाराष्ट्र की कर्जमाफी का भी बुरा हश्र सामने है.  किसानों के मुबई लांगमार्च ने पिछले दिनों सरकार की किसान विरोधी रूझान को ही उजागर किया था. देशभर के किसान सरकार से सवाल कर रहे हैं कि क्या वे सचमुच खेती-किसानी के प्रति सजग हैं या नहीं, इसके प्रति उन में कोई संवेदना है या नहीं ? इन सवालों का जबाव किसानों को अब तक नहीं मिल पा रहा है. आम आदमी पार्टी ने कहा है कि पिछले 2 सालों में 36,420 किसानों ने आत्महत्या की है और ये आंकड़े मोदी सरकार की विफलता को बयान करते हैं.

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