सरकारी शराब सिंडिकेटः कैबिनेट के फैसले को पलट कर सहायक उत्पाद आयुक्त को बनाया पपेट, जिला में आयुक्त सिर्फ ओके बटन दबाते हैं (3)

Publisher NEWSWING DatePublished Wed, 06/13/2018 - 14:19

-  ‘गंदाहै पर धंधाहै ये...

- कैबिनेट के फैसलों को ठेंगा

Akshay Kumar Jha

Ranchi: रांची उत्पाद कार्यालय में कुछ अधिकारी ने  उलटफेर कर शराब के धंधे का सारा पावर अपने हाथों में ले लिया है. राज्य सरकार की सिंडिकेट खत्म करने की सोच से बिलकुल उलट एक नया सिंडिकेट खड़ा हो गया है, जिसकी कमान उत्पाद कार्यालय के कुछ अधिकारियों के पास है. एक के बाद एक तीन ऐसे फैसले लिए जिससे ये साबित होता है कि विभाग सरकार के बनाए गए कानून को नहीं मानता है. कम-से-कम कैबिनेट के फैसले को तो बिलुकल नहीं. पूछे जाने पर उत्पाद विभाग के जीएम फाइनेंस मनोज कुमार कहते हैं कि बोर्ड मुनाफे बनाने के लिए किसी भी तरह का फैसला लेने के लिए आजाद है. विभाग के एमडी भोर सिंह यादव का कहना है कि कैबिनेट के फैसले और गजट से बिलकुल चिपककर नहीं रहा जा सकता है. लेकिन यह कोई नहीं बताता कि किस कानून के तहत विभाग कैबिनेट के फैसले और गजट की धज्जियां उड़ा रहा है.

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पपेट बन सिर्फ ओके बटन दबाएंगे सहायक आयुक्त

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जब शराब के व्यवसाय का सरकारीकरण हो रहा था, तो कैबिनेट में पास होकर एक कानून बना. जिसके तहत Indent Raise (शराब की आपूर्ति) के काम के लिए एक फॉर्मेट बनाया गया. फॉर्मेट के तहत शॉप सुपवाइजर हायर किया जाना था, जो जेएसबीसीएल (झारखंड बिवरेज कॉर्पोरेशन लिमिटेड) के पेरोल पर होगा, वो मांग पत्र तैयार कर जिला के सहायक आयुक्त के कार्यालय को देगा. सहायक आयुक्त जेएसबीसीएल की सहमति से स्टॉक के मुताबिक परमिट जारी करेंगे, जिसके बाद शराब की आपूर्ति होती. लेकिन धीरे-धीरे व्यवस्था यह कर दी गयी कि शराब दुकान में मैन पावर सप्लायी करने वाली प्राइवेट कंपनी सीधा जेएसबीसीएल यानि मुख्यालय को मांग पत्र देने लगी. इसमें पेंच फंसा जिले में बैठे सहायक आयुक्त की सहमति का. उसका भी तोड़ निकाल लिया गया. 

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सारा पावर अपने हाथ में लेने के लिए जेएसबीसीएल ने एक सॉफ्टवेयर डेवलेप किया. जो 18.01.2018 से काम कर रहा है. इस सॉफ्टवेयर में के जरिए Indent Raise (शराब आपूर्ति) की औपचारिकता पूरी की जाने लगी. अब मैनपावर सप्लायी करने वाली प्राइवेट कंपनी जिस कंपनी की शराब जितनी मात्रा में आपूर्ति करने को कहती, वो सॉफ्टवेयर में फीड होता. सहमति के लिए जब इसे जिला सहायक आयुक्त भेजा जाना है. लेकिन इस सॉफ्टवेयर में जिला स्तर से कहीं भी Edit का ऑप्शन नहीं दिया गया. जिससे जिला स्तर से ब्रांड जोड़ा या घटाया जाए. सहायक आयुक्त अब चाहकर भी कुछ नहीं कर सकते हैं. वो सिर्फ और सिर्फ OK का बटन दबाकर सहमति की औपचारिकता पूरी करते हैं. इस तरह से शराब की आपूर्ति का सारा पावर मैनपावर सप्लायी करने वाली प्राइवेट कंपनी के पास चला गया. अब फ्रंटलाइन और शोमुख जिस कंपनी की शराब मार्केट में बेचना चाहते हैं, बिना किसी रोक-टोक के बेच रहे हैं. जेएसबीसीएल की तरफ से कंपनी को एक तरह से पूरी छूट मिली हुई है. ऐसा रांची उत्पाद आयुक्त में कार्यरत कुछ अधिकारी के इशारे से हो रहा है.

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सवालों से बचते रहे सचिव, नहीं दिया कोई जवाब

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इधर पूरे मामले पर उत्पाद सचिव राहुल शर्मा से बार-बार कॉन्टैक्ट करने की कोशिश की गयी. एक बार उन्होंने दिल्ली में होने की बात कही. दूसरी बार बुधवार को करीब 12.30 में उनके कार्यालय गया तो वो नहीं थे. कार्यालय से उन्हें फोन किया गया, उन्होंने रिसीव नहीं किया. उनके व्हाट्सएप और फोन मैसेज इनबॉक्स में मिलने के लिए मैसेज भेजा. मिलने के लिए उपयुक्त समय के बारे में पूछा गया, फिर भी उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं आया. इससे पहले अनऑफिसियली उनसे इस मामले में बात हुई थी. इसलिए मामले की जानकारी उनको थी.

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कैबिनेट के फैसले को विभाग नहीं बदल सकता : राजीव कुमार (सीनियर एडवोकेट, रांची हाईकोर्ट)

इधर कानून के जानकारों से न्यूज विंग ने जानना चाहा कि क्या कैबिनेट के फैसले को विभाग अपने स्तर से बदल सकता है, इस मामले पर रांची हाईकोर्ट के सीनियर एडवोकेट राजीव कुमार ने कहा कि कैबिनेट के फैसले को किसी भी हाल में विभाग के स्तर से नहीं बदला जा सकता. अगर इसमें किसी तरह का बदलाव लाना हो तो प्रस्ताव बनाकर वापस कैबिनेट में भेजा जाएगा. कैबिनेट अगर उस प्रस्ताव को मान लेता है, तो बदलाव हो सकता है. इसके सिवाय दूसरे किसी तरीके से कैबिनेट के फैसले में छेड़छाड़ नहीं किया जा सकता. अगर ऐसा होता है तो इसे उच्च स्तर का विभागीय कदाचार कहा जाएगा. जिसके एवज में कानूनी कार्रवाई होगी.

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