भाषा के सन्दर्भ में फडणवीस की अनूठी पहल

Publisher NEWSWING DatePublished Fri, 05/11/2018 - 16:03

Lalit Garg

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस देश के ऐसे पहले मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने सरकार के सारे अंदरुनी काम-काज से अंग्रेजी के बहिष्कार का आदेश जारी कर दिया है, राष्ट्रीयता को सुदृढ़ करने की दिशा में एक अनुकरणीय एवं सराहनीय पहल की है. ऐसा करके उन्होंने महात्मा गांधी, गुरु गोलवलकर और डॉ. राममनोहर लोहिया का सपना साकार किया है. महाराष्ट्र सरकार के सारे सरकारी अधिकारी अब अपना सारा काम-काज मराठी में करेंगे, हिन्दी को भी प्राथमिकता दी जायेगी. केंद्र से व्यवहार करने में हिंदी का प्रयोग तो संवैधानिक आवश्यकता है. आजादी के 70 साल बाद भी सरकारें अपना काम-काज अंग्रेजी में करती हैं, यह देश के लिये दुर्भाग्यपूर्ण एवं विडम्बनापूर्ण स्थिति है. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री फडणवीस ने भाषा के मामले में देश के सभी मुख्यमंत्रियों को सही और अनुकरणीय रास्ता दिखाया है. हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी राष्ट्र एवं राजभाषा हिन्दी का सम्मान बढ़ाने एवं उसके अस्तित्व एवं अस्मिता को नयी ऊंचाई देने के लिये अनूठे उपक्रम किये हैं. राष्ट्रीयता एवं राष्ट्रीय प्रतीकों की उपेक्षा एक ऐसा प्रदूषण है, एक ऐसा अंधेरा है, जिससे ठीक उसी प्रकार लड़ना होगा जैसे एक नन्हा-सा दीपक गहन अंधेरे से लड़ता है. छोटी औकात, पर अंधेरे को पास नहीं आने देता. राष्ट्र-भाषा को लेकर छाए धुंध को मिटाने के लिये कुछ ऐसे ही ठोस कदम उठाने ही होंगे.

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देवेंद्र फड़नवीस, मुख्यमंत्री, महाराष्ट्र

विकास की उपलब्धियों से हम ताकतवर बन सकते हैं, महान नहीं. महान उस दिन बनेंगे जिस दिन राष्ट्र भाषा, राष्ट्र ध्वज, राष्ट्र-गान एवं राष्ट्र-गीत को उचित स्थान एवं सम्मान देंगे. जिस दिन शासन एवं प्रशासन में बैठे लोग अपनी कीमत नहीं, मूल्यों का प्रदर्शन करेंगे, राष्ट्रीयता के गौरव के लिये अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करेंगे. कितने दुख की बात है कि आजादी के 70 साल बाद भी हमारे दूर-दराज के जिलों में भी राज्य सरकारें अपना काम-काज अंग्रेजी में करती हैं. लेकिन महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री फडणवीस ने भाषा के मामले में चली आ रही भूल एवं घोर उपेक्षा को सुधारने का प्रयत्न किया है. उनको इससे आगे बढ़कर और हिम्मत का प्रदर्शन करना होगा और ऐसा करते हुए उन्हें विधानसभा में भी सारे कानून मूल हिंदी और मराठी में बनवाने की पहल करनी होगी. वे यही नियम महाराष्ट्र की अदालतों पर लागू करवाएं. महाराष्ट्र की सभी पाठशालाओं, विद्यालयों और महाविद्यालयों में चलनेवाली अंग्रेजी की अनिवार्य पढ़ाई पर प्रतिबंध लगाएं. जो भी स्वेच्छा से विदेशी भाषाएं पढ़ना चाहें, जरुर पढ़ें. यदि वे ऐसा करवा सकें तो वे भारत को दुनिया की महाशक्ति बनानेवाले महान पुरोधा माने जाएंगे. 

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हिन्दी विश्व की एक प्राचीन, समृद्ध तथा महान भाषा होने के साथ ही हमारी राजभाषा भी है, यह हमारे अस्तित्व एवं अस्मिता की भी प्रतीक है, यह हमारी राष्ट्रीयता एवं संस्कृति की भी प्रतीक है. भारत की स्वतंत्रता के बाद 14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि हिन्दी ही भारत की राजभाषा होगी. इस महत्वपूर्ण निर्णय के बाद ही हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रचारित-प्रसारित करने के लिए 1953 से सम्पूर्ण भारत में 14 सितम्बर को प्रतिवर्ष हिन्दी-दिवस के रूप में मनाया जाता है. हिन्दी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, उत्तराखण्ड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली राज्यों की राजभाषा भी है। राजभाषा बनने के बाद हिन्दी ने विभिन्न राज्यों के कामकाज में आपसी लोगों से सम्पर्क स्थापित करने का अभिनव कार्य किया है. लेकिन अंग्रेजी के वर्चस्व के कारण आज भी हिन्दी भाषा को वह स्थान प्राप्त नहीं है, जो होना चाहिए. चीनी भाषा के बाद हिन्दी विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली विश्व की दूसरी सबसे बड़ी भाषा है. भारत और अन्य देशों में 70 करोड़ से अधिक लोग हिन्दी बोलते, पढ़ते और लिखते हैं. पाकिस्तान की तो अधिकांश आबादी हिंदी बोलती व समझती है. बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, तिब्बत, म्यांमार, अफगानिस्तान में भी लाखों लोग हिंदी बोलते और समझते हैं. फिजी, सूरिनाम, गुयाना, त्रिनिदाद जैसे देश तो हिंदी भाषियों द्वारा ही बसाए गये हैं. दुनिया में हिन्दी का वर्चस्व बढ़ रहा है, लेकिन हमारे देश में ऐसा नहीं होना, बड़े विरोधाभास को दर्शाता है.

हिन्दी को सही अर्थों में राष्ट्र भाषा का दर्जा नहीं मिलने के पीछे सबसे बड़ी बाधा सरकार के स्तर पर है क्योंकि उसके उपयोग को बढ़ावा देने में उसने कभी भी दृढ़ इच्छा शक्ति नहीं दिखाई. सत्तर साल में बनी सरकारों के शीर्ष नेता यदि विदेशी राजनेताओं के साथ हिन्दी में बातचीत का सिलसिला बनाये रखते तो इससे तमाम सरकारी कामकाज में हिन्दी के प्रयोग को बढ़ावा मिलता. प्रसन्नता हैं कि वर्तमान प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी ने इस दिशा में पहल की है. उन्होंने अपनी विदेश यात्राओं में हिन्दी में भाषण देकर और विदेशी प्रतिनिधियों से हिन्दी भाषा में ही बातचीत करके एक साहसिक उपक्रम किया है. प्रधानमन्त्री की यह भावना राष्ट्र भाषा के प्रति सम्मान और समर्पण को दर्शाती है.

किसी भी देश की भाषा और संस्कृति किसी भी देश में लोगों को लोगों से जोड़े रखने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है. भाषा राष्ट्र की एकता, अखण्डता तथा प्रगति के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण होती है. कोई भी राष्ट्र बिना एक भाषा के सशक्त व समुन्नत नही हो सकता है. अतः राष्ट्र भाषा उसे ही बनाया जाता हैं जो सम्पूर्ण राष्ट्र में व्यापक रूप से फैली हुई हो. जो समूचे राष्ट्र में सम्पर्क भाषा के रूप में कारगर सिद्ध हो सके. राष्ट्र भाषा सम्पूर्ण देश में सांस्कृतिक और भावात्मक एकता स्थापित करने का प्रमुख साधन है. महात्मा गांधी ने सही कहा था कि राष्ट्र भाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है.

राष्ट्रीय व्यवहार में हिन्दी को काम में लाना देश की एकता और अखण्डता तथा उन्नति के लिए आवश्यक है. राष्ट्र भाषा के रूप में हिन्दी को प्रमुखता से स्वीकार किया गया है. क्योंकि इसे बोलने वालों की सर्वाधिक संख्या है. यह बोलने, लिखने और पढ़ने में सरल है. इसलिये शिक्षा का माध्यम भी मातृभाषा होनी चाहिए क्योंकि शिक्षा विचार करना सिखाती है और मौलिक विचार उसी भाषा में हो सकता है जिस भाषा में आदमी सांस लेता है, जीता है. जिस भाषा में आदमी जीता नहीं उसमें मौलिक विचार नहीं आ सकते. अंग्रेजी बोलने वाला ज्यादा ज्ञानी और बुद्धिजीवी होता है यह धारणा हिन्दी भाषियों में हीन भावना ग्रसित करती है. हिन्दी भाषियों को इस हीन भावना से उबरना होगा. हिन्दी किसी भाषा से कमजोर नहीं है. हमें जरूरत है तो बस अपना आत्मविश्वास मजबूत करने की. यह कैसी विडम्बना है कि जिस भाषा को कश्मीर से कन्याकुमारी तक सारे भारत में समझा जाता हो, उस भाषा के प्रति घोर उपेक्षा व अवज्ञा के भाव, हमारे राष्ट्रीय हितों में किस प्रकार सहायक होंगे ? हिन्दी का हर दृष्टि से इतना महत्व होते हुए भी प्रत्येक स्तर पर इसकी इतनी उपेक्षा क्यों? इस उपेक्षा को देवेंद्र फडणवीस द्वारा लिये गये साहसिक एवं प्रेरक निर्णयों एवं अनूठे प्रयोगों से ही दूर किया जा सकेगा. इसी से देश का गौरव बढ़ेगा. 

                                                                                            (यह लेखक के स्वतंत्र विचार हैं)

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