घटते जलस्तर पर पर्यावरणविदों की चेतावनी :  रांची का भी हाल न हो जाये केपटाउन जैसा, जहां सिर्फ 45 दिनों का बचा है पानी

Publisher NEWSWING DatePublished Tue, 03/06/2018 - 19:58

Md. Asghar Khan

Ranchi : पर्यटकों की पहली पसंद तो कभी गर्मी के दिनों में संयुक्त बिहार की राजधानी . ये बात थी राजधानी रांची में. लेकिन शहर ने अब रांची के हरे-भरे मिजाज को ही बदल डाला है. उधर हर साल बढ़ते जल संकट को देख रांची शहर का पर्यावरण और वातावरण भविष्य में कैसा होगा, इस बात को लेकर लोगों में चिंता है. पर्यावरणविद इसकी सबसे बड़ी वजह पिछले 20 सालों में तेजी से हुए कंस्ट्रक्शन को मानते हैं. इन्हीं प्रश्नों पर नामचीन पर्यावरणविद प्रोफेसर नीतीश प्रियदर्शी ने न्यूजविंग से खास बातचीत में बताया कि अगर शहर के पर्यावरण को नहीं बचाया गया, तो रांची का हाल भी केपटाउन जैसा ही हो जायेगा. केपटाउन शहर साउथ अफ्रीका की राजधानी है. यह दुनिया के बड़े शहरों में शुमार है. अपनी ग्रीनरी के लिए प्रसिद्ध शहर अब ऐतिहासिक जल संकट से जूझ रहा है. पर्यावरण विशेषज्ञों की मानें, तो इसकी बड़ी वजह शहर में हुआ निर्माण कार्य है. पर्यावरणविदों ने चेतावनी दी है कि शहर में सिर्फ 45 दिनों का ही पानी बचा हुआ है. 

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600 हुआ करते थे तालाब

नीतीश प्रियदर्शी का कहना है कि किसी भी शहर को बसाने के क्रम में उसका इन्वायरमेंटल इंपैक्ट असेस्मेंट किया जाता है. इसके तहत निर्माण कार्य से होने वाले निगेटिव प्वाइंट को ध्यान में रखकर शहर की ग्रीनरी को बचाया जाता है. ये सब रांची के संदर्भ में नहीं किया गया. हमने इस दौरान पेड़ों को काटा, सड़कों का चौड़ीकरण किया और बड़ी-बड़ी इमारतें बनायी. शहर की हरियाली नहीं बचायी, बल्कि इसे खत्म करते गये. उन्होंने कहा कि रांची पहले बगानों का शहर कहलाता था, अब यह कंक्रीट का जंगल बन गया है. इन चीजों ने क्लाइमेट पर असर डाला है. प्रियदर्शी ने कहा कि रांची जिले में लगभग छह सौ तालाब हुआ करते थे. शहर में ही 150 तालाब थे. इन्हें भर दिया गया, जिसका शहर के पर्यावरण और जलस्तर पर काफी बड़ा असर पड़ा. तालाब भूमितगत जल को रिचार्ज करते हैं, जिसका काम बारिश के पानी को इकट्ठा करना होता है.

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ग्रीनरी को नहीं रखा गया मेनटेन

प्रियदर्शी ने न्यूजविंग से बातचीत में बताया कि शहर के डेवलपमेंट के समय ग्रीनरी को मेनटेन नहीं रखा गया. उन्होंने कहा कि जब शहर बसता है, तब उसके तहत कई तरह के कंस्ट्रक्शन के काम होते हैं. सड़क के चौड़ीकरण हेतु पेड़ों की कटाई भी होती है. लेकिन इन सबके बीच इन्वायरमेंटल इंपैक्ट असेस्मेंट कर शहर की हरियाली को बचाये रखा जा सकता है. जैसे जहां पेड़ पौधे कट रहे थे, उसकी जगह खाली स्थानों पर पेड़ पौधे लगाये जाते हैं. सरकार को ये नियम बना देना चाहिए था कि दो अपार्टमेंट या इमारतों के बीच एक ग्रीनरी बेल्ट बनाना अनिवार्य है. इसके अलावा शहर में बनाये गये बड़े सरकारी कार्यालयों को शहर से दूर जैसे ओरमांझी और खूंटी स्थित बंजर जमीन पर बनाना चाहिए.

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ताबड़तोड़ की जा रही है बोरिंग

जितनी तेजी से रांची में निर्माण कार्य हुआ, उतनी ही तेजी से लोगों ने अपने घरों में बोरिंग करवाये. इसकी वजह से शहर का वाटर लेवल नीचे चला गया. इस पर नीतीश प्रियदर्शी का कहना है कि यह बहुत हास्यास्पद है. जिस शहर में तीन बड़े डैम (कांके, हटिया, रुक्का) हो, वहां लोग अपने घरों में ताबड़तोड़ बोरिंग करवा रहे हैं. मेरा मानना है कि सप्लाई वाटर को लेकर शहर के लोगों में संशय है. उन्हें इस बात का डर है कि सप्लाई वाटर साफ नहीं होता और उसे पीने से बीमार पड़ सकते हैं. सरकार को चाहिए कि जब रांची में डैम और सप्लाई वाटर पर्याप्त है, तो लोगों में इसके प्रयोग के प्रति विश्वास पैदा करे. नये तालाबों का निर्माण करवाये. शहर में जो जगह खाली हो या हरे-भरे हों, वहां कोई निर्माण कार्य नहीं करवाया जाये. स्वर्णरेखा, हरमू, घुसर, जुमार, साफी जैसी शहर की छोटी नदियों को भी बचाया जाये, अन्यथा शहर की स्थिति और भयावह हो सकती है.

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