दुमकाः ग्रामीणों ने पूरी की जनजातीय हिजला मेला महोत्सव की तैयारी, 16-23 फरवरी तक आयोजित होगा मेला (देखें वीडियो)

Publisher NEWSWING DatePublished Wed, 02/14/2018 - 15:40

Dumka: दिसोम मारंग बुरु संताली अरीचली आर लेगचार आखड़ा के बैनर तले हिजला, धतीकबोना, हडवाडीह आदि गांव के संताल आदिवासियों ने आज पूजा-अर्चना की. जनजातीय हिजला मेला महोत्सव 2018 शातिपूर्ण रूप से संपन्न इस उद्देश्य से हिजला मेला परिसर में स्थित दिसोम मारंग बुरु थान में लोगों ने पूजा-अर्चना की. दिसोम मारंग बुरु थान के नायकी सीताराम सोरेन ने कहा, वर्षों पहले यहां संताल आदिवासी बोंगा दारी (पूजने वाला पेड़) सारजोम (सखुवा पेड़) के नीचे पूजा और पंचायती/फैसला करते थे. यहां वही मुद्वे आते थे, जिसका फैसला गांव में नही हो पाता था.

इसे भी पढ़ेंः जो शहीद हो गए, उनके आश्रित को नौकरी कब मिलेगी यह पता नहीं, पर नक्सली को सरेंडर के समय ही नौकरी देने का प्रस्ताव

परंपरागत स्वशासन व्यवस्था पर ग्रामीणों का भरोसा था

उन मुद्दों पर फैसले के लिए मयूराक्षी नदी के निकट मरंग बुरू थाने आते थे. यहां हुए फैसले का पूरी तरह पालन किया जाता था. जिसे मोड़े पिंडह कहा जाता था. परंपरागत स्वशासन व्यवस्था पर ग्रामीणों का भरोसा था. ग्रामीण अधिक से अधिक संख्या में यहां फैसले के लिए आते थे. ग्रामीणों के जमा होने कारण ब्रिटिश सरकार के मन में डर समा गया था, कहीं संथाल समाज विद्रोह ना करे. इसे देखते हुये अंग्रेज सरकार ने पता लगाया आखिर यहां संताल आदिवासी जमा क्यों होते हैं ? तो पता लगा कि पूज्य सारजोम(सखुवा पेड़) ही इसका बड़ा कारण है, जिस कारण लोग यहां जमा होते हैं. लोग यहां जमा ना हों और विद्रोह नहीं हो यह सोच कर अंग्रेज सरकार ने इस पूज्य पेड़ को काट दिया. पेड़ काटने के बाद इस इलाके में बहुत आकाल/सुखाड़ पड़ा. जिससे ग्रामीण भड़कने लगे, भूखमरी की स्थिति पैदा होने लगी. इससे अंग्रेजों के विरोरूद्ध आन्दोलन की आग भड़कने लगी. इसी आन्दोलन को दबाने के लिय उस समय अंग्रेज सरकार ने यहां मेला लगाने की शुरूआत की. इसका नाम ऌकर छअह(अपना कानून) रखा गया, जो कालांतर में हिजला के नाम से प्रसिद्ध हुआ. 

इसे भी पढ़ेंः राज्य में रद्द किये गये राशन कार्ड का सचः सरकार का दावा 11लाख 64 हजार फर्जी राशन कार्ड किये गये रद्द, 225 करोड़ की हुई बचत !

आन्दोलन को दबाने के लिये अंग्रेजों ने यह मेला शुरू किया

आखड़ा के अध्यक्ष व जनजातिय हिजला मेला महोत्सव के उद्घाटनकर्ता सुनिलाल हांसदा सह हिजला गांव के प्रधान ने कहा, मोड़े पिंडह के फैसले में जो दोषी होते थे, उसे ग्रामीण मोड़े पिंडह (5 खेत का मेड़ तक) तक पीटते जाते थे. अगर पूज्य पेड़ सारजोम (सखुवा पेड़) को काटा नहीं जाता तो मेला शुरू ही नहीं होता. आन्दोलन को दबाने के लिये ही अंग्रेजों ने यह मेला मज़बूरी में शुरू किया .मेला मुख्य परिसर में आज भी पूज्य पेड़ सारजोम (सखुवा पेड़) का अवशेष है. जो दिसोम मारंग बुरु थान के नाम से प्रसिद्ध है. आखड़ा और ग्रामीण सभी मेला में आने वालों से आग्रह करते हैं कि सभी आदिवासी भाई-बहन संताली आदिवासी पहनावा पंची और पंची-फहान में आने की कृपा करें. दल नायक रसका टुडू की टीम टुडू क्लब ने संतालों के इष्ट देवता मारंग बुरु के नाम नाच-गान कर अपनी भक्ति प्रकट की.

पूजा में ये हुए शामिल

इस पूजा पाठ में दल नायक रसका टुडू की टीम, टुडू क्लब के साथ मुखिया मंजुलता सोरेन, सिधोर हांसदा, सुकलाल हांसदा, सोनालाल हेम्ब्रोम, हेलेन सोरेन, रमेश मुर्मू, कमल सोरेन, सुरेश चन्द्र सोरेन, दिलीप सोरेन, झारखण्ड मरांडी, देवी सोरेन, रुबिलाल हांसदा, साहेब टुडू, हेलेन सोरेन, निशा बास्की, अर्चना बेसरा, सुनिता सोरेन, निशा मुर्मू, सलिता हेम्ब्रोम, सुनिता हेम्ब्रोम, बबिता हेम्ब्रोम, प्रियंका टुडू, सतेन्द्र मुर्मू के साथ काफी संख्या में महिला और पुरुष उपस्थति थे.

न्यूज विंग एंड्रॉएड ऐप डाउनलोड करने के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पेज लाइक कर फॉलो भी कर सकते हैं.

City List of Jharkhand
loading...
Loading...

NEWSWING VIDEO PLAYLIST (YOUTUBE VIDEO CHANNEL)