क्या रांची पुलिस ने डीजीपी डीके पांडेय व अन्य अफसरों को बचाने के लिए 514 युवकों को नक्सली बताकर सरेंडर कराने वाले केस की फाइल बंद कर दी !

Publisher NEWSWING DatePublished Mon, 02/12/2018 - 10:03

पुलिस के अफसरों ने आंकड़ा बढ़ाने के लिए किया सरेंडर पॉलिसी का दुरुपयोग

Ranchi: रांची, खूंटी, गुमला व सिमडेगा के भोले-भाले 514 युवकों को नक्सली बताकर सरेंडर कराने के मामले से जुड़ी जांच को रांची पुलिस ने बंद कर दी है. इसे लेकर एक याचिक हाई कोर्ट में भी सुनवाई के लिए लंबित है. रांची पुलिस ने अपनी जांच  का दायरा सिर्फ दिग्दर्शन तक ही समित रखा. रांची पुलिस ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की उस रिपोर्ट पर गौर ही नहीं किया, जिसमें कहा गया था कि पुलिस के सीनियर अफसरों ने सरेंडर का आंकड़ा बढ़ाने के लिए नक्सली सरेंडर पॉलिसी का दुरुपयोग किया.  एजेंट और अफसरों ने सरेंडर करनेवाले युवकों से हथियार खरीदने के नाम पर लाखों रुपये वसूले, ताकि सरेंडर के समय उन्हें वह हथियार उपलब्ध  कराया जा सके. यहां उल्लेखनीय है कि जिस वक्त 514 युवकों को कोबरा बटालियन के जवानों की निगरानी में पुरानी जेल परिसर में रखा गया था और हथियार के साथ उनकी तस्वीरें ली जा रही थी, उस वक्त सीआरपीएफ झारखंड सेक्टर के आइजी डीके पांडेय हुआ करते थे. डीके पांडेय अभी राज्य के डीजीपी हैं. और इस मामले में डीजीपी डीके पांडेय, एडीजी एसएन प्रधान समेत सीआरपीएफ के अन्य अफसर संदेह के घेरे में हैं. एनएचआरसी की रिपोर्ट में भी इस ओर इशारा किया गया है. एेसे में सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या रांची पुलिस ने डीजीपी डीके पांडेय को बचाने के लिए लोअर बाजार थाना में दर्ज मामले की जांच का दायरा समित रखा और मामले की जांच को बंद कर दी.

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नक्सल सरेंडर की योजना गृह मंत्रालय के मौखिक निर्देश पर बनायी गयी थी

एनएचआरसी ने जांच में सामने आये 12 तथ्यों  की जानकारी राज्य सरकार और गृह मंत्रालय को दी थी. आयोग ने उन 12 बिंदुओं  पर सरकार से जवाब मांगा था, लेकिन सरकार के सीनियर अधिकारी इस रिपोर्ट को  दबाये बैठे हैं. आयोग को अब तक कोई जवाब नहीं भेजा गया है. जांच के दौरान तत्कालीन आइजी स्पेशल ब्रांच  एसएन प्रधान ने जांच अधिकारी को बताया था कि नक्सली सरेंडर की योजना गृह मंत्रालय के मौखिक  निर्देश पर बनायी गयी थी, ताकि उन्हें मुख्य धारा में लाया जा सके. जांच में पुलिस के सीनियर अफसरों पर लगे आरोपों को सही पाया गया है.  

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मानवाधिकार आयोग की जांच में जो तथ्य सामने आये
- गृह मंत्रालय के मौखिक निर्देश पर पुलिस व सीआरपीएफ के अफसरों ने नक्सलियों को मुख्यधारा में लाने की योजना बनायी थी. योजना पर जून 2011 से फरवरी 2013 तक काम किया गया.  
- पुलिस अफसरों की ओर से रवि बोदरा को यह काम सौंपा गया था कि वह सरेंडर करने वाले नक्सलियों को लाये.

- सीआरपीएफ व सेना में नौकरी पाने के लालच में युवकों ने जमीन व मोटरसाइकिल बेच कर रवि बोदरा और दिनेश प्रजापति को पैसे दिये. दोनों ने युवकों से कहा था कि नक्सली के रूप में सरेंडर करने पर नौकरी मिलेगी.
- निर्दोष  युवकों को नक्सली बता कर नौकरी दिलाने के नाम पर सीआरपीएफ अफसरों के सामने सरेंडर कराने का आरोप सही. 
- युवकों को पुरानी जेल में सीआरपीएफ की कोबरा बटालियन की निगरानी में रखा गया.  युवकों के रहने और खाने का बोझ सरकार ने उठाया. जांच में जब सीनियर अधिकारियों ने पाया कि सिर्फ 10 युवक ही नक्सली गतिविधियों से संबंधित हैं, फिर भी अन्य को फंसाये रखा गया. कोर्ट में पेश नहीं किया गया था, इसलिए कानूनी तरीके से यह नहीं कहा जा सकता है कि उन्हें जेल में रखा गया था. युवकों को अवैध रूप से रखने के लिए सीआरपीएफ व पुलिस के सीनियर अफसर दोषी हैं. 
- युवकों को अवैध रूप से कब्जा में नहीं रखा गया था, पर यह स्पष्ट है कि इस अवधि में युवकों के आजीविका का नुकसान हुआ. 

- पुराना जेल परिसर में 514 युवकों की जांच में किसी के भी नक्सली होने या उससे संबंध होने की बात सामने नहीं आयी. युवकों को एक साल तक पुरानी जेल में रखा गया.
 - कोबरा बटालियन के अधिकारियों की अनुमति से युवकों को बाहर जाने और आने की अनुमति दी गयी थी.
- जेल परिसर में रखे गये युवकों से हथियार खरीदने के नाम पर सरकार द्वारा नियुक्त और पुलिस अधिकारियों ने पैसे लिये.
- रवि बोदरा और दिनेश प्रजापति ने इन युवकों को सेना या अन्य पुलिस बलों में नौकरी दिलाने के नाम पर ठगा.
- युवकों को जेल परिसर में रखने के लिए सरकारी अधिकारियों ने नियम का पालन नहीं किया.

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