क्या अफसरों ने मुख्यमंत्री रघुवर दास को बकोरिया कांड के दोषियों की कतार में खड़ा कर दिया !

Publisher NEWSWING DatePublished Fri, 01/12/2018 - 16:33

Surjit Singh

तथ्य-एक : आठ जून 2015 की रात पलामू के सतबरवा थाना क्षेत्र के बकोरिया में नक्सली अनुराग समेत 12 लोग मारे गए थे. नौ जून को डीजीपी डीके पांडेय और तत्कालीन एडीजी अभियान एसएन प्रधान ने दावा किया कि मारे गए सभी लोग नक्सली हैं और सभी पुलिस के साथ हुए मुठभेड़ में मारे गए. घटना के ढ़ाई साल बीत चुके हैं. पुलिस के दोनों वरिष्ठ अफसरों ने तब जो बातें कही थीं, अब तक उसे साबित नहीं कर पाये हैं. अब तक आठ के बारे में नक्सली होने का रिकॉर्ड पुलिस को नहीं मिले हैं और मरने वालों में दो नाबालिग व एक पारा टीचर उदय यादव थे. चार मृतकों की पहचान भी अभी तक नहीं हो पायी है. 

तथ्य-दो : घटनास्थल पर जो चिन्ह मिले, घटनास्थल की जो तसवीरें उपलब्ध हैं, घटना के वक्त पलामू रेंज के डीआइजी के पद पर पदस्थापित रहे आइपीएस हेमंत टोप्पो और सदर थाना के तत्कालीन प्रभारी हरीश पाठक ने दो जगह पर अपने बयान दर्ज कराये हैं. पहले राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के समक्ष और हाई कोर्ट के आदेश पर सीआइडी के समक्ष. दोनों ने जो बयान दिए हैं, वह पुलिस मुठभेड़ की कहानी को सपोर्ट नहीं करते. उल्टे मुठभेड़ को फर्जी बताते हैं.

तथ्य-तीन : कहने को पिछले ढ़ाई साल से सीआइडी इस मामले की जांच कर रही है. पर जांच की स्थिति क्या है, यह राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा पिछले साल राज्य सरकार के वरिष्ठ अफसरों को लिखे गए पत्र से साफ होता है. जिसमें आयोग ने कहा कि जांच ठीक ढंग से नहीं हो रही है. जांच करने वाले अफसरों और मामले का सुपरविजन करने वाले अफसरों के खिलाफ कार्रवाई की जाये. साथ ही मामले की जांच एसपी रैंक के अफसर से करायी जाये और सुपरविजन आइजी रैंक के अफसर करें. 

तथ्य-चार : 24 नवंबर 2017 को हाई कोर्ट ने भी सीआइडी जांच की गति पर सवाल उठाये और जांच तेज करने का निर्देश दिया. साथ ही कई बिंदुओं पर अनुसंधान पूरी करके रिपोर्ट देने को कहा. कोर्ट ने यह भी कहा कि जरुरत पड़ी, तो मामले की सीबीआई जांच का भी आदेश दे सकते हैं. इसके बाद सीआइडी के तत्कालीन एडीजी एमवी राव ने जांच तेज की. जांच तेज होते ही डीजीपी डीके पांडेय ने उनसे कहा कि कोर्ट की परवाह ना करें और जांच धीमी कर दें (जैसा की श्री राव ने सरकार को लिखे पत्र में कहा है). एमवी राव ने डीजीपी का यह गलत आदेश मानने से इंकार कर दिया. जिसके बाद 14 दिसंबर को उनका तबादला कर दिया गया.

तथ्य-पांच : एकीकृत बिहार के समय हुए चारा घोटाले के एक मामले, जिसमें चाईबासा ट्रेजरी से अवैध निकासी की गयी थी, उस मामले में अदालत ने लालू प्रसाद यादव को साढ़े तीन साल की सजा सुनायी. लालू यादव ने घोटाला नहीं किया था, वह उस वक्त मुख्यमंत्री थे और अदालत ने उन्हें घोटालेबाजों को संरक्षण देने का दोषी माना.

उपर के चार तथ्य बकोरिया कांड से संबंधित हैं और पांचवां चारा घोटाले के वक्त मुख्यमंत्री के पद पर रहे लालू प्रसाद यादव से संबंधित. बकोरिया कांड

Bakoriya Case
Bakoriya Case

में अब तक जो तथ्य सामने आए हैं, उससे यही लगता है कि पुलिस ने फर्जी मुठभेड़ किया, जिसमें एक नक्सली और 11 निर्दोष लोग मारे गए. फिर इस मामले के दोषियों को बचाया जा रहा है. इस क्रम में मामले की जांच सही दिशा में ले जाने वाले अफसरों का तबादला कर दिया गया. मतलब अगर मुठभेड़ फर्जी था, तो इसके दोषी पुलिस अफसरों और बचाने वाले, संरक्षण देने वाले भी आरोपियों की श्रेणी में आ जाते हैं. और वह भी अदालत में दोषी माने जा सकते हैं. जैसा कि लालू प्रसाद यादव के मामले में हुआ.

अब आइपीएस अफसरों के तबादले की प्रक्रिया पर गौर करें. इसमें डीजीपी, गृह सचिव, मुख्य सचिव और मुख्यमंत्री भी शामिल होते हैं. बिना मुख्यमंत्री की सहमति के किसी आइपीएस का तबादला नहीं हो सकता. तो क्या अधिकारियों ने मुख्यमंत्री रघुवर दास को भी उसी लाईन (बचाने वाले या संरक्षण देने) में खड़ा कर दिया, जहां पहले से पुलिस के सीनियर अफसर  खड़े थे. 

एडीजी एमवी राव का सरकार को लिखा पत्र सार्वजनिक होने के बाद एक तथ्य यह भी सामने आया है कि डीजीपी डीके पांडेय ने उन्हें बकोरिया कांड की जांच धीमी करने के लिए दबाव डाला. किसी भी अापराधिक मामले की जांच में किसी भी स्तर पर हस्तक्षेप करना अपराध माना जाता है. वह भी तब जब बात सीआइडी की हो. सीआइडी को राज्य का स्वतंत्र जांच एजेंसी माना जाता है. उसकी जांच में हस्तक्षेप करने की घटना को अदालत में भी चुनौती दी जा सकती है. 

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CM Raghuvar Das

क्या पावरफुल लोग जांच में बाधा डालने में सफल हो जाते हैं

अक्सर यह कहा जाता है कि पावरफुल लोग अपने खिलाफ चल रहे किसी मामले की जांच में बाधा डालने में सफल हो जाते हैं. क्या बकोरिया कांड में भी यही हो रहा है. क्यों घटना के कुछ दिन बाद ही एडीजी सीआइडी रेजी डुंगडुंग का तबादला कर दिया गया. क्यों उनके बाद एडीजी सीआइडी के पद पर ढ़ाई साल तक काम करने वाले दो आइपीएस अजय भटनागर और अजय कुमार सिंह ने मामले की जांच सही तरीके से नहीं करायी. और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को टिप्पणी करनी पड़ी. आखिर किसके दबाव में गलत जांच किए गए, गलत सुपरविजन रिपोर्ट जारी की गयी. किस पावरफुल व्यक्ति के कारण जांच से जुड़े अफसर भी परेशानी में पड़ गए. क्यों ढ़ाई साल बाद जब एक एडीजी एमवी राव ने जांच में तेजी लाने के संकेत दिए, तो डीजीपी ने उन्हें धीमी करने का दबाव डाला. क्यों श्री राव का तबादला एक एेसे पद पर किया गया, जो स्वीकृत ही नहीं है. क्या यह सीआइडी में आने वाले अफसरों के लिए संदेश है कि जांच धीमी करो, वरना रेजी डुंगडुंग व एमवी राव वाला हाल होगा. बहरहाल आम लोगों को अब यही लगने लगा है कि सच में पावरफुल लोग जांच में बाधा डालने में सफल हो जाते हैं. वैसे बहुत सारे लोगों को इस मामले में हाई कोर्ट की अगली तारीख का भी इंतजार है.

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