बोफोर्स मामला : न्यायमूर्ति खानविलकर ने सुनवाई से खुद को किया अलग

Publisher NEWSWING DatePublished Tue, 02/13/2018 - 17:00

New Delhi : सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश ए एम खानविलकर ने राजनीतिक रूप से संवेदनशील 64 करोड़ रुपए के बोफोर्स भुगतान मामले की सुनवाई से मंगलवार को खुद को अलग कर लिया. न्यायमूर्ति खानविलकर, प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ का हिस्सा थे.  उन्होंने मामले की सुनवाई से अलग रहने का विकल्प चुनने का कोई कारण नहीं बताया. इस पीठ में न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ भी शामिल थे.पीठ ने कहा कि मामले की 28 मार्च को सुनवाई के लिए नई पीठ का गठन किया जायेगा.

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भाजपा नेता अजय अग्रवाल ने आदेश के खिलाफ दायर की थी याचिका

गौरतलब है कि दिल्ली उच्च न्यायालय ने 31 मई 2005 को फैसला सुनाते हुए मामले के सभी आरोपियों के खिलाफ सभी आरोप खारिज कर दिये थे. भाजपा नेता अजय अग्रवाल ने अदालत के इस आदेश को चुनौती देते हुए याचिका दायर की थी, जिसकी सुनवाई इस पीठ को करनी थी.

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1986 में 1437 करोड रूपए का हुआ था करार

भारत और स्वीडन की हथियारों का निर्माण करने वाली एबी बोफोर्स के बीच सेना के लिये 155एमएम की 400 हाविट्जर तोपों की आपूर्ति के बारे में 24 मार्च, 1986 में 1437 करोड रूपए का करार हुआ था. इसके कुछ समय बाद ही 16 अप्रैल, 1987 को स्वीडिश रेडियो ने दावा किया था कि इस सौदे में बोफोर्स कंपनी ने भारत के शीर्ष राजनीतिकों और रक्षाकार्मिकों को दलाली दी. इस मामले में 22 जनवरी, 1990 को केन्द्रीय जांच ब्यूरो ने आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और जालसाजी के आरोप में भारतीय दंड संहिता और भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत एबी बोफोर्स के तत्कालीन अध्यक्ष मार्टिन आर्दबो, कथित बिचौलिये विन चड्ढा और हिन्दुजा बंधुओं के खिलाफ प्राथिमकी दर्ज की थी.

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1999 में दायर किया गया था पहला आरोप पत्र

इस मामले में जांच ब्यूरो ने 22 अक्तूबर, 1999 को चड्ढा, ओतावियो क्वोत्रोक्कि, तत्कालीन रक्षा सचिव एस के भटनागर, आर्दबो और बोफोर्स कंपनी के खिलाफ पहला आरोप पत्र दायर किया था. इसके बाद, नौ अक्तूबर, 2000 को हिन्दुओं बंधुओं के खिलाफ पूरक आरोप पत्र दायर किया गया. दिल्ली में विशेष सीबीआई अदालत ने चार मार्च, 2011 को क्वोत्रोक्कि को यह कहते हुये आरोप मुक्त कर दिया था कि देश उसके प्रत्यपर्ण पर मेहनत से अर्जित राशि खर्च करना बर्दाश्त नहीं कर सकता क्योंकि इस मामले में पहले ही 250 करोड़ रूपए खर्च हो चुके हैं. क्वौत्रोक्कि 29-30 जुलाई 1993 को देश से भाग गया ओर कभी भी मुकदमे का सामना करने के लिये देश की अदालत में पेश नहीं हुआ. बाद में 13 जुलाई, 2013 को उसकी मृत्यु हो गयी. यह मामला लंबित होने के दौरान ही पूर्व रक्षा सचिव भटनागर और विन चड्ढा का भी निधन हो चुका है.

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