बिरसा ने कहा जब तक आदिवासी इंसाफ और हक के लिए लड़ते रहेंगे, उनकी हर लड़ाई में शामिल रहेंगे

Publisher NEWSWING DatePublished Sat, 06/09/2018 - 12:32

Faisal Anurag

बिरसा ने कहा जब तक आदिवासी इंसाफ और हक के लिए लड़ते रहेंगे वे उनकी हर लड़ाई में शामिल रहेंगे. बिरसा मुंडा ने अस्मिता व जल, जंगल और जमीन पर जिस जनहक की आवाज बुलंद की थी वह संघर्ष आज भी जारी है. बिरसा मुंडा वक्‍त के साथ निरंतर प्रासंगिक होते जा रहे हैं. बिरसा मुंडा दुनिया भर के आदिवासियों के प्रेरणास्त्रोत बन गए हैं. अफ्रीकी और लातिनी अमरीकी देशों में भी संसाधनों पर हक के संघर्ष में उनसे प्रेरणा ली जा रही है. भारत के 11 करोड़ आदिवासी उन्‍हें अपना महानायक के साथ अपनी लड़ाइयों का नायक मानते हैं. उलगुलान के राजनीतिक-दार्शनिक के बतौर उनके विचारों और आंदोलन की रणनीतियों का अध्‍ययन किया जा रहा है. उन्‍न्‍सिवीं सदी के अंत का कोई भी आजादी का सेनानी लोगों की लड़ाइयों में इतना जीवंत शायद ही बना हुआ है.

बिरसा मुंडा की 118 वीं शहीद दिवस, इस बात की प्रेरणा देता है कि उनके विचारों को आज के उत्‍पीड़ित समाजों के संघर्षों के संदर्भ में देखा जाए. खासकर उन संदर्भो में जिसमें बड़े कॉरपोरेट घरानों ने सरकारों को अपना हितैषी बना लिया है और वे लगातार सरकारों से मिलकर प्राकृतिक संसाधनों को हड़प रहे हों और वंचित समूह और अधिक वंचना का शिकार हो रहा हो. बिरसा मुंडा के अध्‍ययेता मानते हैं कि उलगुलान उन अदिवासी प्रतिरोधों का वैचारिक संपूजन है जिसने स्‍वायत्‍ता, समानता और अस्‍मिता के संदर्भ में संसाधनों के जनहक को संजीदा रूप से व्‍याख्‍यायित किया है. आदिवासी संघर्ष इंसाफ और हक के साथ अपनी स्‍वायत्‍तता के लिए निरंतर सजग रहा है. वर्तमान संघर्षों को भी इसी संदभ्र में देखा जाना चाहिए. बिरसा मुंडा के उलगुलान की भूमिका भूमि विघटन, जंगल की दावेदारी से आदिवासियों को वंचित किए जाने और उनकी स्‍वायत्‍तता पर हमले से ही आरंभ हुई थी जिसकी परिणति एक व्‍यापक जनांदोलन के रूप में हुई. जिसमें आदिवासी किसानों के सवाल भी प्रमुखता से उठे.

यह सोचने की बात है कि 118 साल बीत जाने के बाद भी उलगुलान के सवाल और संदर्भ बने हुए हैं. जिस तरह बिरसा मुंडा और उनके लोग वंचना के शिकार थे आज भी आदिवासी उसी स्थिति में हैं. ना तो उनके हालात में कोई बुनियादी बदलाव आए है और ना ही उनके संघर्षों के स्‍वर और दिशा बदली है. यानी आदिवासी हक का सवाल अनुत्‍तरित है. लोकतंत्र के इतने सालों के प्रयोग के बाद भी, लोकतंत्र का महज इतना ही लाभ मिला है कि कुछ आदिवासी राजनीतिक तौर पर सक्रिय हैं लेकिन वे अपने ही समाज की मूल चेतना से वंचित होते जा रहे हैं. आदिवासी प्रतिरोध के आधुनिक स्‍वर को अक्‍सर समझने में इसी कारण भूल होती है और राजकीय दमन होता रहता है. आदिवासी समाजों में शांति के लिए अनिवार्य है कि उनकी सामाजिक स्‍वायत्‍तता के साथ संसाधनों पर पूरा उनका हक बहाल किया जाए. बिरसा मुंडा की याद का भी यही अर्थ है. कॉरपोरेट घरानों से आदिवासी इलाकों के संसाधनों की हिफाजत प्राथमिकता के बतौर लिए जाने की जरूरत है.

बिरसा मुंडा के राजनीतिक विचार थे और उनका राजनीतिक दर्शन आदिवासी समाजों की चेतना और पंरपराओं के निरंतर नवीनीकरण की प्रक्रियाओं से निर्मित हुआ था और यही कारण है कि उनके इंडिजनस विचारों में गहराई है और वह एक विशेष वर्ल्‍ड आउटलुक पैदा करता है. उसमें एक ओर जहां साम्राज्‍यवाद विरोधी चेतना के स्‍वर हैं वहीं वह सामंती समाजों के लिए भी एक चुनौती पैदा करता है. बिरसा ने एक राजनीतिक धर्म की भी स्‍थापना की है जिसे  बिरसाइत कहा जाता है.  बिरसा मुंडा के राजनीतिक दर्शन और उनके समाज-सुधार की चेतना को इससे समझा जा सकता है.

बिरसा मुंडा के विचार और उलगुलान का नेतृत्‍व सामूहिक चेतना से निर्मित हुआ और एक ऐसी नई चेतना को स्फुटित करने में सफल रहा जिसे बिरसा पूर्व आदिवासी जननायकों ने रचा था. यह कोई मामूली परिघटना नहीं है. 1895 से 1900 के बीच उलगुलान ने मात्र पांच सालों में ही अपने परिपक्‍व राजनीतिकि चेतना और नजरिया बनाया, जिसका असर आज तक बना हुआ है.

बिरसा मुंडा की विचारधारा उन लोकगीतों में बिखरी हुई है जिसे उनके समकालीनों में रचा और गाया. जंगलों में वे गीत आज भी गूंजते हैं खासकर संघर्ष के हर पहू के साथ. आज के आदिवासी नेतृत्‍व के सामने यह चुनौती है कि वह बिरसा की तरह उनकी विचारधारा को आगे विकसित करे और संघर्ष के नए तुहारे का स़ृजन करे. आदिवासियों के अनेक जनांदोलनों की सामाजिक और सामूहिक चेतना ने इस दिशा में पहल भी की है.

बिरसा को याद करने में अर्थ है उनकी वैचारिक चेतना का विस्‍तार और इंसाफ के लिए फैसलाकुन संघर्ष.

(लेखक न्यूज विंग के वरिष्ठ संपादक हैं और ये उनके निजी विचार हैं)

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